Thursday, June 18, 2015

कविता - विजया भार्गव

इस बरसात में...

आज
इस बरसात मे
बहा दूँगी
तुझ से जुडी
हर चीज...
विसर्जित कर दूँगी
हमारे बीच का जोड़
कागज़ के वो पुर्जे बहाए
जो कभी खत कहलाते थे
उन में बसी खुशबू..?
कैसे बहाऊं
वो पीतल का छल्ला
बह गया..
पर उंगली पर पडा
ये निशान.
कैसे बहाऊं
ये रूमाल, ये दुप्पटा
सब बहा दिए
बचे
ढाई आखर
और
मन मे बसे तुम
कैसे बहाऊं..
लो..खोल दी मुट्ठी
कर दिया विसर्जित
इन के साथ
आज ..
खुद को भी बहा आई
कर आई
अपना विसर्जन
इस बरसात में...

-विजया भार्गव

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