धुन सावन की बज रही
ज्यों ही तन-मन में लगा, मस्त सावनी बाण।
अम्बर करने लग गया, मेघों का निर्माण॥
पूरी होने को पुनः हरियाली की आस।
बुझा जेठ की आग को, सावन आया पास॥
हरा-भरा फिर से हुआ, गोरी का श्रृंगार।
सावन बन बरसी मगन, साजन की मनुहार॥
धुन सावन की बज रही, करते नृत्य मयूर।
इक-दूजे से बोलते, कभी न जाना दूर॥
नदियाँ उपलाने लगीं, छलक रहें हैं ताल।
सब पर सावन का नशा, करने लगा कमाल॥
- कुमार गौरव अजीतेन्दु
शाहपुर, दानापुर (कैन्ट)
ज्यों ही तन-मन में लगा, मस्त सावनी बाण।
अम्बर करने लग गया, मेघों का निर्माण॥
पूरी होने को पुनः हरियाली की आस।
बुझा जेठ की आग को, सावन आया पास॥
हरा-भरा फिर से हुआ, गोरी का श्रृंगार।
सावन बन बरसी मगन, साजन की मनुहार॥
धुन सावन की बज रही, करते नृत्य मयूर।
इक-दूजे से बोलते, कभी न जाना दूर॥
नदियाँ उपलाने लगीं, छलक रहें हैं ताल।
सब पर सावन का नशा, करने लगा कमाल॥
- कुमार गौरव अजीतेन्दु
शाहपुर, दानापुर (कैन्ट)
बहुत रोचक व सुंदर विशेषांक, मेरे दोहों को सम्मिलित करने के लिए हृदय से आभारी हूँ...........
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