ये कुछ अजीब नहीं लगता
की आप उनसे सवाल करें अपने
गांव के बारे में
और वे कथक की भावभंगिमाओं पर
व्याख्यान देने लगें
कई बार मुझे लगने लगता है
मैंने दर्शनशास्त्र की कक्षा में
पराठे बनाने की रेसिपी पूछ ली है
ऐसे अवसरों पर उन्हें मैं शामियाने में
खामखा घुस आये
कुत्ते सा लगता होऊंगा
कल ही तो एक अदना सवाल किया था
पिछले दिनों मर गए किसान के बारे में
और विदेश निति पर भाषण पिलाने लगे
हद तो तब हो गई
जब उनसे कहा
बाबू जी हम कहाँ से खाएं दाल रोटी
भाव दो देखिये जरा
तो बोले
काहे दिमाग का दही किये जा रहे हो
काल रेट देखिये कितना सस्ता किये हैं
जी भर के बतियाया कीजिये अब
दाल रोटी के बिना मर थोड़े ना जाएंगे
और भी बहुत कुछ है खाने को ।
बहुत से सवाल
उस मितली की तरह होते हैं
जो पेट में घुमड़ती तो है
पर बाहर नहीं आती
ये बड़ा तकलीफ देय होता है
डर लगता है सवालों
की उलटी से
हो सकता है आपके सवाल बाहर
निकलने से पहले ही
आपका गला घोंट दिया जाये
या आपकी गली सड़ी लाश
गन्दे नाले में मिले
कुछ भी हो
ये सवाल जरूरी भी होते हैं
लेकिन इस लोकतंत्र ने
इतनी आज़ादी कहां दी है
एक आम आदमी को
की वह प्रधानमन्त्री की मेज पर
सवालों की उल्टी कर सके ।
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