Thursday, June 18, 2015

त्रिलोक सिंह ठकुरेला के कुण्डलिया छंद

सावन  आया झूमकर

सावन  आया झूमकर, बरस रहा आकाश ।
जल की  बूँदें दे  रहीं,  सुख  का  मृदु अहसास ।।
सुख  का  मृदु  अहसास,  हुई अल्हड़  पुरवाई ।
विरही  हुए  अधीर,  काम  ने  आग  लगाई ।
' ठकुरेला ' कविराय, स्वप्न जागे  मनभावन ।
जगी  मिलन   की  आस, लौटकर  आया  सावन ।।

छम-छम छम-छम जल  गिरे, बरस  रहा  आनंद ।
मोर, पपीहा, कोकिला, गायें मिलकर  छंद  ।।
गायें मिलकर छंद, सभी की  मिटी उदासी ।
गूंजे आल्हा,  गीत, मल्हारें, बारहमासी ।
' ठकुरेला ' कविराय, घुल रही मन  में चम-चम ।
थिरके  सबके गात, थिरकती पावस छम-छम ।।        

पानी  बरसा गगन से, वसुधा हुई  निहाल । 
नदियाँ, नाले, कूप, सर,  सब  ही  मालामाल ।। 
सब  ही  मालामाल, खुशी  चौतरफा  छाई ।
महकी सौंधी गंध, प्यार  की  ऋतु  ले  आई ।
' ठकुरेला ' कविराय, लगा धरती इतरानी ।
सहसा आई  लाज,  हो  गयी  पानी पानी ।।

लेकर घट जल से भरे, घन दौड़े चहुँ  ओर  ।
मन चातक पागल हुआ, रह रह करता शोर  ।। 
रह  रह  करता शोर, प्रेम के  राग  सुनाये ।
काश, विरह  की  पीर, किसी  बदली तक  जाये ।
' ठकुरेला ' कविराय, जगत  का  सब  कुछ  देकर ।
हो  यह  जीवन  धन्य, प्यार  के  दो  पल लेकर ।।   

-  त्रिलोक  सिंह ठकुरेला 

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