प्रेम का रस छलका दो
सावन की रिमझिम बारिश में नेह प्रीत का राग सुना दोप्रिय! तुम प्रेम का रस छलका दो|
जलती रातें विरह तपन से
सपने बहते द्रवित नयन से
मेघों के आगोश में छुप कर
मुस्काये चंदा भी गगन से
मेरी चाहत को प्रियवर तुम आशा का अवलम्ब दिला दो
प्रिय! तुम प्रेम का रस छलका दो|
देखूं छवि तब हरसे मन
प्रीत के मद में झूमे तन
प्रेम की इस रिमझिम फुहार से
सिक्त हो जीवन का कण कण
मेरी सपनों की बगिया में चाहत वाले फूल खिला दो
प्रिय! तुम प्रेम का रस छलका दो|
हुलसित मन को तेरे स्वर से
नापूं नभ मैं स्वप्निल पर से
सुन्दर स्नेहिल शुचि बन अपने
छू लेते जब अधर अधर से
मृतप्राय मेरी काया को प्रेम सुधा रस पान करा दो
प्रिय! तुम प्रेम का रस छलका दो|
- श्वेता राय
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