सावन आया झूमकर
सावन आया झूमकर, बरस रहा आकाश ।
जल की बूँदें दे रहीं, सुख का मृदु अहसास ।।
सुख का मृदु अहसास, हुई अल्हड़ पुरवाई ।
विरही हुए अधीर, काम ने आग लगाई ।
' ठकुरेला ' कविराय, स्वप्न जागे मनभावन ।
जगी मिलन की आस, लौटकर आया सावन ।।
छम-छम छम-छम जल गिरे, बरस रहा आनंद ।
मोर, पपीहा, कोकिला, गायें मिलकर छंद ।।
गायें मिलकर छंद, सभी की मिटी उदासी ।
गूंजे आल्हा, गीत, मल्हारें, बारहमासी ।
' ठकुरेला ' कविराय, घुल रही मन में चम-चम ।
थिरके सबके गात, थिरकती पावस छम-छम ।।
पानी बरसा गगन से, वसुधा हुई निहाल ।
नदियाँ, नाले, कूप, सर, सब ही मालामाल ।।
सब ही मालामाल, खुशी चौतरफा छाई ।
महकी सौंधी गंध, प्यार की ऋतु ले आई ।
' ठकुरेला ' कविराय, लगा धरती इतरानी ।
सहसा आई लाज, हो गयी पानी पानी ।।
लेकर घट जल से भरे, घन दौड़े चहुँ ओर ।
मन चातक पागल हुआ, रह रह करता शोर ।।
रह रह करता शोर, प्रेम के राग सुनाये ।
काश, विरह की पीर, किसी बदली तक जाये ।
' ठकुरेला ' कविराय, जगत का सब कुछ देकर ।
हो यह जीवन धन्य, प्यार के दो पल लेकर ।।
- त्रिलोक सिंह ठकुरेला
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