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Saturday, October 17, 2015

महेन्द्र जैन के बाल काव्य संग्रह 'हंसते और हंसाते जाना' का लोकार्पण

काव्य गोष्ठी का भी आयोजन

हिसार, 17 अक्तूबर (सुमन जैन सत्यगीता)| चन्दनबाला जैन साहित्य मंच के तत्वावधान में सैक्टर-13 स्थित जैन सदन के प्रांगण में गजलकार व बाल साहित्यकार महेन्द्र जैन के तीसरे बाल काव्य संग्रह 'हंसते और हंसाते जाना' का लोकार्पण नगर के वरिष्ठ साहित्यकारों व गुडग़ांव से पधारे एन.आर.सी. के पूर्व निदेशक डॉ. शैलेन्द्र द्विवेदी के कर-कमलों द्वारा हुआ। राज्यकवि उदयभानु हंस के सान्निध्य व अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. शैलेन्द्र द्विवेदी थे तथा द्विवेदी जी की धर्मपत्नी उषा द्विवेदी व एन.आई.सी. के टैक्नीकल डायरेक्टर एम.पी. कुलश्रेष्ठ विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे।
कार्यक्रम संचालिका सुमन जैन सत्यगीता ने बताया कि इस अवसर पर द्विवेदी दम्पति के सम्मान में काव्य गोष्ठी का आयोजन भी किया गया जिसमें नगर के लगभग सभी वरिष्ठ रचानाकारों ने शिरकत की। डॉ. राधेश्याम शुक्ल की रचना की एक बानगी देखिए - 'ईंट पत्थर के शहर को हम, आदमी का शहर बनने दें।' प्रो. रघुवीर अनाम की गजल ने खूब वाहवाही लूटी - 'कोई किसी आवाज को पहचानता नहीं। अब आदमी को आदमी से वास्ता नहीं।' प्रो. कुमार रवीन्द्र ने अपने नवगीत की छटा यूँ बिखेरी- 'दूरदृष्टि से देख रहे हम घटनाओं की यही समस्या है। पोस रहे हम उल्टी-सीधी इच्छाओं को यही समस्या है।' राज्य कवि उदयभानु हंस ने भी अपने सामाजिक दायित्व को निभाते हुए गजल के माध्यम से कहा- 'मैं न मन्दिर न मस्जिद गया। कोई पोथी न बांची कभी। एक दुखिया के आंसू चुने। बस मेरी बन्दगी हो गई।' काव्य अनुरागी एम.पी. कुलश्रेष्ठ के गीत को भी खूब सराहा गया- 'मैं वहीं पर खड़ा तुमको मिल जाउंगा। जिस जगह जाओगे तुम मुझे छोडक़र।' प्रिंसीपल आई.जे. नाहल के व्यंग्यात्मक स्वर की गूंज देखिए- 'बिकाऊ लोगों की मंडी में टिकाऊ लोगों को ढूंढ रहा।' महेन्द्र जैन ने अपनी गजल के माध्यम से खुद को देश पर समर्पित करते हुए कहा- 'मेरे नाम सारे तू इल्जाम लिख दे। मुझे गम नहीं चाहे बदनाम लिख दे। है जिसकी अमानत उसी को समर्पित। मेरी जिन्दगी देश के नाम लिख दे।' सुमन जैन सत्यगीता ने भी सस्वर गजल गायन किया- 'मिलती जन्नत तो नहीं है बाद मरने के कभी। जीते-जी मर जाइए अब बात ये अच्छी लगी।'
इस अवसर पर रंजीत सिंह टाडा, विनोद शंकर गुप्त, ममता शर्मा, सरताज सिंह मुसाफिर, प्रीति जैन, साकेत जैन व हिना जैन भी उपस्थित रहे।

Saturday, July 18, 2015

दुबई में सम्मानित हुए डॉ.यायावर

अन्तरराष्ट्रीय साहित्य कला मंच का तीसवां वार्षिक समारोह दुबई में 5 जून से 9 जून तक आयोजित हुआ| जिसमें 6 जून को सरस्वती सभागार दुबई ग्रैंड होटल दुबई में डॉ.राम सनेहीलाल शर्मा 'यायावर' को सम्मानित कर "साहित्य श्री" की मानद उपाधि प्रदान की गई|
समारोह के दौरान 'विश्व पटल पर हिंदी' विषय पर संगोष्ठी हुयी जिसका सफल सञ्चालन डॉ. यायावर ने किया| संगोष्ठी में भारत के 10 प्रदेशों के अलावा 6 अन्य देशों के प्रतिनिधियों ने भी अपने आलेख प्रस्तुत करते हुए हिंदी को भविष्य की भाषा बताया| 
संगोष्ठी में डॉ.पूर्णिमा वर्मन मुख्यातिथि थीं और अध्यक्षता डॉ.रामावतार शर्मा ने की| इस अवसर पर अमेरिका के प्राण जग्गी और मेजर शेर बहादुर विशिष्ठ अतिथि थे| दुबई के मुख्या वक्ता डॉ.त्रिलोक नाथ थे| 
6 जून को मंच के संस्थापक अध्यक्ष डॉ.महेश दिवाकर के सञ्चालन में विभिन्न साहित्यकारों को सम्मानित किया गया| डॉ. यायावर को उनकी साहित्य साधना के उपलक्ष्य में 'साहित्य श्री' की मानद उपाधि प्रदान करके सम्मानित किया गया| 
उल्लेखनीय है कि डॉ यायावर की अब तक 21 मौलिक और 10 सम्पादित कृतिया प्रकाशित हो चुकी हैं| शताधिक कृतियों में उनकी लेखकीय सहभागिता है|

Sunday, June 14, 2015

'कुण्डलिया संचयन' का प्रकाशन

आधुनिक छंद मुक्त कविता के दौर में प्राचीन भारतीय छंदों का चलन जैसे बीते युग की बात हो चला था| ऐसे में प्राचीन भारतीय छंदों को पुनर्जीवन प्रदान कर उन्हें पुनर्स्थापित करने में कई साहित्यकार बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं| त्रिलोक सिंह ठकुरेला सुपरिचित कुण्डलियाकार हैं। इन्होंने कुण्डलिया छंद के उन्नयन के लिए 'कुण्डलिया छंद के सात हस्ताक्षर' और 'कुण्डलिया-कानन' का सम्पादन किया है। अब श्री त्रिलोक सिंह ठकुरेला द्वारा सम्पादित तीसरा कुण्डलिया संकलन 'कुण्डलिया संचयन' निकट भविष्य में साहित्यजगत के समक्ष होगा | कुण्डलिया संकलन 'कुण्डलिया संचयन' में सर्वश्री अशोक कुमार रक्ताले , डा.जगन्नाथ प्रसाद बघेल , डा.ज्योत्स्ना शर्मा ,परमजीत कौर 'रीत' ,डा. प्रदीप शुक्ल , महेंद्र कुमार वर्मा ,राजेंद्र बहादुर सिंह 'राजन' ,राजेश प्रभाकर , शिवानंद सिंह 'सहयोगी' , शून्य आकांक्षी , साधना ठकुरेला , हातिम जावेद , हीरा प्रसाद 'हरेंद्र' और त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कुण्डलियां संकलित हैं|

Sunday, April 19, 2015

हरियाणा साहित्य अकादमी सूचना पत्र 2015 जारी

हरियाणा साहित्य अकादमी ने लेखकों एवं संस्थाओं के लिए सूचना पत्र 2015 जारी कर दिया है|  हरियाणा के साहित्यकार पुरस्कार/सम्मान, श्रेष्ठ कृति पुरस्कार, पुस्तक प्रकाशन हेतु अनुदान, कहानी प्रतियोगिता आदि के लिए आवेदन भेज सकते हैं|
अंतिम तिथि- आवेदन भेजने की अंतिम तिथि 30 अप्रैल, 2015 है|
सूचना पत्र अकादमी के कार्यालय से प्राप्त किया जा सकता है, डाक से मंगवाया जा सकता है या वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है| अधिक जानकारी और आवेदन पत्र के लिए अकादमी की साईट का लिंक है haryanasahityaakademi.org 

Wednesday, April 1, 2015

‘समाज का प्रतिबिम्ब हैं नवगीत’ विषय पर चर्चा

नई दिल्ली| दिल्ली स्थित प्रगति मैदान में संपन्न विश्व पुस्तक मेला 2015 में समाज का प्रतिबिम्ब हैं नवगीत विषय पर व्यापक  परिचर्चा हुई।  पुस्तक मेले में पहली बार नवगीत विधा पर केन्द्रित आयोजन में बाहर से पधारे तथा स्थानीय रचनाधर्मियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की| संचालक एवं नवगीतकार ओमप्रकाश तिवारी मुम्बई ने विषय प्रवर्तन करते हुए लगभग 50 वर्ष से लिखे जा रहे किन्तु छन्दहीन कविता जैसी अन्य विधाओं की तुलना में नवगीत की अनदेखी किये जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए  इस धारणा को निराधार बताया कि छांदस रचनाएं जीवन की समस्याओं का बयान नहीं कर पातीं।

गीत विधा को भारतीय समाज का अभिन्न अंग बताते हुए नवगीतकार सौरभ पांडे ने नवगीत के औचित्य को प्रतिपादित करते हुए कहा कि गीत अमूर्त-वायवीय तत्त्वों की प्रतीति सरस ढंग से करा पाते हैंजबकि नवगीत आज के समाज के सुख-दुख को सरसता से सामने लाते हैं।

चर्चित नवगीतकार-नवगीत समीक्षक आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने आदि मानव के जीवन में गीति के उत्स को इंगित करते हुए नवता युक्त कथ्य, लय, सम्प्रेषणीयता, संक्षिप्तता, चारूत्व, लाक्षणिकता, सामयिकता, छान्दसिकता तथा स्वाभाविकता को नवगीत के तत्व बताते हुए उसे युगाभिव्यक्ति करने में समर्थ बताया।

वरिष्ठ नवगीतकार राधेश्याम बंधु ने छांदस साहित्य के प्रति दुराग्रही दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए, छन्दहीन साहित्य को नीरस, एकांगी तथा अपूर्ण बताया| उन्होंने छंद युक्त रचनाओं की विशेषता बताते हुए कहा कि जनसामान्य की मनोभावनाएँ गीतों के जरिए ही अभिव्यक्त और अनुभूत की जा सकती हैं और यह दायित्व आज के नवगीतकार बखूबी निभा रहे हैं।

चर्चा का समापनकर्ता वरिष्ठ नवगीतकार डॉ.जगदीश व्योम के अनुसार नई कविता जो बात छंदमुक्त होकर कहती हैवही बात लय और शब्द प्रवाह के माध्यम से नवगीत व्यक्त करते हैं। परिसंवाद के पश्चात पुस्तक मेले के साहित्य मंच पर सर्वश्री जगदीश पंकजयोगेंद्र शर्मा, डॉ. राजीव श्रीवास्तव, शरदिंदु मुखर्जी, वेद शर्मा, राजेश श्रीवास्तव, गीता पंडितमहिमाश्री, गीतिका वेदिका आदि नवगीतकारों ने नवगीत के विभिन्न आयामों पर चर्चा कर शंकाओं का समाधान पाया।


Tuesday, March 24, 2015

त्रिलोक सिंह ठकुरेला को ब्रज-गौरव सम्मान


आगरा, 22 मार्च|
अखिल भारतीय साहित्य परिषद (न्यास ) की ब्रज प्रान्त इकाई का दो दिवसीय अधिवेशन कालिंद्री विहारआगरा स्थित त्रिदेव फ़ार्म हाउस में संपन्न हुआ। श्री रविन्द्र शुक्ल (पूर्व शिक्षा मंत्री उत्तर प्रदेश) के विशिष्ठ आतिथ्य में चिंतन बैठककाव्य-संध्या एवं सम्मान समारोह का आयोजन परिषद के संयोजक श्री ग़ाफ़िल स्वामी द्वारा किया गया। इस अवसर पर सुपरिचित कुण्डलियाकार एवं साहित्यकार श्री त्रिलोक सिंह ठकुरेला को उनके साहित्यिक योगदान के लिए 'ब्रज-गौरव सम्मानसे सम्मानित किया गया। डॉ.भगवती प्रसाद मिश्र 'अतीत', ग़ाफ़िल स्वामी और डॉ.शेष पाल सिंह 'शेषने माल्यार्पणशॉल एवं सम्मान-पत्र देकर श्री त्रिलोक सिंह ठकुरेला को सम्मानित किया गया। वरिष्ठ गीतकार श्री सोम ठाकुर को 'ब्रज-भूषणडॉ. दीन मुहम्मद दींन को 'ब्रज-रत्न', जय सिंह नीरद को ब्रज-भारती', डॉ.भगवती प्रसाद मिश्र 'अतीतको ब्रज-मनीषीएवं श्री संतोष कटारा को 'ब्रज-मार्तण्डकी उपाधि से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर अवशेष कुमार विमल द्वारा संपादित 'शेषामृतपत्रिका के डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहजविशेषांक सहित कई पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया।

Thursday, March 19, 2015

रघुविन्द्र यादव की लघुकथाएँ सामाजिक विसंगतियों को बेनकाब करती हैं : अशोक लव


-रघुविन्द्र यादव का लघुकथा संग्रह लोकार्पित
रघुविन्द्र यादव के दोहे जितने धारदार हैं, उनकी लघुकथाएँ भी उतनी ही पैनी धार वाली हैं। जिनमें आज के समाज का यथार्थ चित्रण है वहीं सामाजिक विद्रुपताओं और विसंगतियों को बेनकाब किया गया है।
उक्त विचार देश के सुप्रसिद्ध लघुकथाकार अशोक लव ने विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली में नारनौल के चर्चित साहित्यकार रघुविन्द्र यादव के दूसरे लघुकथा संग्रह अपनी-अपनी पीड़ा का लोकार्पण करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि रघुविन्द्र यादव ने इन लघुकथाओं के माध्यम से समाज के विभिन्न रूपों को चित्रित किया है। इसके लिए उन्होंने जीवंत और प्रभावशाली पात्रों का सृजन किया है। श्री यादव की एक साल में अलग-अलग विधा की चार पुस्तकों का प्रकाशन उन्हें बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न रचनाकार के रूप में स्थापित करता है।
रघुविन्द्र यादव के दो दोहा संग्रह-नागफनी के फूल और वक्त करेगा फैसला’, दो लघुकथा संग्रह-बोलता आईना और अपनी-अपनी पीड़ा’, एक कुंडलिया छंद संग्रह-मुझमें संत कबीर तथा एक प्रेरक निबंध संग्रह-कामयाबी की यात्रा के अलावा चार संपादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और वे शोध तथा साहित्य की राष्ट्रीय पत्रिका बाबूजी का भारतमित्र का 2009 से संपादन कर रहे हैं। पर्यावरण कार्यकर्ता के रूप में भी उनकी पहचान है, यादव राष्ट्रीय जल बिरादरी की अरावली भू-सांस्कृतिक ईकाइ के समन्वय और नागरिक चेतना मंच के अध्यक्ष हैं।
इस अवसर पर प्रख्यात लघुकथाकार रामेश्वर कांबोज हिमांशु, अशोक वर्मा, अशोक मिश्र, हरनाम शर्मा, कवि कृष्णगोपाल विद्यार्थी, राजेश प्रभाकर, रतनलाल, श्रीमती चन्द्रप्रभा सूद, राधेश्याम भारतीय, गुरचरण सिंह और प्रकाशक भूपाल सूद सहित अनेक साहित्यकार उपस्थित थे।