Thursday, June 18, 2015

नज्में - हरकीरत 'हीर'

भरोसा 

कितनी बार
भरोसा किया था तुम पर
पर हर बार भरोसे के धागे टूटते रहे
आज उदासियाँ आँखों में खड़ी
पूछती हैं मुझसे
हीर तेरे घर भरोसे की कोई
तस्वीर क्यों नहीं ....

(2)

सन्नाटे …

कभी इन खिड़कियों को
जितनी उम्मीद से खोला था मैंने
सन्नाटे उतने ही टूट कर अंदर आये
अब उम्मीदें नहीं पूछतीं
तुम्हारे मकान की खिड़कियाँ
बंद क्यों हैं ……

(3)

ज़ख़्म ...

यादों को उलटते- पलटते
खुल जाते हैं अक्सर दर्द की टांके
वक़्त भी नहीं भर पाता
सारी उम्र …
मुहब्बत के ज़ख़्म ....

-हरकीरत 'हीर, गुवहाटी  

0 comments:

Post a Comment