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Friday, July 3, 2015

आओ दोहा लिखें - रघुविन्द्र यादव

दो पंक्तियोंं और चार चरणों में 13-11, 13-11 के क्रम में कुल 48 मात्राओं से लिखा जाने वाला छंद दोहा कहलाता है। इससे कम या अधिक मात्राओं वाली रचना मानक दोहा की श्रेणी में नहीं आती। मात्राओं के अलावा दोहे का कथ्य, शिल्प, भाव और भाषा भी प्रभावशाली हो। 
आधुनिक दोहा को लोकप्रिय बनाने में सर्वाधिक योगदान करने वाले आचार्य देवेन्द्र शर्मा इन्द्र के अनुसार-''दोहा छंद की दृष्टि से एकदम चुस्त-दुरुस्त और निर्दोष हो। कथ्य सपाट बयानी से मुक्त हो। भाषा चित्रमयी और संगीतात्मक हो। बिंब और प्रतीकों का प्रयोग अधिक से अधिक मात्रा में हो। दोहे का कथ्य समकालीन और आधुनिक बोध से संपन्न हो। उपदेशात्मक नीरसता और नारेबाजी की फूहड़ता से मुक्त हो।"
डॉ.अनंतराम मिश्र अनंत दोहे की आत्मकथा में लिखते हैं-''भाषा मेरा शरीर, लय मेरे प्राण और रस मेरी आत्मा है। कवित्व मेरा मुख, कल्पना मेरी आँख, व्याकरण मेरी नाक, भावुकता मेरा हृदय तथा चिंतन मेरा मस्तिष्क है। प्रथम-तृतीय चरण मेरी भुजाएँ एवं द्वितीय-चतुर्थ चरण मेरे चरण हैं।"
आशय यह कि प्रथम और तृतीय चरण में 13-13 और दूसरे तथा चौथे चरण मेें 11-11 मात्राएँ जोड़ लेने भर से दोहा नहीं बन जाता। इसके लिए और भी बहुत कुछ चाहिए। दोहे के प्रथम और तृतीय चरण का समापन लघु गुरु या तीन लघु से होना अनिवार्य है। इसी प्रकार दोहा के दूसरे और चौथे चरण का अंत गुरु लघु से होना अनिवार्य है। 
दोहा एक अर्धसम मात्रिक छंद है, इसलिए सबसे पहले मात्राओं की गणना का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है। जब तक मात्राओं की गणना का सही ज्ञान नहीं होगा मानक दोहा नहीं लिखा जा सकता। 

मात्राओं की गणना निम्रप्रकार की जाती है-

हिन्दी भाषा के वर्णों को 12 स्वरों और 36 व्यंजनों में बाँटा गया है। सभी व्यंजनों की एक मात्रा (।) मानी जाती है। लघु स्वर अ, इ, उ, ऋ की भी (।) मात्रा ही मानी जाती हैं। जबकी दीर्घ स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ ओ और औ की मात्राएँ दीर्घ (ऽ) मानी जाती हैं। व्यंजनों पर लघु स्वर अ, इ, उ, ऋ आ रहे हों तो भी मात्रा लघु (।) ही रहेगी। किंतु यदि दीर्घ स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ की मात्राएँ आ रही हों तो मात्रा दीर्घ (ऽ) हो जाती है।
अर्ध-व्यंजन और अनुस्वार/बिंदु (.)की आधी मात्रा मानी जाती है। मगर आधी मात्रा की स्वतंत्र गणना नहीं की जाती। यदि अनुस्वार अ, इ, उ अथवा किसी व्यंजन के ऊपर प्रयोग किया जाता है तो मात्राओं की गिनती करते समय दीर्घ मात्रा मानी जाती है किन्तु स्वरों की मात्रा का प्रयोग होने पर अनुस्वार (.) की मात्रा की कोई गिनती नहीं की जाती।
आधे अक्षर की स्वतंत्र गिनती नहीं की जाती बल्कि अर्ध-अक्षर के पूर्ववर्ती अक्षर की दो मात्राएँ गिनी जाती है। यदि पूर्ववर्ती व्यंजन पहले से ही दीर्घ न हो अर्थात उस पर पहले से कोई दीर्घ मात्रा न हो। उदाहरण के लिए अंत, पंथ, छंद, कंस में अं, पं, छं, कं सभी की दो मात्राए गिनी जायेंगी इसी प्रकार शब्द, वक्त, कुत्ता, दिल्ली इत्यादि की मात्राओं की गिनती करते समय श, व, क तथा दि की दो-दो मात्राएँ गिनी जाएँगी। इसी प्रकार शब्द के प्रारंभ मेें आने वाले अर्ध-अक्षर की मात्रा नहीं गिनी जाती जैसे स्वर्ण, प्यार, त्याग आदि शब्दों में स्, प् और त् की गिनती नहीं की जाएगी। प्रारम्भ में संयुक्त व्यंजन आने पर उसकी एक ही मात्रा गिनी जाती है। जैसे श्रम, भ्रम, प्रभु, मृग। इन शब्दों मेें श्र, भ्र, प्र तथा मृ की एक ही मात्रा गिनी जाएगी।
अनुनासिक/चन्द्र बिन्दु की कोई गिनती नहीं की जाती। जैसे-हँस, विहँस, हँसना, आँख, पाँखी, चाँदी आदि शब्दों में अनुनासिक का प्रयोग होने के कारण इनकी कोई मात्रा नहीं मानी जाती।

दोहे का प्रथम और तृतीय चरण-

दोहा लयबद्ध रहे इसके लिए इसे केवल दो, तीन, चार और छह मात्राओं से ही शुरू किया जाता है, पाँच मात्राओं से दोहा का कोई चरण शुरू नहीं किया जाता। प्रथम और तृतीय चरण शुरू करने के मात्रिक गणों के हिसाब से कुल 34 भेद छंद विशेषज्ञों तय किए हैं। इसी प्रकार दूसरे और चौथे चरण के लिए 18 भेद तय किए हैं। जिनका क्रमवार विवरण निम्रांकित है-
दो मात्राओं से दोहा शुरू करने के विद्वानों ने मात्रिक गणों के अनुसार 12 भेद बताए हैं-
2, 2, 2, 2, 2, 3 जैसे- सुख-दुख मेें जो सम रहे (होता सच्चा संत)
2, 2, 2, 2, 3, 2 जैसे- अब तक भी है गाँव में (कष्टों की भरमार)
2, 2, 2, 4, 3 जैसे- घर तो अब सपना हुआ (महँगी रोटी दाल)
2, 2, 4, 2, 3 जैसे- दिन दिन बढ़ते जा रहे (झूठ और पाखंड)
2, 4, 2, 3, 2 जैसे- इक मानव की भूख है (इक सागर की प्यास)
2, 4, 2, 5 जैसे- धन दौलत को मानते (जो अपना भगवान)
2, 2, 4, 5 जैसे- घर की खातिर चाहिए (त्याग समर्पण प्यार)
2, 2, 4, 3, 2 जैसे- धन की अंधी दौड़ में (दौड़ रहे हैं लोग)
2, 5, 4, 2,
2, 6, 3, 2
2, 2, 6, 3
2, 6, 2, 3
दो मात्रा से प्रारम्भ होने वाले प्रथम और तृतीय चरण में शुरू मेंं दो मात्रा के बाद तीन मात्रा वाला शब्द नहीं आता। इसी प्रकार प्रारंभ में दो के बाद चार मात्रा आने पर तीन मात्रा नहीं आती। साथ ही शुरू में तीन बार दो-दो मात्रा वाले शब्द आ रहे हों तो उनके बाद भी तीन मात्रा नहीं आती। प्रारंभ में दो मात्रा के बाद छह मात्रा आने पर उसके बाद चार मात्रा नहीं आती।

तीन मात्राओं से प्रथम और तृतीय चरण शुरू करने के आठ भेद बताए गए हैं-
3, 3, 2, 3, 2 
3, 3, 2, 2, 3 
3, 3, 2, 5
3, 5, 5, 
3, 5, 2, 3
3, 3, 4, 3
3, 5, 3, 2
3, 3, 5, 2 
शुरू में तीन मात्रा शब्द के बाद दो, चार और छह मात्रा वाले शब्द नहीं आते। इसी प्रकार शुरू में तीन के बाद पाँच मात्रा हों तो उसके बाद चार मात्रा वाला शब्द नहीं आएगा।

चार मात्राओं से दोहे का प्रथम और तृतीय चरण शुरू करने के 10 भेद विद्वानों द्वारा बताए गए हैं-
4, 4, 3, 2
4, 4, 2, 3
4, 4, 5
4, 2, 4, 3
4, 2, 2, 2, 3
4, 2, 2, 3, 2
4, 2, 2, 5 
4, 3, 3, 3
4, 2, 5, 2 
4, 3, 4, 2
चार मात्रा से शुरू होने वाले प्रथम और तृतीय चरण में प्रारंभिक चार के बाद पाँच मात्रा वाला शब्द नहीं आता। इसी प्रकार यदि चार मात्रा वाले शब्द के बाद दो मात्रा वाला शब्द आ रहा हो तो उसके बाद तीन मात्रा वाला शब्द नहीं आता।

छह मात्राओं वाले शब्द से दोहे के प्रथम और तृतीय चरण की शुरूआत करने के चार भेद होते हैं-
6, 2, 2, 3
6, 2, 3, 2
6, 4, 3
6, 5, 2
छह मात्रा वाले शब्द के बाद तीन मात्रा वाला शब्द नहीं आता। 

दोहे का द्वितीय और चतुर्थ चरण-

प्रथम और तृतीय चरण की तरह ही दोहे का दूसरा और चौथा चरण भी केवल दो, तीन, चार और छह मात्राओं से ही शुरू होता है। दो मात्रा से शुरू होने वाले दूसरे और चौथे चरण के विद्वानों ने आठ भेद बताए हैं-
2, 2, 2, 2, 3 
2, 2, 2, 5 
2, 2, 4, 3 
2, 2, 3, 4
2, 4, 2, 3
2, 4, 5
2, 5, 4
2, 6, 3
दोहा के दूसरे और चौथे चरण की शुरूआत दो मात्रा वाले शब्द से हो रही हो तो उसके बाद तीन मात्रा वाला शब्द नहीं आता। 

तीन मात्रा वाले शब्द से दूसरे और चौथे चरण की शुरूआत के निम्र भेद तय किए गए हैं-
3, 3, 5
3, 5, 3 
3, 3, 2, 3
इसका चौथा भेद भी होता है जिसमें 3, 2, 3, 3 मात्राएँ होती हैं, किंतु बीच की मात्राएँ 2 और 3 वास्तव में पाँच मात्राओं वाले शब्द के रूप में ही प्रयोग की जाती हैं। जैसे अध जले, अन मने।
तीन मात्रा से शुरू हो रहे दूसरे और चौथे चरण में प्रारंभिक तीन मात्रा वाले शब्द के बाद दो मात्रा वाला शब्द नहीं आता।

चार मात्राओं वाले शब्द से दूसरे और चौथे चरण की शुरूआत के चार भेद बताए गए हैं-
4, 4, 3
4, 3, 4
4, 2, 2, 3
4, 2, 5
चार मात्रा से शुरू होने वाले दूसरे और चौथे चरण में छह मात्रा वाले शब्दों का प्रयोग नहीें होता। इसी प्रकार चार मात्रा वाले शब्द के ठीक बाद पाँच मात्रा वाला शब्द नहीं आता।

छह मात्राओं से दूसरे और चौथे चरण की शुरूआत के केवल दो ही भेद विद्वानों ने बताए हैं-
6, 2, 3
6, 5
छह मात्राओं से शुरू होने वाले दूसरे और चौथे चरण में चार मात्राओं वाले शब्द का प्रयोग नहीं हो सकता। इसी प्रकार छह मात्रा वाले शब्द की ठीक बाद तीन मात्रा वाला शब्द नहीं आता। 
इसके साथ-साथ कुछ और भी नियम विद्वानों ने तय किए हैं जैसे-दोहे का प्रथम और तृतीय चरण जगण अर्थात । ऽ। मात्रा वाले शब्द से शुरू नहीं किया जा सकता। जैसे जमीन शब्द।
दूसरे चरण के अंत में चार मात्रा वाला शब्द हमेशा जगण अर्थात । ऽ। मात्रा के रूप में ही आता है।
उपरोक्त नियमों को ध्यान में रखते हुए यदि दोहे की रचना की जाए तो उसके लयात्मक और धारदार होने की संभावना बढ़ जाती है।

-रघुविन्द्र यादव 
संपादक, बाबूजी का भारतमित्र

Friday, June 19, 2015

लोक संस्कृति की लय है कजरी - के.के. यादव

सावन के मौसम में प्रेम की अनुभूति है कजरी

भारतीय परम्परा का प्रमुख आधार तत्व उसकी लोक संस्कृति है। यहाँ लोक कोई एकाकी धारणा नहीं है बल्कि इसमें सामान्य-जन से लेकर पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, ऋतुएं, पर्यावरण, हमारा परिवेश और हर्ष-विषाद की सामूहिक भावना से लेकर श्रृंगारिक दशाएं तक शामिल हैं। ‘ग्राम-गीत‘ की भारत में प्राचीन परंपरा रही है। लोकमानस के कंठ में, श्रुतियों में और कई बार लिखित-रूप में यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होते रहते हैं। पं. रामनरेश त्रिपाठी के शब्दों में-‘ग्राम गीत प्रकृति के उद्गार हैं। इनमें अलंकार नहीं, केवल रस है। छन्द नहीं, केवल लय है। लालित्य नहीं, केवल माधुर्य है। ग्रामीण मनुष्यों के स्त्री-पुरुषों के मध्य में हृदय नामक आसन पर बैठकर प्रकृति मानो गान करती है। प्रकृति का यह गान ही ग्राम गीत है....।’ इस लोक संस्कृति का ही एक पहलू है- कजरी। ग्रामीण अंचलों में अभी भी प्रकृति की अनुपम छटा के बीच कजरी की धारायें समवेत फूट पड़ती हैं। यहाँ तक कि जो अपनी मिटटी छोड़कर विदेशों में बस गए, उन्हें भी यह कजरी अपनी ओर खींचती है। तभी तो कजरी अमेरिका, ब्रिटेन इत्यादि देशों में भी अपनी अनुगूंज छोड़ चुकी है। सावन के मतवाले मौसम में कजरी के बोलों की गूंज वैसे भी दूर-दूर तक सुनाई देती है -

रिमझिम बरसेले बदरिया,
गुईयां गावेले कजरिया
मोर सवरिया भीजै न
वो ही धानियां की कियरिया
मोर सविरया भीजै न।

वस्तुतः ‘लोकगीतों की रानी’ कजरी सिर्फ गायन भर नहीं है बल्कि यह सावन मौसम की सुन्दरता और उल्लास का उत्सवधर्मी पर्व है। प्रतीक्षा, मिलन और विरह की अविरल सहेली, निर्मल और लज्जा से सजी-धजी नवयौवना की आसमान छूती खुशी, आदिकाल से कवियों की रचनाओं का श्रृंगार कर, उन्हें जीवंत करने वाली ‘कजरी’ सावन की हरियाली बहारों के साथ जब फिज़ा में गूंजती है तो देखते ही बनता है। प्रतीक्षा के पट खोलती लोकगीतों की श्रृंखलाएं इन खास दिनों में गजब सी हलचल पैदा करती हैं, हिलोर सी उठती है, श्रृंगार के लिए मन मचलता है और उस पर कजरी के सुमधुर बोल! सचमुच ‘कजरी’ सबकी प्रतीक्षा है, जीवन की उमंग और आसमान को छूते हुए झूलों की रफ्तार है। शहनाईयों की कर्णप्रिय गूंज है, सुर्ख लाल मखमली वीर बहूटी और हरियाली का गहना है, सावन से पहले ही तेरे आने का एहसास! महान कवियों और रचनाकारों ने तो कजरी के सम्मोहन की व्याख्या विशिष्ट शैली में की है। मौसम और यौवन की महिमा का बखान करने के लिए परंपरागत लोकगीतों का भारतीय संस्कृति में कितना महत्व है-कजरी इसका उदाहरण है। चरक संहिता में तो यौवन की संरक्षा व सुरक्षा हेतु बसन्त के बाद सावन महीने को ही सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। सावन में नयी ब्याही बेटियाँ अपने पीहर वापस आती हैं और बगीचों में भाभी और बचपन की सहेलियों संग कजरी गाते हुए झूला झूलती हैं-

घरवा में से निकले ननद-भउजईया
जुलम दोनों जोड़ी साँवरिया।

छेड़छाड़ भरे इस माहौल में जिन महिलाओं के पति बाहर गये होते हैं, वे भी विरह में तड़पकर गुनगुना उठती हैं ताकि कजरी की गूँज उनके प्रीतम तक पहुँचे और शायद वे लौट आयें-

सावन बीत गयो मेरो रामा
नाहीं आयो सजनवा ना।
........................
भादों मास पिया मोर नहीं आये
रतिया देखी सवनवा ना।

यही नहीं जिसके पति सेना में या बाहर परदेश में नौकरी करते हैं, घर लौटने पर उनके सांवले पड़े चेहरे को देखकर पत्नियाँ कजरी के बोलों में गाती हैं -

गौर-गौर गइले पिया
आयो हुईका करिया
नौकरिया पिया छोड़ दे ना।

एक मान्यता के अनुसार पति विरह में पत्नियाँ देवि ‘कजमल’ के चरणों में रोते हुए गाती हैं, वही गान कजरी के रूप में प्रसिद्ध है-

सावन हे सखी सगरो सुहावन
रिमझिम बरसेला मेघ हे
सबके बलमउवा घर अइलन
हमरो बलम परदेस रे।

नगरीय सभ्यता में पले-बसे लोग भले ही अपनी सुरीली धरोहरों से दूर होते जा रहे हों, परन्तु शास्त्रीय व उपशास्त्रीय बंदिशों से रची कजरी अभी भी उत्तर प्रदेश के कुछ अंचलों की खास लोक संगीत विधा है। कजरी के मूलतः तीन रूप हैं- बनारसी, मिर्जापुरी और गोरखपुरी कजरी। बनारसी कजरी अपने अक्खड़पन और बिन्दास बोलों की वजह से अलग पहचानी जाती है। इसके बोलों में अइले, गइले जैसे शब्दों का बखूबी उपयोग होता है, इसकी सबसे बड़ी पहचान ‘न’ की टेक होती है-

बीरन भइया अइले अनवइया
सवनवा में ना जइबे ननदी।
..................
रिमझिम पड़ेला फुहार
बदरिया आई गइले ननदी।

विंध्य क्षेत्र में गायी जाने वाली मिर्जापुरी कजरी की अपनी अलग पहचान है। अपनी अनूठी सांस्कृतिक परम्पराओं के कारण मशहूर मिर्जापुरी कजरी को ही ज्यादातर मंचीय गायक गाना पसन्द करते हैं। इसमें सखी-सहेलियों, भाभी-ननद के आपसी रिश्तों की मिठास और छेड़छाड़ के साथ सावन की मस्ती का रंग घुला होता है-

पिया सड़िया लिया दा मिर्जापुरी पिया
रंग रहे कपूरी पिया ना
जबसे साड़ी ना लिअईबा
तबसे जेवना ना बनईबे

तोरे जेवना पे लगिहेैं मजूरी पिया
रंग रहे कपूरी पिया ना।

विंध्य क्षेत्र में पारम्परिक कजरी धुनों में झूला झूलती और सावन भादो मास में रात में चौपालों में जाकर स्त्रियाँ उत्सव मनाती हैं। इस कजरी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलती हैं और इसकी धुनों व पद्धति को नहीं बदला जाता। कजरी गीतों की ही तरह विंध्य क्षेत्र में कजरी अखाड़ों की भी अनूठी परम्परा रही है। आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरू पूजन के बाद इन अखाड़ों से कजरी का विधिवत गायन आरम्भ होता है। स्वस्थ परम्परा के तहत इन कजरी अखाड़ों में प्रतिद्वन्दता भी होती है। कजरी लेखक गुरु अपनी कजरी को एक रजिस्टर पर नोट कर देता है, जिसे किसी भी हालत में न तो सार्वजनिक किया जाता है और न ही किसी को लिखित रूप में दिया जाता है। केवल अखाड़े का गायक ही इसे याद करके या पढ़कर गा सकता है-

कइसे खेलन जइबू
सावन में कजरिया
बदरिया घिर आईल ननदी
संग में सखी न सहेली
कईसे जइबू तू अकेली
गुंडा घेर लीहें तोहरी डगरिया।

बनारसी और मिर्जापुरी कजरी से परे गोरखपुरी कजरी की अपनी अलग ही टेक है और यह ‘हरे रामा‘ और ‘ऐ हारी‘ के कारण अन्य कजरी से अलग पहचानी जाती है-

हरे रामा, कृष्ण बने मनिहारी
पहिर के सारी, ऐ हारी।

सावन की अनुभूति के बीच भला किसका मन प्रिय मिलन हेतु न तड़पेगा, फिर वह चाहे चन्द्रमा ही क्यों न हो-
चन्दा छिपे चाहे बदरी मा
जब से लगा सवनवा ना।

विरह के बाद संयोग की अनुभूति से तड़प और बेकरारी भी बढ़ती जाती है। फिर यही तो समय होता है इतराने का, फरमाइशें पूरी करवाने का-

पिया मेंहदी लिआय दा मोतीझील से
जायके साइकील से ना
पिया मेंहदी लिअहिया
छोटकी ननदी से पिसईहा

अपने हाथ से लगाय दा
कांटा-कील से
जायके साइकील से।
..................
धोतिया लइदे बलम कलकतिया
जिसमें हरी- हरी पतियां।

ऐसा नहीं है कि कजरी सिर्फ बनारस, मिर्जापुर और गोरखपुर के अंचलों तक ही सीमित है बल्कि इलाहाबाद और अवध अंचल भी इसकी सुमधुरता से अछूते नहीं हैं। कजरी सिर्फ गाई नहीं जाती बल्कि खेली भी जाती है। एक तरफ जहाँ मंच पर लोक गायक इसकी अद्भुत प्रस्तुति करते हैं वहीं दूसरी ओर इसकी सर्वाधिक विशिष्ट शैली ‘धुनमुनिया’ है, जिसमें महिलायें झुक कर एक दूसरे से जुड़ी हुयी अर्धवृत्त में नृत्य करती हैं।

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ अंचलों में तो रक्षाबन्धन पर्व को ‘कजरी पूर्णिमा’ के तौर पर भी मनाया जाता है। मानसून की समाप्ति को दर्शाता यह पर्व श्रावण अमावस्या के नवें दिन से आरम्भ होता है, जिसे ‘कजरी नवमी’ के नाम से जाना जाता है। कजरी नवमी से लेकर कजरी पूर्णिमा तक चलने वाले इस उत्सव में नवमी के दिन महिलायें खेतों से मिट्टी सहित फसल के अंश लाकर घरों में रखती हैं एवं उसकी साथ सात दिनों तक माँ भगवती के साथ कजमल देवी की पूजा करती हैं। घर को खूब साफ-सुथरा कर रंगोली बनायी जाती है और पूर्णिमा की शाम को महिलायें समूह बनाकर पूजी जाने वाली फसल को लेकर नजदीक के तालाब या नदी पर जाती हैं और उस फसल के बर्तन से एक दूसरे पर पानी उलचाती हुई कजरी गाती हैं। इस उत्सवधर्मिता के माहौल में कजरी के गीत सातों दिन अनवरत् गाये जाते हैं।

कजरी लोक संस्कृति की जड़ है और यदि हमें लोक जीवन की ऊर्जा और रंगत बनाये रखना है तो इन तत्वों को सहेज कर रखना होगा। कजरी भले ही पावस गीत के रूप में गायी जाती हो पर लोक रंजन के साथ ही इसने लोक जीवन के विभिन्न पक्षों में सामाजिक चेतना की अलख जगाने का भी कार्य किया है। कजरी सिर्फ राग-विराग या श्रृंगार और विरह के लोक गीतों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें चर्चित समसामयिक विषयों की भी गूँज सुनायी देती है। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान कजरी ने लोक चेतना को बखूबी अभिव्यक्त किया। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान कजरी ने लोक चेतना को बखूबी अभिव्यक्त किया। आजादी की लड़ाई के दौर में एक कजरी के बोलों की रंगत देखें-

केतने गोली खाइके मरिगै
केतने दामन फांसी चढ़िगै
केतने पीसत होइहें जेल मां चकरिया
बदरिया घेरि आई ननदी।

1857 की क्रान्ति पश्चात जिन जीवित लोगों से अंग्रेजी हुकूमत को ज्यादा खतरा महसूस हुआ, उन्हें कालापानी की सजा दे दी गई। अपने पति को कालापानी भेजे जाने पर एक महिला ‘कजरी‘ के बोलों में गाती है-

अरे रामा नागर नैया जाला काले पनियां रे हरी
सबकर नैया जाला कासी हो बिसेसर रामा
नागर नैया जाला काले पनियां रे हरी
घरवा में रोवै नागर, माई और बहिनियां रामा
से जिया पैरोवे बारी धनिया रे हरी।

स्वतंत्रता की लड़ाई में हर कोई चाहता था कि उसके घर के लोग भी इस संग्राम में अपनी आहुति दें। कजरी के माध्यम से महिलाओं ने अन्याय के विरूद्ध लोगों को जगाया और दुश्मन का सामना करने को प्रेरित किया। ऐसे में उन नौजवानों को जो घर में बैठे थे, महिलाओं ने कजरी के माध्यम से व्यंग्य कसते हुए प्रेरित किया-

लागे सरम लाज घर में बैठ जाहु
मरद से बनिके लुगइया आए हरि
पहिरि के साड़ी, चूड़ी, मुंहवा छिपाई लेहु
राखि लेई तोहरी पगरइया आए हरि।

सुभाष चन्द्र बोस ने जंग-ए-आजादी में नारा दिया कि- ‘‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हंे आजादी दूंगा, फिर क्या था पुरूषों के साथ-साथ महिलाएं भी उनकी फौज में शामिल होने के लिए बेकरार हो उठीं। तभी तो कजरी के शब्द फूट पड़े-

हरे रामा सुभाष चन्द्र ने फौज सजायी रे हारी
कड़ा-छड़ा पैंजनिया छोड़बै, छोड़बै हाथ कंगनवा रामा
हरे रामा, हाथ में झण्डा लै के जुलूस निकलबैं रे हारी।

महात्मा गाँधी आजादी के दौर के सबसे बड़े नेता थे। चरखा कातने द्वारा उन्होेंने स्वावलम्बन और स्वदेशी का
रूझान जगाया। नवयुवतियाँ अपनी-अपनी धुन में गाँधी जी को प्रेरणास्त्रोत मानतीं और एक स्वर में कजरी के बोलों में गातीं-

अपने हाथे चरखा चलउबै
हमार कोऊ का करिहैं
गाँधी बाबा से लगन लगउबै
हमार कोई का करिहैं।

कजरी में ’चुनरी’ शब्द के बहाने बहुत कुछ कहा गया है। आजादी की तरंगंे भी कजरी से अछूती नहीं रही हैं-

एक ही चुनरी मंगाए दे बूटेदार पिया
माना कही हमार पिया ना
चद्रशेखर की बनाना, लक्ष्मीबाई को दर्शाना
लड़की हो गोरों से घोड़ांे पर सवार पिया।
जो हम ऐसी चुनरी पइबै, अपनी छाती से लगइबे
मुसुरिया दीन लूटै सावन में बहार पिया
माना कही हमार पिया ना।
.................
पिया अपने संग हमका लिआये चला
मेलवा घुमाये चला ना
लेबई खादी चुनर धानी, पहिन के होइ जाबै रानी
चुनरी लेबई लहरेदार, रहैं बापू औ सरदार
चाचा नेहरू के बगले बइठाये चला
मेलवा घुमाये चला ना
रहइं नेताजी सुभाष, और भगत सिंह खास
अपने शिवाजी के ओहमा छपाये चला
जगह-जगह नाम भारत लिखाये चला
मेलवा घुमाये चला ना

उपभोक्तावादी बाजार के ग्लैमरस दौर में कजरी भले ही कुछ क्षेत्रों तक सिमट गई हो पर यह प्रकृति से तादातम्य का गीत है और इसमें कहीं न कहीं पर्यावरण चेतना भी मौजूद है। इसमें कोई शक नहीं कि सावन प्रतीक है सुख का, सुन्दरता का, प्रेम का, उल्लास का और इन सब के बीच कजरी जीवन के अनुपम क्षणों को अपने में समेटे यूं ही रिश्तोें को खनकाती रहेगी और झूले की पींगों के बीच छेड़-छाड़ व मनुहार यूँ ही लुटाती रहेगी। कजरी हमारी जनचेतना की परिचायक है और जब तक धरती पर हरियाली रहेगी कजरी जीवित रहेगी। अपनी वाच्य परम्परा से जन-जन तक पहुँचने वाले कजरी जैसे लोकगीतों के माध्यम से लोकजीवन में तेजी से मिटते मूल्यों को भी बचाया जा सकता है। 

-कृष्ण कुमार यादव,
निदेशक डाक सेवाएँ,
राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर -342001 मो0- 09413666599 

Tuesday, April 14, 2015

क्रांतिवीर ही नहीं साहित्यकार भी थे पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में क्रांति समर्थक युवाओं का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इनमें रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिहँ, चन्द्रशेखर आजाद, अशफाकुल्ला खॉन, राजेन्द्र सिंह लाहड़ी, रोशन सिंह, राजगुरू, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, खुदीराम बोस, मदनलाल ढींगरा, उधम सिंह और करतार सिंह सराभा जैसे असंख्य नामवर और गुमनाम राष्ट्रभक्त शामिल थे। किंतु आजादी के बाद देश की बागडोर गांधीवादी कांग्रेसियों के हाथों में आ जाने के परिणामस्वरूप क्रांतिवीरों को सरकारी उपेक्षा का शिकार होना पड़ा जिसके चलते आज तक उन अमर शहीदों के व्यक्तित्व और कृतित्व का सही मूल्यांकन नहीं हो सका है। किसी को काकोरी कांड का शहीद और किसी को असेम्बली बम कांड के शहीद नाम देकर दरकिनार कर दिया गया। जबकि वास्तविकता यह है कि ये शहीद न केवल आजादी के सर्वोच्य आदर्श के लिए अपना सर्वोच्य बलिदान देने वाले थे बल्कि वे उच्च कोटी के चिन्तक और साहित्यकार भी थे।

Saturday, March 28, 2015

दोहा छंद में वर्णिक गणों का महत्व

                दोहा हिन्दी काव्य की एक अचूक, सशक्त लघु छंद विधा है। 24-24 मात्रााओं का दो पंक्तियों वाला यह छंद अपनी प्रभावशीलता, संक्षिप्तता, सशक्त अभिव्यक्ति, प्रांजलता, तीव्र स्मरणशीलता, मार्मिकता आदि तमाम गुणों के कारण प्राचीन काल से काव्य का सर्वाधिक जनप्रिय एवं लोकप्रिय छंद रहा है। 48 मात्राओं में बँधा यह लघु छंद पाठक एवं श्रोता पर अणुबम के समान प्रहार करता है। इसमें अनन्त ऊर्जा का भंडार है। इसका सदुपयोग कोई सच्चा साधक ही कर सकता है। कविवर रहीम ने दोहे की विशेषता में कहा है-
                 दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहि।
                ज्योंं रहीम नट कुंडली, सिमिट कू द चलि जाहि।।
                अर्थात जिस प्रकार एक कुशल नट अपने शरीर को समेटकर एक छोटे से घेरे में कुशलतापूर्वक पार हो जाता है उसी प्रकार एक समर्थ दोहाकार थोड़े से शब्दों में बड़े-बड़े अर्थ को संजोने की सामर्थ्य रखता है।
                दोहे के विषय में वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री चिरंजीत ने कहा है-''24-24 मात्राओं की दो पंक्तियों के दोहे की रचना बड़ी कठिन है। इस पर 'गागर में सागर' की कहावत लागू होती है। सही किस्म के दोहे के लिए भाषा कसी हुई, प्रांजलता, शब्दों की मितव्ययता, कथ्य की संक्षिप्तता एवं सांकेतिकता, वर्णन की चमत्कार पूर्ण अलंकारिकता, अनुभूति की मार्मिकता एंव सूत्र की सूक्तिपरक उद्धरणीयता आवश्यक है।"
                उक्त गुणों से परिपूर्ण दोहा अभिरचन के लिए रचनाकार को निर्धारित माप-दण्ड, मात्रा विन्यास का उचित ज्ञान होना आवश्यक है। वरिष्ठ दोहाकार अशोक अंजुम ने कहा है-''केवल 13-11 के क्रम के साथ 48 मात्राएँ जोड़ लेने से ही दोहे की रचना नहीं होती, उसमें उचित प्रवाह अर्थात रगण, तगण, यगण... का सही सामंजस्य भी आवश्यक है।"
                दोहा मुक्तक काव्य की श्रेणी में आता है और एक लघु मात्रिक छंद है। फिर भी दोहे को सही बुनावट, उचित प्रवाह प्रदान करने के लिए वर्णिक गणों की भूमिका महत्वपूर्ण है। गणों का विश्लेषण करने से पूर्ण गण की रूप-रेखा जानना आवश्यक है। वर्ण और मात्राओं के समूह को गण कहते हैं। गण दो प्रकार के होते हैं। वर्णिक गण और मात्रिक गण। लघु -गुरु के क्रम के विविध परिवर्तनों से वर्णिक गणों की संख्या आठ हो जाती है। तीन वर्णों का एक गण होता है।             

                छंद शास्त्र के आचार्यों ने गणों के संबंध में एक सूत्र बनाया है वह इस प्रकार है- 'यमाताराजभानसलगा'
                दस अक्षर का यह सूत्र है। आठों गणों के एक-एक सांकेतिक अक्षर तथा लघु-गुरु के लिए ल और ग को लेकर इस सूत्र की रचना हुई है। जैसे-यदि आपको यगण का लक्षण और स्वरूप जानना हो तो इस सूत्र के आरम्भ का य तो यगण के नाम के लिए और उसमें माता जोड़ देने से यगण (।ऽऽ) का उदाहरण हो जाता है। इसी क्रम से इसी सूत्र द्वारा आठों गणों के नाम व उदाहरण स्पष्ट हो जाते हैं।
                छंद शास्त्र केे अनुसार मात्रिक गण पाँच प्रकार के होते हैं। इन्हें टगण, ठगण, डगण, ढगण तथा णगण नाम से पुकारा जाता है। टगण दो मात्राओं का, ठगण तीन मात्राओं का, डगण चार मात्राओं का, ढगण पाँच मात्राओं का तथा णगण छह मात्राओं का समुच्च होता है। इन समुच्चयों में लघु-गुरु क्रम बदलने से गण नहीं बदलता। उदाहरण के लिए रहीम और भारत में लघु-गुरु क्रम भिन्न है, परन्तु मात्राएँ दोनों में चार-चार हैं। अत: ये दोनों शब्द मात्रिक गण डगण हैं।
                मात्रिक गणों में लघु-गुरु का उचित मात्रा विन्यास न होने के कारण काव्यशास्त्रीयों व कवियों ने इनका महत्व व उपयोग लगभग नकार दिया है। इन्हीं कारणों से मात्रिक गणों का अस्तित्व चर्चाओं व आलेखों से बहिष्कृत-सा हो गया है। दोहों के अभिरचन में प्रवाह व लय लाने के लिए गणों की महत्वपूर्ण भूमिका है। जैसा कि सर्वविदित है दोहे के पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। दूसरे और चौथे चरण का चरणान्त दीर्घ-लघु (ऽ।) से होता है। दोहा मात्रिक छंद होने के बावजूद इसे वर्णिक गणों की विशेष बुनावट से गुजरना पड़ता है। मात्राओं की वांछित संख्या होने पर वर्णिक गणों की विशेष बुनावट के बिना छंद में प्रवाह नहीं आ सकता, फलस्वरूप विकलांगता आ जायेगी। वह छंद दोहा छंद की परिधि से बाहर हो जायेगा। दोहा तो ऐसा छंद है कि इसके किसी भी चरण में जरा-सी भी भूल, मात्रा का कम या अधिक होना, प्रवाह भंग आदि बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है।
                आइये दोहा अभिरचन में प्रवाह व गति प्रदान करने के लिए प्रथम व तृतीय चरण में वर्णिक गणों की विशेष बुनावट अर्थात मात्रा विन्यास का विश्लेषण करते हैं। यहाँ हम वर्णिक गणों के लिए तालिका में दिए गए संकेत य,,त तथा लघु के लिए ल गुरु वर्ण के लिए गा का प्रयोग करेंगे।
                प्रथम व तृतीय चरणों का वर्णिक गणों की दृष्टि से विश्लेषण करने पर ऽ। रूप प्राप्त होते हैं। इन्हें हम निम्न आठ भागों में विभाजित कर सकते हैं-
1.यगण से प्रारम्भ चरण
सूत्र          मात्रिक विन्यास                  उदाहरण                 
ययलगा      ।ऽऽ।ऽऽ।ऽ     बिना जीव की सांस सों, (सार भस्म हो जाय)
यनभल      ।ऽऽ।।।ऽ।।।    वहै प्रीत नहिं रीति वह, (नहीं पाछिलो हेत)
यनर        ।ऽऽ।।।ऽ।ऽ     दया कौन पर कीजिये, (का पर निर्दय होय)
यननगा      ।ऽऽ।।।।।।ऽ    कथा कीरतन कुल विशे, (भव सागर की नाव)
यजस       ।ऽऽ।ऽ।।।ऽ     बिना मान अमृत पिये, (राहु कटायो सीस)
2.मगण से प्रारम्भ चरण
मतलल       ऽऽऽऽऽ।।।     ज्यों-ज्यों भीजे श्याम रंग, (त्यों-त्यों उज्ज्वल होय)
ममलगा      ऽऽऽऽ।।।ऽ     राधा-राधा रटत ही, (सब बाधा कटि जाय)
मसलगा      ऽऽऽ।।ऽ।ऽ     खीरा को मुँह काटिकैै, (मलियत नोन लगाय)
मतगा        ऽऽऽऽऽ।ऽ     यारो यारी छोडिय़े, (वे रहीम अब नाहि)
मनस        ऽऽऽ।।।।।ऽ    माला फेरत जुगभया, (फिरा न मनका फेर)
मसन        ऽऽऽ।।ऽ।।।    सोना, सज्जन, साधुजन, (टूट जुड़ैं सौ बार)
3.तगण से प्रारम्भ चरण
तयलगा       ऽऽ।।ऽऽ।ऽ     मेरी भव बाधा हरो, (राधा नागरि सोइ)
तननगा       ऽऽ।।।।।।।ऽ   पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, (पंडित भया न कोय)
तभनगा       ऽऽ।ऽ।।।।ऽ    माया मरी न मन मरा, (मर-मर गये शरीर)
तरलगा       ऽऽ।ऽ।ऽ।ऽ     माटी कहे कुम्हार सूँ, (तू क्या रौंदे मोय)
तजस        ऽऽ।।ऽ।।।ऽ    ऊँचे कुल का जनमिया, (करणी ऊँच न होय)
तनर         ऽऽ।।।।ऽ।ऽ    ऐसे घट-घट राम हैं, (दुनिया देखे नाहि)
4. रगण से प्रारम्भ चरण
रनभल       ऽ।ऽ।।।ऽ।।।    राम-राम कहि राम कहि, (राहु गये सुर धाम)
रनर         ऽ।ऽ।।।ऽ।ऽ     दीन बंधु विन दीन की, (को रहीम सुध लेत)
रयलगा       ऽ।ऽ।ऽऽ।ऽ     खैर, खून, खाँसी, खुशी, (बैर, प्रीति, मदपान)
रजस        ऽ।ऽ।ऽ।।।ऽ     सार-सार को गहि रहे, (थोथा देय उड़ाय)
रयन         ऽ।ऽ।ऽऽ।।।     बैर प्रीति अभ्यास जस, (होत होत ही होय)
5.भगण से प्रारम्भ चरण
भमलगा      ऽ।।ऽऽऽ।ऽ      या अनुरागी चित्त की, (गति समुझै नहि कोय)
भमन        ऽ।।ऽऽऽ।।।     धूप झरोखा तोडक़र, (पहुँचे उनके गेह)
भतनल       ऽ।।ऽऽ।।।।।    राम न जाते हिरन सँग, (सीय न रावण साथ)
भभनलल     ऽ।।ऽ।।।।।।।    ज्यों नर डारत वमन कर, (स्वान स्वाद सों खात)
भभभल       ऽ।।ऽ।।ऽ।।।    दादुर, मोर, किसान मन, (लग्यौ रहै धन माहि)
भसनगा      ऽ।।।। ऽ।।।ऽ    दीन सवन को लखत है, (दीनहि लखै न कोय)
भतस        ऽ।। ऽऽ।।।ऽ    दीरघ दोहा अरथ के, (आखर थोरे आहि)
भसभल       ऽ।।।। ऽऽ।।।   जान परत है काक पिक, (ऋतु बसन्त के मांहि)
6. नगण से प्रारम्भ चरण
नननस       ।।।।।।।।।।।ऽ   कल कल कह सरि पुलिन सों, (चली सिन्धु की ओर)
ननसलगा     ।।।।।।।।ऽ।ऽ    सुन-सुन कर युग की कथा, (काँप उठा है गात)
नयभल       ।।।। ऽऽऽ।।।   जिन दिन देखे वे कुसुम, (गई सो बीति बहार)
नरभल       ।।।ऽ। ऽऽ।।।   करि फुलेल को आचमन, (मीठी कहत सराहि)
नयर         ।।।। ऽऽऽ।ऽ    जब सब पीले हो गये, (तन उपवन के पात)
ननननल      ।।।।।।।।।।।।।  जियत मरत झुकि-झुकि परत, (जेहि चितवन इक बार)
ननतगा       ।।। ।।।ऽऽ।ऽ   करत-करत अभ्यास के, (जड़मति होत सुजान)
नजजगा       ।।।।ऽ।।ऽ।ऽ    पुरुष पुरातन की वधू, (क्यों न चंचला होय)
7.सगण से प्रारम्भ चरण
समलगा       ।।ऽऽऽऽ।ऽ     मान संन्यासी हो गया, (तन पर धूल सवार)
सभभल       ।।ऽऽ।। ऽ।।।   मन शैतान समान इस, (तन में करता खेल)
सनजगा      ।।ऽ।।।।ऽ।ऽ    उलझा मन नव रंग में, (फिर भी मिटी न प्यास)
सजर        ।।ऽ। ऽ।ऽ। ऽ   कबिरा खड़ा बजार में, (माँगे सबकी खैर)
सभनगा      ।।ऽऽ।।। ।।ऽ   जब मैं था तब गुरु नहीं, (अब गुरु है मैं नाहि)
सनजलल     ।।ऽ।।। ।ऽ।।।   कमला थिर न रहीम कहिं, (यह जानत सब कोय)
सतस        ।।ऽऽऽ।।।ऽ     परदा दीखा भरम का, (ताते सूझे नाहि)
8.जगण से प्रारम्भ चरण
जभनगा      ।ऽ।ऽ।।।।। ऽ   अमी हलाहल मद भरे, (स्वेत श्याम रतनार)
जमलगा      ।ऽ।ऽऽऽ।ऽ     सदा नगारा कूँच का, (बाजत आठों याम)
जभर        ।ऽ।ऽ।।ऽ।ऽ     सदा रहे नहिं एक सी, (का रहीम पछितात)
जतस        ।ऽ। ऽऽ।।।ऽ    सगे कुबेला परखिये, (ठाकुर गुनो कि आहि)
जसनगा      ।ऽ।।। ऽ।।।ऽ   नहीं छनन को परतिया, (नहीं करन को ब्याह)

नोट-1.   दोहा का प्रथम व तृतीय चरण का प्रारम्भ पूरक शब्द जगण (।ऽ।) जैसे-अमीर,                                   किसान, जमीन आदि से नहीं होता।
2.           प्रथम व तृतीय चरण के अंत में यगण, मगण, तगण, जगण का प्रयोग नहीं होता।
दोहा के दूसरे व चौथे चरण का वर्णिक गण विश्लेषण-
दोहे का दूसरा व चौथा चरण 11-11 मात्राओं का होता है। इस चरण के अंत में गुरु-लघु (ऽ।) अनिवार्य रूप से आता है। केवल 11-11 मात्राओं की पूर्ति हो जाने से चरण का स्वरूप निर्धारित नहीं होता, इसके अभिरचन में वर्णिक गणों की व्यवस्था इस प्रकार है-
सूत्र          मात्रिक विन्यास            उदाहरण
ययल        ।ऽऽ।ऽऽ।      (जहाँ दया तां धर्म है), जहाँ लोभ तां पाप।
यनगाल      ।ऽऽ।।।ऽ।      (काटे चाटे स्वान के), दुहू भाँति विपरीत।
मसल        ऽऽऽ।।ऽ।      (बड़ा हुआ तो क्या हुआ), जैसे पेड़ खजूर।
तरल         ऽऽ।ऽ।ऽ।      (मिला रहे औ ना मिलै), तासों कहा बसाय।
तनगाल      ऽऽ।।।। ऽ।     (कबिरा धीरज के धरे), हाथी मन भर खाय।
रयल         ऽ।ऽ। ऽऽ।     (एक सिंहासन चढ़ गये), एक बांधि जंजीर।
रनगाल       ऽ।ऽ।।। ऽ।     (सदा रहै नहिं एक सी), का रहीम पछतात।
जयगाल      ।ऽ। ।ऽऽऽ।     (नहीं छनन को परतिया), नहीं करने को ब्याह।
जभगाल      ।ऽ।ऽ।। ऽ।     (रहिमन भँवरी के भये), नदी सिरावत मौर।
भमल        ऽ।।ऽऽऽ।      (सोना, सज्जन, साधुजन), टूट जुड़ैं सौ बार।
भनज        ऽ।।।।।। ऽ।    (लीक पुरानी को तजै), कायर, कुटिल, कपूत।
भभगाल      ऽ।।ऽ।।ऽ।      (जो पत राखन हार हो), माखन चाखन हार।
ननसल       ।।।।।।।। ऽ।   (जिन आँखिन सों हरि लख्यौ), रहिमन बल-बल जाय।
नयगाल      ।।।।ऽऽऽ।      (सनै-सनै सरदार की), चुगल बिगाड़े चाल।
ननत        ।।।।।। ऽऽ।    (काया काठी काल की), जनत-जनत सो खाय।
नरगाल       ।।। ऽ। ऽऽ।    (चतुरन को कसकत रहे), समय चूक की हूक।
नजज        ।।।। ऽ।। ऽ।   (औरन को रोकत फिरे), रहिमन पेड़ बबूल।
सनज        ।।ऽ। ।।। ऽ।   (एक रहा दूजा गया), दरिया लहर समाय।
समल        ।।ऽऽऽऽ।      (ऐसे घट-घट राम हैं), दुनिया देखे नाहि।
सभगाल      ।।ऽऽ।।ऽ।     (पंछी को छाया नहीं), फल लागे अति दूर।
ससगाल      ।।ऽ।।ऽऽ।     (करका मनका डार दे), मनका-मनका फेर।
                उपर्युक्त विश्लेषण से दोहे की अभिरचना में 13-13 मात्राओं के चरण के लिए 51 सूत्र तथा 11-11 मात्रााओं के चरण के लिए 21 सूत्र प्रतिपादित किये गये हैं। दोहा छंद का और अधिक गहराई से विश्लेषण करने पर इनसे अलग नवीन सूत्रों की संभावना है। वर्णिक गण छंद को गति एवं प्रवाह प्रदान करते हैं। अत: दोहा अभिरचन में वर्णिक गणों की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है।
                                                                                                                               -शिवकुमार 'दीपक'
 हाथरस

सम्पर्क:- 9927009967

भक्तिकालीन दोहों में मिथक : डॉ.सुमन शर्मा


                मिथक जातीय जीवन की गतिशील चिंतन परम्परा होते हैं। यों वे स्वच्छ और निर्मल दर्पण हैं जिनमें कोई भी जाति अपने विश्वासोंपरम्पराओंजीवन-मूल्योंआस्थाओंसांस्कृतिक उत्थान-पतनसंघर्षोंविजयों-पराजयोंसमष्टिगत विचारोंआदर्शोंकल्पनाओंइच्छाओंआकांक्षाओंस्वप्रोंअनुभवों और संवेदनों के प्रतिबिम्ब देखती हैं| मिथक शब्द अंग्रेजी के मिथ शब्द का रूपान्तर है। इसका प्रयोग हिंदी में सर्वप्रथम आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने किया था। उन्होंने इसे मिथुनीकृत मनुष्य भावों का बिम्ब कहा था। डॉ.रामसनेही लाल शर्मा के अनुसार  ''मिथक पुराकथाइतिहासपुराणधर्मकथाकल्पकथागाथानाराशंसीलोक गाथा और लोक विश्वासों का अद्भुत संगम होते हैं।" कोश के अनुसार ''मिथक में अतिमानवीय व अतिप्राकृतिक कार्यों का वर्णन होता है।" मिथकीय प्रयोग अभिव्यक्ति को सहज और प्रभावी बना देते हैं। पौराणिक नाम केवल नाम नहीं होते उनसे उनके चरित्र और उनके कार्य जुड़े होते हैं। कुंभकर्ण कहने पर अधिक सोने वाले आदमी का रूप उभरता है।
                भक्तिकाल के कवियों ने अपने दोहों में मिथकों के प्रयोग से अभिव्यक्ति को जीवन्त व प्रभावी बनाया है। यथा-
मन मथुरा दिल द्वारकाकाया कासी जाँणि।
दसवां द्वार देहुरातामें जोति पिछाँणि।।
                यहाँ मथुराद्वारिका और कासी केवल शहरों का द्योतन नहीं कर रहे। इनके साथ सांस्कृतिक विश्वास और मिथकीय संवेदन जुड़े हुए हैं जिनके कारण अभिव्यंजना इन शहरों के नामों के अतिरिक्त भावात्मक बिम्बों को नये रंग देने में सफल है।
कबीर के अतिरिक्त तुलसीरहीमजायसी आदि ने भी मिथकों के प्रयोग से दोहों की अभिव्यंजना को नये आयाम दिए हैं। दृष्टव्य है-
                क.          राज करत बिनु काज हीं करहिं कुचाल कुसाज।           
                                        तुलसी ते दसकंध  ज्यों  जइहै सहित समाज।।
                ख.          राज करत बिनु काज हींठटहिं जे कूर कुठाठ।
                                        तुलसी ते कुरूराज ज्योंं जहहै बारह बाट।।
                इन दोहों में 'दसकंध' और 'कुरूराज' मिथक हैंजिनके विनाश ही छवि उनके नामों से जुड़ी हुई है। रहीम ने भी मिथकीय प्रसंगों से अपने दाहों को नई छवि दी है। यथा-
                क.          रहिमन याचकता गहेबड़े छोट है जात।
                                        नारायण हू कौ भयौ बावन आँगुर गात।।
                ख.          थोरो किए बड़ेन कीबड़ी बड़ाई होय।
                                        ज्योंं रहीम हनुमन्त कोगिरिधर कहत न कोय।।
                उद्धरण 'क' में दृष्टांत के रूप में दूसरी संपूर्ण पंक्ति मिथक है जो प्रथम पंक्ति के अर्थ की पुष्टि करती है। उद्धरण 'ख' की दूसरी पंक्ति उत्पे्रक्षा अलंकार के माध्यम से प्रथम पंक्ति के कथ्य का उपमान बनकर आई है। तात्पर्य यह है कि मिथकों का प्रयोग भक्तिकालीन दोहों में प्रतीक के रूप में तो हुआ ही हैपरम्परागत अलंकारों के रूप में भी हुआ है। मिथकीय प्रयोगों के कुछ अन्य दोहे दृष्टव्य हैं-
                क.         बचन हेत हरिचन्द नृपभये सुपच के दास।
                                      बचन हेत दसरथ दयौरतन सुतहि बनवास।।
                ख.        मान सहित विष खाय केसंभु भये जगदीस।
                                     बिना मान अमृत पिये राहु कटायो सीस।।
                ग.        बसि कुसंग चाहत कुसलयह रहीम जिय सोस।
                                    महिमा घटी समुद्र कीराबन बस्यो परोस।।
                उपर्युक्त दोहों में मिथक-प्रयोग शब्द स्तर से आगे जाकर वाक्य स्तर तक फैला हुआ है। रत्नावली के दोहे 'क' में वचन पालन मूल विषय है जिसकी पुष्टि और गहराई के लिए हरिशचन्द्र और दशरथ का मिथकीय प्रयोग किया गया है। रहीम के दोहे 'ख' में भी यही स्थिति है जिसमें मूल विषय सम्मान रक्षा है। सम्मान की रक्षा करते हुए शंभु विष पीकर जगदीश हो गए और राहु ने मान रहित रहकर अमृत पिया तो अपना सिर कटाया। इस दोहे में दोनों स्थितियाँ मिथकों से ही सिद्ध की गई हैंइसे मिथक का दुहरा प्रयोग कहा जा सकता है। रहीम के 'ग' दोहे में दुष्ट के पड़ोस में बस जाने पर मिलने वाली पीड़ा को मिथकीय प्रयोग से स्पष्ट किया है।  इन मिथकीय प्रयोगों ने एक ओर दोहे की अभिव्यंजना को नये आयाम दिए हैंवहीं मिथक एक कारगर उपादान सिद्ध हुआ है।
                मिथक प्रयोग के लिए दोहा उपयुक्त छंद है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मिथक का चाहे जितना बोझ लाद देने पर भी दोहे की छवि में गिरावट नहीं आयेगी। मिथक-प्रयोग यत्र-तत्र ही शोभा देता हैविधा चाहे दोहा हो या गीतिकाव्य। 'जो कवि अपने वक्र व्यापार को एक हल्की छुअन के साथ भाव के प्रकृत सौन्दर्य को उभारना जानता हैवही सफल गीतकार हो सकता है। बिम्बों और प्रतीकों की तह पर तह लगाकर भाव की तीव्रता को दफना देने वाला कवि गीति रचना में सफल नहीं हो सकता।' यह कथन जितना गीतिकाव्य और बिम्ब व प्रतीक के संदर्भ में सटीक हैउतना ही सटीक यह दोहा और मिथक के संदर्भ में भी है। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार अलंकार काव्य का या दोहे का उद्देश्य नहीं होते उसी प्रकार मिथक-प्रयोग भी सहज भाव में ही सौन्दर्य की वृद्धि करता है। भक्तिकालीन कवियों ने इस तथ्य को बारीकी से समझा था। उनके दोहों में जहाँ भी मिथकीय प्रयोग हैंवे सहज रूप में हैं तथा उनकी भरमार भी नहीं है।
                'मिथकीय संदर्भों के प्रयोग से भाषा को गरिमा और कथ्य को एक नई भंगिमा मिलती है।' भक्तिकालीन दोहों में इस भंगिमा को स्पष्ट देखा जा सकता है। यथा-
          समय परे ओछे बचनसबके सहे रहीम।
          सभा दुसासन पट गहेगदा लिए रहे भीम।।
                यहाँ प्रथम पंक्ति में समय पडऩे पर दुष्टों के कटु वचन सुनने की विवशता के भाव को रूपायित करने में दूसरी पंक्ति अद्भुत भूमिका निभा रही है। अभिव्यक्ति की इसी भंगिमा के बल पर दोहा प्राणवान हैअन्यथा यह नीरस होकर रह जाता। स्पष्ट है यह भंगिमा मिथक-प्रयोग की है।
                मिथकीय प्रयोग का एक पहलू और हैवह यह है कि मिथक युग बोध के रूपायन में विशेष रूप से सहायक होते हैं। इसलिए नवगीत के संदर्भ में डॉ.रामसनेही लाल शर्मा ने कहा है कि 'नवगीत में मिथकीय संदर्भों का सर्वाधिक प्रयोग युग बोध की अभिव्यक्ति के लिए किया गया है। आधुनिक युग की जीवनगत विसंगतियों और प्राणघाती यंत्रणाओं को विविध मिथकों के प्रयोग से बड़ी सार्थकता से व्यक्त किया गया है।' शिल्प का कोई भी उपादान होउसका जो मूल प्रकार्य होता है वह हर युग में प्राय: वैसा ही रहता है। अत: मिथक युगबोध के रूपायन का उपयुक्त उपादान भक्तिकाल में भी था और उस काल में इसे मिथक नाम से अस्मिता प्राप्त नहीं हुई। तात्पर्य यह है कि भक्तिकाल के दोहों में भी मिथकों से युगबोध को रूपायित करने में सहायता मिली। दृष्टव्य है-
क.          मान्य मीत सों सुख चहैं सो न छुऐ छल छाहँ ।
                        ससि त्रिसंकु कैकई गति लखि तुलसी मन माहँ।।
ख.          क्षमा बडऩ को चाहिएछोटन को उतपात।
                        कहा विष्णु को घटि गयोजो भृगु मारी लात।।
                उद्धरण 'क' में छल का विरोध है। छल के दुष्परिणामों के शिकार मिथकीय नाम हैं-'ससित्रिसंकुकैकई'जिनका भय दिखाकर कवि समाज को छल रहित बनाना चाहता है। जाहिर है यह 'चाहना' उस काल के युगबोध का सूचक है अर्थात भक्तिकाल में छल-प्रपंच से सामान्य जन पीडि़त थे। इसी प्रकार उद्धरण 'ख' में कबीर ने सहनशीलता और क्षमाशीलता जैसे गुणों और मूल्यों को अपनाने पर बल दिया है। प्रश्र उठता हैइसकी आवश्यकता उन्हें क्यों पड़ीइसका एक ही उत्तर है और वह है कि उस काल में इन गुणों का अभाव था और कवि ने उसी युगबोध को इस दोहे में मिथक के सहयोग से रूपायित कर दिया। इस प्रकार भक्तिकालीन दोहोकारों ने दोहों में मिथक प्रयोग को कई दृष्टियों से अपनाया है।   
संदर्भ-
1.भारतीय मिथक कोशसंपादक डॉ.उषा पुरीपृष्ठ-8
2.समकालीन हिन्दी साहित्यडॉ.बच्चन सिंहपृष्ठ-35
3, 14, 16.परामर्शजून, 1991, पृष्ठ-145, 147, 148
4.मानविकी परिभाषिक कोशडॉ.नगेन्द्र
5, 18.कबीर समग्रसंपादक युगेश्वरपृष्ठ-293, 442
6, 7, 17.दोहावलीतुलसीदासपृष्ठ-143, 143, 111
8, 11, 12. रहीम रचनावलीसंपादक -सत्यप्रकाश मिश्रपृष्ठ-78, 70, 68
9,10, 15.हिन्दी दोहा सारसंपादक -वरजोर सिंह सरलपृष्ठ-60, 47, 58
13.गीति सप्तकसंपादक डॉ.राकेश गुप्त एवं ऋषिकुमार चतुर्वेदीपृष्ठ-13

                                                                                                -डॉ.सुमन शर्मा,  दिल्ली 

Friday, March 27, 2015

दोहा : एक वक्तव्य

                मानुषी संवेदना की मर्मस्पर्शी अनुभूति और उसकी छान्दसिक अभिव्यक्ति, भारतीय काव्यकला की आधारभूमि रही है। वैदिक ऋचाएँ तथा प्रथम लौकिक काव्य, बाल्मीकि रामायण इस कथन के साक्षी हैं। दोहा छन्द अपनी छान्दसिक परंपरा में अग्रणी रहा। समय की अविच्छिन्न धारा में समाज-सापेक्षता के अनुरूप, काव्यविधाएँ, शिल्पान्तरित होती रही और प्राकृत युग में छान्दसिक भ्रूण के रूप में विद्यमान 'दोहा' (दोग्धक, दोधक, दूहक, दूहा आदि संज्ञाओं वाला) छंद अपभ्रंश में उद्भूत होकर निरन्तर वर्धमान होता रहा। हिन्दी साहित्य के आदिकालीन अपभ्रंश साहित्य (प्रमुखत: जैन एवं सिद्ध काव्यधारा) में दोहा छन्द पूर्णता प्रौढ़ता और प्रसिद्धि प्राप्त हुआ, अवहट्ट (पुरानी हिन्दी) में विराजमान हुआ। कालान्तर में भक्तिकाल और रीतिकाल में तो यह प्रमुखता एवं प्रभाववत्ता के साथ प्रतिष्ठित रहा। आधुनिक काल में भारतेन्दु युग तक दोहा, ब्रजभाषा मिश्रित हिन्दी में लिखा जाता रहा। द्विवेदी युग, खड़ी बोली की साहित्यिक प्रतिष्ठा का विशेष आग्रह लेकर आया तथा इस काल खंड में संस्कृत के वर्णिक एवं मात्रिक छन्दों को खड़ी बोली-काव्य भाषा में साग्रह निरूपित किया गया। इन्हीं छन्दों में लिखा गया अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' का 'प्रिय प्रवास' खड़ी बोली हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है। छायावादी कवियों, प्रमुखत: प्रसाद, निराला, पन्त और महादेवी आदि ने अपनी शालीन एवं उदात्त काव्याभिव्यक्ति के लिए अनेकानेक नये छन्दों को आविर्भूत किया। प्रगतिवाद व प्रयोगवाद, नई कविता, साठोत्तरी कविता, अकविता आदि काव्यान्दोलनों के चलते, धीरे-धीरे कविता, छान्दसिकता से लगभग विरत होती गई और आज तो वह छन्दमुक्त ही हो गई है, यह बात अलग है कि इसे 'गद्यकविता' न कहकर नई कविता (अकविता) के पक्षधर लोग 'मुक्तछन्द कविता' कहते हैं, गोया ये बुद्धिजीवी, छन्द जैसे साधनाप्रसूत कवि-कर्म से तो मुक्ति चाहते हैं, पर छान्दसिकता से कहीं न कहीं नाता जोड़े रखना चाहते हैं, इसीलिए अद्यतन 'गद्यकविता' में यदा-कदा शब्दों की आन्तरिक लय, ताल और पठनीयता के प्रवाह आदि की बातें होती रहती हैं।
                यद्यपि अकविता के इस दौर में भी छन्दोबद्ध काव्य रचनाएँ, अल्पमात्रा में ही सही, होती रहीं, किन्तु 'दोहा' प्राय: अदृश्य हो गया।
                स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी साहित्य में दुष्यंत की $गज़लों के प्रखर एवं उल्लेखनीय प्रभाव को देखते हुए यह महसूस किया गया कि हिन्दी में क्या कोई ऐसी विधा नहीं है, जिसकी दो पंक्तियों में उर्दू गज़ल की तरह प्रखर, प्रभावी और चुटीली बातें कही जा सकें। संभवत: इसी विचार ने अस्सी के दशक के आसपास दोहा छन्द की वापसी का काम किया। आज तो दोहा, हिन्दी काव्य विधा के केन्द्र में है। चार चरणों और 48 मात्राओं वाले इस छन्द के विषम चरणों में तेरह-तेरह तथा सम चरणों में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ, मानक बनी हुई हैं। प्रथम तथा तृतीय चरण के प्रारम्भ में जगण नहीं होना चाहिए। दूसरे और चौथे पद के अन्त में क्रमश: एक गुरु और एक लघु होना चाहिए। यह एक ऐसा छन्द है, जिसे उलट देने से 'सोरठा' तथा आदि और अन्त में दो-दो मात्राएँ बढ़ा देने से 'उल्लाला' छंद बन जाता है। मात्राओं के इस घटत-बढ़त या उलट-फेर से कई अन्य छंद बन जाते हैं।
                आज के दोहे अपनी पुरानी पीढ़ी से कई सन्दर्भों, अर्थों आदि में विशिष्ट हैं। इनमें भक्तिकालीन उपदेश, पारंपरिक रूढिय़ाँ और नैतिक शिक्षाएँ नहीं हैं, न ही रीतिकाल की तरह शृंगार। अभिधा से तो ये बहुत परहेज करते हैं। ये दोहे तो अपने समय की तकरीर हैं। युगीन अमानुषी भावनाओं, व्यवहारों और परिस्थितियों के प्रति इनमें जुझारू आक्रोश है, प्रतिकार है, प्रतिवाद है।
                इनके पास एक तीसरी आँख भी है जिसके द्वारा ये अपने काइयाँ समय के प्रच्छन्न छल-छद्म की नकाबपोशी को तार-तार कर देते हैं। इनकी अर्धगर्भी ध्वनियाँ, सहृदयों को व्यंजना के कई-कई गन्तव्यों का पता देती हैं। इनकी प्रखर, प्रभावी सम्प्र्रेषणीयता, वैचारिक स्तर पर, अनेक सवाल खड़े करती है। सामाजिक सरोकारों से प्रतिबद्ध व्यावहारिकता की प्रेरिका बनती है। नई 'ज़मीनÓ पर नई 'कहनÓ के साथ अधिष्ठित आज के दोहे, सवर्था काम्य हैं-
                दोहे 'दरपन' वक्त के, मौजूदा तकरीर।
                किसी यक्ष की त्रासदी, नागमती की पीर।।
                काया इनकी 'वामनी, माया किन्तु अनन्त।
                कभी संत बन कर रहा, कभी बना सामन्त।।
                हर मंजि़ल हर मोड़ पर, इसने छोड़ी छाप।
                काया तो है वामनी, लिया सभी कुछ नाप।।
                प्राकृत युग से आज तक, पा कितनों का प्यार।
                इस दोहे ने रचे हैं, कितने ही संसार।।
                सब मुरीद इसके रहे, मीर, औलिया, पीर।
                नरम पड़ा 'तुलसी' बना, अक्खड़ हुआ 'कबीर'।।
                गीत और नवगीत से, आगे है गतिमान।
                इसे $गज़ल ने भी दिया, स्वीकृति औ' सम्मान।।

-डॉ.राधेश्याम शुक्ल, हिसार