Saturday, June 27, 2015

कुमार सुनील की कविता

ये कुछ अजीब नहीं लगता 
की आप उनसे सवाल करें अपने 
गांव के बारे में 
और वे कथक की भावभंगिमाओं पर 
व्याख्यान देने लगें 
कई बार मुझे लगने लगता है 
मैंने दर्शनशास्त्र की कक्षा में 
पराठे बनाने की रेसिपी पूछ ली है 
ऐसे अवसरों पर उन्हें मैं शामियाने में 
खामखा घुस आये 
कुत्ते सा लगता होऊंगा 
कल ही तो एक अदना सवाल किया था 
पिछले दिनों मर गए किसान के बारे में 
और विदेश निति पर भाषण पिलाने लगे 
हद तो तब हो गई 
जब उनसे कहा 
बाबू जी हम कहाँ से खाएं दाल रोटी 
भाव दो देखिये जरा 
तो बोले 
काहे दिमाग का दही किये जा रहे हो 
काल रेट देखिये कितना सस्ता किये हैं 
जी भर के बतियाया कीजिये अब 
दाल रोटी के बिना मर थोड़े ना जाएंगे 
और भी बहुत कुछ है खाने को । 

बहुत से सवाल 
उस मितली की तरह होते हैं 
जो पेट में घुमड़ती तो है 
पर बाहर नहीं आती 
ये बड़ा तकलीफ देय होता है 
डर लगता है सवालों 
की उलटी से 
हो सकता है आपके सवाल बाहर 
निकलने से पहले ही 
आपका गला घोंट दिया जाये 
या आपकी गली सड़ी लाश 
गन्दे नाले में मिले 
कुछ भी हो 
ये सवाल जरूरी भी होते हैं 
लेकिन इस लोकतंत्र ने 
इतनी आज़ादी कहां दी है 
एक आम आदमी को 
की वह प्रधानमन्त्री की मेज पर 
सवालों की उल्टी कर सके ।

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