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Friday, September 18, 2015

हाइकु-दोहे

प्यासी धरती/ खग दुखित रोते/ बढ़ती भूख।
मिटते प्राणी/ है चकित नाहर/ घटा रसूख॥

घिरा अँधेरा/ डर नहीं मनुज/ जला ले दीप।
छले न जाना/ ध्यान से पग धर/ लक्ष्य समीप॥

सावन आया/ खिल उठी बगिया/ मस्त मयूर।
जगी उमंगें/ प्रीत की रिमझिम/ चढ़ा सुरूर॥

हाय गरीबी/ नोंचती तन-मन/ करे हताश।
जला न चूल्हा/ रो पड़े बरतन/ बुझती आस॥

-कुमार गौरव अजीतेन्दु
शाहपुर, दानापुर (कैन्ट)
पटना - ८०१५०३
बिहार

ताराचंद शर्मा 'नादान' की ग़ज़ल

शजर से टूट कर पत्ते का कोई दर नही होता
कटा जो अपनी मिट्टी से, फिर उसका घर नही होता

हजारों ख्वाब ले कर, दूसरे के घर चले जाओ
पराई रोशनी का अपना सा मंजर नही होता

जड़ें जिसकी रही कायम, कभी उस पेड़ पर यारों
हज़ारों आंधियाँ गुजरें, असर तिलभर नही होता

हम अपने हौसलों के पंख जो पहचान लें पहले
तो फिर परवाज़ करने में कोई भी डर नही होता

लुटाये गुल मुहब्बत के, यहां जिस शख्स ने हरदम
कभी उस हाथ में, नफ़रत भरा पत्थर नही होता

खुदा की राह में जो नेकियों के साथ चलता है
बगल में उसकी, कोई घात का खंजर नही होता

सम्भालो कद जरा ‘नादान’ चादर के मुताबिक तुम
वगरना पैर ढकने पर, ढका हो सर, नही होता

-ताराचन्द "नादान"
+91 9582279345

Tuesday, July 21, 2015

ग़ज़ल - कृष्ण गोपाल विद्यार्थी

छत की उम्र पूछनी है तो ढहती दीवारोँ से पूछ।
आग का मतलब पूछ न मुझसे जलते अंगारों से पूछ।

छेनी की चोटों से जिनका रेशा रेशा दुखता है,
ऊंचा उठने की कीमत तो ज़ख्मी मीनारों से पूछ।

बड़े बड़े महलों का तू इतिहास लिखे , इससॆ पहले
कितने घर बरबाद हुए थे बेघर बंजारों से पूछ।

पुरखों की संघर्ष-कथा कंप्यूटर क्या बतलाएगा,
कैसे मुकुट बचा माता का टूटी तलवारों से पूछ।

ओ मगरूर मुसाफ़िर तेरे सफ़र की फिर भी मंज़िल है,
जिनको चलना और फ़क़त चलना है उन तारोँ से पूछ।
                                      
                                                    - कृष्ण गोपाल विद्यार्थी

Saturday, July 4, 2015

गीत - धीरज श्रीवास्तव

सेतु बनाकर अपने दिल से
उसके दिल को जोड़ लिया!
मैँने जैसे कोई तारा
आज गगन से तोड़ लिया!

आओ खुशियोँ साथ निभाओ
और सदा ही संग रहो!
आँगन मेरे महको बेला
लगकर मेरे अंग रहो!
सच कहता हूँ मैँने मुँह को
अवसादोँ से मोड़ लिया!
मैँने जैसे कोई....

सरसो के पीले फूलोँ सा
झूमे औ' मुस्काये मन!
पछुवाई भी भंग पिलाये
खूब हँसे बौराये मन!
रंग गुलाबी घोला मैँने
अपने ऊपर छोड़ लिया!
मैँने जैसे कोई....

आऊँ जाऊँ अन्दर बाहर
ठुमक ठुमक कर नाचूँ मैँ!
और सुखोँ की इक इक चिट्ठी
अन्तर्मन मेँ बाचूँ मैँ!
देख दुखो ने अपना सर औ
अपना माथा फोड़ लिया!
मैँने जैसे कोई....

Friday, July 3, 2015

उषा यादव 'उषा' की ग़ज़ल

आज भी जु़ल्मतों को नहीं है ख़बर
आखि़रश कैसे होती है रौशन सहर ?

वो तअस्सुब की रह पर न चलते अगर
वीरॉं होने से बच जाते कितने ही घर

ख़त्म हो ही गई जुस्तजू में उमर
एक भी शख़्स़ तो ना मिला मोतबर

चापलूसी नहीं मुझको भाती ज़़रा
इसलिये तो ख़फ़ा है अमीरे-शहर

मन्ज़िलों के निशाँ तक नहीं मिलते हैं
देखिये मुश्किलों से भरा है सफ़़र

Page link-
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Saturday, June 27, 2015

कुमार सुनील की कविता

ये कुछ अजीब नहीं लगता 
की आप उनसे सवाल करें अपने 
गांव के बारे में 
और वे कथक की भावभंगिमाओं पर 
व्याख्यान देने लगें 
कई बार मुझे लगने लगता है 
मैंने दर्शनशास्त्र की कक्षा में 
पराठे बनाने की रेसिपी पूछ ली है 
ऐसे अवसरों पर उन्हें मैं शामियाने में 
खामखा घुस आये 
कुत्ते सा लगता होऊंगा 
कल ही तो एक अदना सवाल किया था 
पिछले दिनों मर गए किसान के बारे में 
और विदेश निति पर भाषण पिलाने लगे 
हद तो तब हो गई 
जब उनसे कहा 
बाबू जी हम कहाँ से खाएं दाल रोटी 
भाव दो देखिये जरा 
तो बोले 
काहे दिमाग का दही किये जा रहे हो 
काल रेट देखिये कितना सस्ता किये हैं 
जी भर के बतियाया कीजिये अब 
दाल रोटी के बिना मर थोड़े ना जाएंगे 
और भी बहुत कुछ है खाने को । 

बहुत से सवाल 
उस मितली की तरह होते हैं 
जो पेट में घुमड़ती तो है 
पर बाहर नहीं आती 
ये बड़ा तकलीफ देय होता है 
डर लगता है सवालों 
की उलटी से 
हो सकता है आपके सवाल बाहर 
निकलने से पहले ही 
आपका गला घोंट दिया जाये 
या आपकी गली सड़ी लाश 
गन्दे नाले में मिले 
कुछ भी हो 
ये सवाल जरूरी भी होते हैं 
लेकिन इस लोकतंत्र ने 
इतनी आज़ादी कहां दी है 
एक आम आदमी को 
की वह प्रधानमन्त्री की मेज पर 
सवालों की उल्टी कर सके ।

कविता - कम्मी ठाकुर

मैं समझ नहीं पाया

मैं अभी तक
समझ नहीं पाया
आखिर कैसे
युग-युगातंर की अच्छाई और सच्चाई
एक पल में
झूठ व बुराई से
हार जाती है
क्यों वर्षों के तप, यश,
सद्कर्म, धर्म और भलाई की कमाई
एक छोटी-सी भूल छीन लेती है

मैं आज तक
समझ नहीं पाया
दुनिया में अच्छाई, सच्चाई
और बुराई की सांकेतिक परिभाषा
क्योंकि अच्छाई और सच्चाई की डगर
संयमित, कठोर और विशाल
पदबंदो के बावजूद
अपने उसूलों, सिद्धांतो, नैतिकता
और मानवीय मूल्यों की स्थापना में
सदैव सीमान्त सैनिक की भाँति
अडिग, सतर्क और सावधान रहती है
किंतु फिर भी एक छोटी-सी
बुराई की गोली और बोली
उस कवचयुक्त सच्चाई और अच्छाई
की प्रतिमा को पलभर में
विखंडित कर उसे बदनाम कर देती है
फिर सच्चाई और अच्छाई को
अपने वजूद की खातिर
दुनिया में यदा-कदा-सर्वदा
महाभारत लड़़नी पड़ी है
भीष्म प्रतिज्ञा करनी पड़ी है
फिर भी आज स्थिति वहीं खड़ी है
इसके विपरीत अच्छाई व सच्चाई को
अपना अस्तित्व साबित करने के लिए
लम्बा संघर्ष करना पड़ता है
राम को वनवास,
भरत को सिंहासन त्याग,
पांडवों को अज्ञातवास
और कुमार श्रवण को
चार धाम से गुजरना पड़ता है
किंतु फिर भी आखिर क्यों
बुराई का साम्राज्य शाश्वत् है
और इंसां उस पर आशवस्त है
यह ज्ञात होते हुए भी कि
रहती सदैव अन्त में
विजय, अमर बाईबल, कुरान,
गुरू ग्रन्थ साहिब और गीता भागवत है
गीता भागवत है।

 कम्मी ठाकुर ‘‘मुसाफ़िर’’

ग़ज़ल - कृष्णा कुमारी 'कमसिन'

जब तू पहली बार मिला था
दिल इक गुञ्चे–सा चटका था

धूप में बारिश भीग रही थी
इन्द्रधनुष में चाँद खिला था

तू चुप था यह कैसे मानूं
मैंने सब कुछ साफ सुना था

सच ही मान लिया क्या तू ने
वो तो मैंने झूठ कहा था

अपनी हथेली पर मँहदी से
मैंने तेरा नाम लिखा था

दुख में मुझको छोड़ गया क्यूँ
तू ही तो मेरा अपना था

उस बारिश को कैसे भूलूँ
जब मैं भीगी, तू भीगा था

वो लम्हे कितने अच्छे थे
जिन मे तेरा साथ मिला था

उस दिन तुझ से मिलकर “कमसिन”
घर आकर इक गीत लिखा था




Friday, June 19, 2015

गीत - डॉ. प्रदीप शुक्ल

मेघा आये रे 

बिजुरी चमकी
धरती महकी
दादुर गाये रे !
मेघा आये, मेघा आये
मेघा आये रे !!

जोरों से चलती पुरवाई
छप्पर ऊपर बेल लजाई
पतली कमर टूट ना जाए
लिपटी है वो सौ बल खाई
बस मुंडेर की कग्गर उससे
छूट न जाए रे
मेघा आये, मेघा आये
मेघा आये रे !!

आसमान का पूरा आँगन
बदरा दौड़ रहे घोड़ा बन
आतिशबाजी करे बिजुरिया
बूँदें नाचे छनन छनन छन
जोर जोर से झींगुर
राग कहरवा गाये रे
मेघा आये, मेघा आये
मेघा आये रे !!

टपक रही छत कोने कोने
गीले सारे हुए बिछौने
घुस आया पानी दालान तक
खटिया मचिया लगा भिगोने
सिर पर बोरी डाले कक्का
छत पर धाये रे
मेघा आये, मेघा आये
मेघा आये रे !!

- डॉ. प्रदीप शुक्ल

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के हाइकु

हाइकु

बीता आषाढ़
मुदित है प्रकृति
पावस ऋतु।
2-
बहका मन
रिमझिम फुहारें
छुआ जो तन!
3-
पिया के बिन
हरी-भरी धरती
आहें भरती।
4-
सावन हँसा
सतरंगी हो गये
'दोनों' खो गये।
5-
हुई जो प्रात
कल की 'भीगी रात'
बात ही बात!
6-
मन-विभोर
छायी है हरियाली
मन ही चोर!
7-
आ मन नच
नदी-नौका-पर्वत
सपने सच।
8-
यादों के साये
'सीमा पर चौकसी'
सावन जाये।
9-
शिव को प्रिय
सावन का महीना
भक्ति में रमा।
10-
श्रद्धा में डूबे
चले हैं काँवरिया
जय भोले की!
11-
'आ छू ले मुझे'
जब ये हवा बहे
मुझसे कहे!
12-
सर्वत्र हरा
मगन है किसान
मगन धरा।
13-
आया 'मैसेज़'
आते ही सावन के
आ जायेंगे 'वो'!
14-
छाये बादल
उमस छू-मंतर
मन-कमल!
15-
शिव प्रसन्न
बम-बम की गूँज
शुभ ही शुभ!

-डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
(अध्यक्ष-अन्वेषी संस्था) फतेहपुर (उ.प्र.)-212601
मो.- 9839942005, 8574006355
ईमेल- doctor_shailesh@rediffmail.com 

Thursday, June 18, 2015

कविता - विजया भार्गव

इस बरसात में...

आज
इस बरसात मे
बहा दूँगी
तुझ से जुडी
हर चीज...
विसर्जित कर दूँगी
हमारे बीच का जोड़
कागज़ के वो पुर्जे बहाए
जो कभी खत कहलाते थे
उन में बसी खुशबू..?
कैसे बहाऊं
वो पीतल का छल्ला
बह गया..
पर उंगली पर पडा
ये निशान.
कैसे बहाऊं
ये रूमाल, ये दुप्पटा
सब बहा दिए
बचे
ढाई आखर
और
मन मे बसे तुम
कैसे बहाऊं..
लो..खोल दी मुट्ठी
कर दिया विसर्जित
इन के साथ
आज ..
खुद को भी बहा आई
कर आई
अपना विसर्जन
इस बरसात में...

-विजया भार्गव

ग़ज़ल - पवन अमर

ग़ज़ल 

वादा तो कर गये वो,
लेकिन मुकर गये वो ।

कुछ आदमी थे यहाँ,
अब जाने किधर गये वो ।

रात भर ठहर के तारे,
अल सुबह घर गये वो ।

इक बार देखा था,
दिल में उतर गये वो ।

फूल चुनने बैठे थे,
काँटों से भर गये वो ।

निकले जो घर से बाहर,
कुछ और निखर गये वो ।

चंद मोती संभाल रखे थे,
अश्कों में बिखर गये वो ।

- पवन अमर

त्रिलोक सिंह ठकुरेला के कुण्डलिया छंद

सावन  आया झूमकर

सावन  आया झूमकर, बरस रहा आकाश ।
जल की  बूँदें दे  रहीं,  सुख  का  मृदु अहसास ।।
सुख  का  मृदु  अहसास,  हुई अल्हड़  पुरवाई ।
विरही  हुए  अधीर,  काम  ने  आग  लगाई ।
' ठकुरेला ' कविराय, स्वप्न जागे  मनभावन ।
जगी  मिलन   की  आस, लौटकर  आया  सावन ।।

छम-छम छम-छम जल  गिरे, बरस  रहा  आनंद ।
मोर, पपीहा, कोकिला, गायें मिलकर  छंद  ।।
गायें मिलकर छंद, सभी की  मिटी उदासी ।
गूंजे आल्हा,  गीत, मल्हारें, बारहमासी ।
' ठकुरेला ' कविराय, घुल रही मन  में चम-चम ।
थिरके  सबके गात, थिरकती पावस छम-छम ।।        

पानी  बरसा गगन से, वसुधा हुई  निहाल । 
नदियाँ, नाले, कूप, सर,  सब  ही  मालामाल ।। 
सब  ही  मालामाल, खुशी  चौतरफा  छाई ।
महकी सौंधी गंध, प्यार  की  ऋतु  ले  आई ।
' ठकुरेला ' कविराय, लगा धरती इतरानी ।
सहसा आई  लाज,  हो  गयी  पानी पानी ।।

लेकर घट जल से भरे, घन दौड़े चहुँ  ओर  ।
मन चातक पागल हुआ, रह रह करता शोर  ।। 
रह  रह  करता शोर, प्रेम के  राग  सुनाये ।
काश, विरह  की  पीर, किसी  बदली तक  जाये ।
' ठकुरेला ' कविराय, जगत  का  सब  कुछ  देकर ।
हो  यह  जीवन  धन्य, प्यार  के  दो  पल लेकर ।।   

-  त्रिलोक  सिंह ठकुरेला 

गीत - श्वेता राय

प्रेम का रस छलका दो

सावन की रिमझिम बारिश में नेह प्रीत का राग सुना दो
प्रिय! तुम प्रेम का रस छलका दो|

जलती रातें विरह तपन से
सपने बहते द्रवित नयन से
मेघों के आगोश में छुप कर
मुस्काये चंदा भी गगन से
मेरी चाहत को प्रियवर तुम आशा का अवलम्ब दिला दो
प्रिय! तुम प्रेम का रस छलका दो|

देखूं छवि तब हरसे मन
प्रीत के मद में झूमे तन
प्रेम की इस रिमझिम फुहार से
सिक्त हो जीवन का कण कण
मेरी सपनों की बगिया में चाहत वाले फूल खिला दो
प्रिय! तुम प्रेम का रस छलका दो|

हुलसित मन को तेरे स्वर से
नापूं नभ मैं स्वप्निल पर से
सुन्दर स्नेहिल शुचि बन अपने
छू लेते जब अधर अधर से
मृतप्राय मेरी काया को प्रेम सुधा रस पान करा दो
प्रिय! तुम प्रेम का रस छलका दो|

- श्वेता राय




नज्में - हरकीरत 'हीर'

भरोसा 

कितनी बार
भरोसा किया था तुम पर
पर हर बार भरोसे के धागे टूटते रहे
आज उदासियाँ आँखों में खड़ी
पूछती हैं मुझसे
हीर तेरे घर भरोसे की कोई
तस्वीर क्यों नहीं ....

(2)

सन्नाटे …

कभी इन खिड़कियों को
जितनी उम्मीद से खोला था मैंने
सन्नाटे उतने ही टूट कर अंदर आये
अब उम्मीदें नहीं पूछतीं
तुम्हारे मकान की खिड़कियाँ
बंद क्यों हैं ……

(3)

ज़ख़्म ...

यादों को उलटते- पलटते
खुल जाते हैं अक्सर दर्द की टांके
वक़्त भी नहीं भर पाता
सारी उम्र …
मुहब्बत के ज़ख़्म ....

-हरकीरत 'हीर, गुवहाटी  

दोहे - कुमार गौरव अजीतेन्दु

धुन सावन की बज रही

ज्यों ही तन-मन में लगा, मस्त सावनी बाण।
अम्बर करने लग गया, मेघों का निर्माण॥

पूरी होने को पुनः हरियाली की आस।
बुझा जेठ की आग को, सावन आया पास॥

हरा-भरा फिर से हुआ, गोरी का श्रृंगार।
सावन बन बरसी मगन, साजन की मनुहार॥

धुन सावन की बज रही, करते नृत्य मयूर।
इक-दूजे से बोलते, कभी न जाना दूर॥

नदियाँ उपलाने लगीं, छलक रहें हैं ताल।
सब पर सावन का नशा, करने लगा कमाल॥

- कुमार गौरव अजीतेन्दु
शाहपुर, दानापुर (कैन्ट)

गीत - हरीन्द्र यादव

संगीत सुनाया सावन ने 

नील गगन में मेघमाल को, न्योत बुलाया सावन ने।
ढोलक, झांझ, मंजीरा का, संगीत सुनाया सावन ने।

नदी, ताल, सरवर, पोखर को, नवजीवन का दान मिला।
इन्द्रधनुष के सात रंगों से, जीवन को नव गान मिला।।
तेज तपन से मुक्ति देकर, मन हरियाया सावन ने।

दादुर, मोर, पपीहे बोलें, चमकें जुगनू टिमटिम से।
त्यौहारों की बगिया में, फल-फूल लगाए रिमझिम के।।
भाग-दौड़ की धूप-छांव में, मन उमगाया सावन ने।

पुरवा पवन चले सावन में, घटा उठे काली घनघोर।
पुलकित होकर किलकें बालक, नाच उठे सबका मन-मोर।
खुशियों की किलकारी सुनकर, शीश उठाया सावन ने।

व्यथा-कथा का पन्ना-पन्ना, बांच रहे थे जितने जन।
गीत और संगीत सुनें तो, हर्षित होते सबके मन।
अम्मां जैसी थपकी देकर, थपक सुलाया सावन ने।

हरियाली की चूनर ओढ़़े, छटा अनोखी छाई है।
रूप अनूप धारकर धरती, मन ही मन इतराई है।।
अरमानों के झूले ऊपर, खूब झुलाया सावन ने।

-हरीन्द्र यादव, गुड़गाँव

गीत - कल्पना रामानी

बरखा रानी नाम तुम्हारे

बरखा रानी! नाम तुम्हारे,
निस दिन मैंने छंद रचे।
रंग-रंग के भाव भरे,
सुख-दुख के आखर चंद रचे।
         
पाला बदल-बदल कर मौसम,
रहा लुढ़कता इधर उधर।
कहीं घटा घनघोर कहीं पर,
राह देखते रहे शहर।

कहीं प्यास तो कहीं बाढ़ के,
सूखे-भीगे बंद रचे।

कभी वादियों में सावन के,
संग सुरों में मन झूमा।
कभी झील-तट पर फुहार में,
पाँव-पाँव पुलकित घूमा।

कहीं गजल के शेर कह दिये,
कहीं गीत सानंद रचे।

कभी दूर वीरानों में,
गुमनाम जनों के गम खोदे।
अतिप्लावन या अल्प वृष्टि ने,
जिनके सपन सदा रौंदे।

गाँवों के पैबंद उकेरे,
शहर चाक-चौबन्द रचे।


-कल्पना रामानी

ग़ज़ल - राहुल गुप्ता

मुझको हिन्दुस्तानी लिखना

बातें नयी पुरानी लिखना ।
गीत कोई रूमानी लिखना ।

मुश्किल वक्त कठिन राह में,
बच्चों की नादानी लिखना ।

हिन्दू मुस्लिम के झगड़ों को,
शासन की शैतानी लिखना ।

भूख गरीबी के आलम में,
सबको दाना पानी लिखना ।

मस्तानों की टोली के संग,
मस्ती भरी जवानी लिखना ।

देश धरा की बात लिखो तो,
धरती अपनी धानी लिखना ।

प्यार मोहब्बत की बातों में,
मीरा-सी दीवानी लिखना ।

मेरा परिचय पूछे 'राहुल',
मुझको हिन्दुस्तानी लिखना ।

-राहुल गुप्ता, (मथुरा)

गीत - लक्ष्मण रामानुज लडीवाला

रिमझिम रिमझिम सावन आया  

वसुधा पर छाई हरियाली
खेतों में भी रंगत आई |
धरती के आँगन में बिखरी
मखमल-सी हरियाली छाई ||
     
रिमझिम-रिमझिम सावन आया
वन उपवन में यौवन छाया |

उमड़ घुमड़ बदली बरसाए
सावन मन बहकाता जाए |
साजन लौट जब घर आये
गाल गुलाबी रंगत लाये ||
     
रिमझिम-रिमझिम सावन आया
वन उपवन में यौवन छाया |

जिया पिया का खिलखिल जाए  
नयनों से अमरित बरसाए |
तन मन में यौवन छा जाए
पिया मिलन के पल जब जाए ||
     
रिमझिम-रिमझिम सावन आया
वन उपवन में यौवन छाया |

साजन ने गजरे में गूंथा
गेंदे की मुस्काई कलियाँ |
बागों में झूला डलवाया
झूला झूले सारी सखियाँ ||
     
रिमझिम-रिमझिम सावन आया
वन उपवन में यौवन छाया |

शीतल मंद हवा का झोंका
मस्त मधुर यौवन गदराया |
मटक-मटक कर चमके बिजुरी
सजनी का भी मन इतराया ||
     
रिमझिम-रिमझिम सावन आया
वन उपवन में यौवन छाया |

हरियाली तीज त्यौहार में
चंद्रमुखी सी सजती सखियाँ
शिव गौरी की पूजा करती
मेहंदी रचे हाथों से सखियाँ |
     
रिमझिम-रिमझिम सावन आया
वन उपवन में यौवन छाया |

चंद्रमुखी मृगलोचनी-सी
नवल वस्त्र में सजकर सखियाँ |
झूम-झूम कर नाचे गावें
दृश्य देख हर्षाएं रसियाँ ||
     
रिमझिम रिमझिम सावन आया
वन उपवन में यौवन छाया |


-लक्ष्मण रामानुज लडीवाला