Thursday, June 18, 2015

दोहे - कुमार गौरव अजीतेन्दु

धुन सावन की बज रही

ज्यों ही तन-मन में लगा, मस्त सावनी बाण।
अम्बर करने लग गया, मेघों का निर्माण॥

पूरी होने को पुनः हरियाली की आस।
बुझा जेठ की आग को, सावन आया पास॥

हरा-भरा फिर से हुआ, गोरी का श्रृंगार।
सावन बन बरसी मगन, साजन की मनुहार॥

धुन सावन की बज रही, करते नृत्य मयूर।
इक-दूजे से बोलते, कभी न जाना दूर॥

नदियाँ उपलाने लगीं, छलक रहें हैं ताल।
सब पर सावन का नशा, करने लगा कमाल॥

- कुमार गौरव अजीतेन्दु
शाहपुर, दानापुर (कैन्ट)

1 comment:

  1. बहुत रोचक व सुंदर विशेषांक, मेरे दोहों को सम्मिलित करने के लिए हृदय से आभारी हूँ...........

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