Showing posts with label पुस्तक समीक्षा. Show all posts
Showing posts with label पुस्तक समीक्षा. Show all posts

Tuesday, September 29, 2015

मेरी नज़र में 'आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं' : माधव नागदा

       त्रिलोक सिंह ठकुरेला द्वारा संपादित लघुकथा संग्रह ‘आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं’ मेरे सम्मुख है| आजकल संपादित लघुकथा संग्रहों की बाढ़ सी आ गई है| यह बात लघुकथा के भविष्य के लिए अच्छी भी है और बुरी भी| लघुकथा की विकास यात्रा में मील का पत्थर बनने की होड़ में कई लोग बिना किसी संपादकीय दृष्टि या कि सूझ-बूझ के जैसी भी लघुकथाएं उन्हें उपलब्ध हो जाती हैं उन्हें इकट्ठाकर पाठकों के सम्मुख पटक देते हैं| शायद इसी बात से दुखी होकर बलराम को कहना पड़ा है कि अधिकांश लघुकथा संग्रह भूसे के ढेर हैं जिनमें दाना खोज पाना बहुत मुश्किल काम लगता है| इस बात का उद्धरण स्वयं ठकुरेला ने ‘अपनी बात’ में दिया है| इसका अर्थ यह हुआ कि ठकुरेला ऐसा लघुकथा संकलन पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना चाहते हैं जिसमें भूसा कम और दाने अधिक हों| यद्यपि उन्होंने ‘अपनी बात’ में सीधे-सीधे अपने उद्देश्य के बारे में कुछ नहीं कहा है| हम केवल अनुमान लगा सकते हैं| वे कहते हैं, ‘लघुकथा घनीभूत संवेदनाओं को व्यक्त करने की क्षमता रखती है|’ अर्थात् वे ऐसी क्षमतावान लघुकथाएं संकलित करना चाहते हैं जिनमें घनीभूत संवेदनाएं हों| परन्तु मुझे लगता है कि उनका वास्तविक उद्देश्य कुछ और ही है जो कि पुस्तक के शीर्षक से ध्वनित होता है| शीर्षक है, ‘आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं|’ यानि ऐसी लघुकथाओं का संकलन जो आधुनिक हों| परन्तु उन्होंने कहीं भी ‘आधुनिक’ की अवधारणा पर प्रकाश नहीं डाला है| यदि हम ‘आधुनिक’ की काल सापेक्ष चर्चा करें तो डॉ.रामकुमार घोटड़ के अनुसार लघुकथा के संदर्भ में सन् 1970 के पश्चात् का समय आधुनिक काल है| इस दृष्टि से सन् 1971 से अब तक रचित लघुकथाएं आधुनिक लघुकथाएं हैं| परन्तु मेरी दृष्टि में आधुनिकता की यह परिभाषा मुकम्मल नहीं है| कारण कि काल विभाजन की दृष्टि से कोई रचना आधुनिक होते हुए भी जरूरी नहीं कि मूल्यबोध की दृष्टि से भी आधुनिक ही हो| उदाहरण के लिए एक लघुकथा (इस संग्रह से नहीं) इस प्रकार है: एक स्त्री को प्रसव-पीड़ा से मुक्ति मिलती है| जब दाई बताती है कि लड़की हुई है तो वहां उपस्थित सभी स्त्रियों के चेहरे प्रसन्नता से खिल उठते हैं| आगे लेखक अपनी तरफ से टीप जड़ता है, ‘कहने की आवश्यकता नहीं कि वे सब वेश्याएं थीं|’ यानि पुत्री जन्म पर यदि कोई स्त्री खुशी जाहिर करती है तो लेखक के अनुसार वह वेश्या होगी| जाहिर है कि आधुनिक काल में रची गई होने के बावजूद प्रतिगामी मूल्य वाली यह लघुकथा आधुनिक तो कतई नहीं है| हां, समकालीन जरूर है| समय सापेक्षता समकालीनता का द्योतक है, आधुनिकता का नहीं| तो फिर सर्जनात्मकता के संदर्भ में आधुनिक होने का क्या तात्पर्य है? मेरे विचार से भाषा, भाव, कथ्य, संवेदना, शिल्प, विचार, जीवन मूल्य की दृष्टि से जिस रचना में नयापन हो वही आधुनिक है| आधुनिक वह है जो पुरानी सड़ी-गली, तर्कहीन मान्यताओं के प्रति अपना विरोध दर्ज करे या फिर उनके परिष्कार की ओर संकेत करे| आधुनिक लघुकथा या कोई भी रचना ताजा हवा के झोंके की तरह होती है| डॉ.कुन्दन माली के अनुसार, ‘आधुनिकता जीवन और सर्जन के क्षैत्र में मौजूद यथास्थिति और रूढ़ियों के प्रतिकार का नाम है|’
इस दृष्टि से विचार करें तो ‘आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं’ की कई लघुकथाएं आधुनिकता की कसौटी पर खरी उतरती हैं|
आज के दौर की कई लघुकथाओं में नगरीय जीवन की भागदौड़ भरी जिंदगी के कारण बुजुर्गों की दयनीय होती जा रही स्थिति को खूब चित्रित किया गया है| परन्तु रामेश्वर काम्बोज हिमांशु की लघुकथा ‘ऊंचाई’ इन सबसे अलग हटकर है| यहां पिता जिस ऊंचाई पर खड़े हैं उसे देखकर एक ताजगी का अहसास होता है| यह लघुकथा सिर्फ कथ्य की दृष्टि से ही नहीं वरन अपनी संवेदनात्मक छुअन के लिए भी उल्लेखनीय है| रामयतन यादव की ‘डर’ में भी कमोबेश यही स्वर उभरकर आया है परन्तु तनिक भिन्न संदर्भ में| यहां मरणासन्न माधव अंकल का स्वाभिमान मन को भिगो देता है|
राजेन्द्र परदेसी ने आज के शहरी युवा के मन में ग्रामीण जन-जीवन के प्रति पनप रहे वितृष्णा भाव को बड़ी कुशलता के साथ अपनी लघुकथा ‘दूर होता गांव’ में पिरोया है| प्रकान्तर से यह उपेक्षा श्रमशील संस्कृति के प्रति भी है जिसे लेखक ने सटीक संवादों के साथ प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है| डॉ.रामनिवास मानव की लघुकथा ‘दौड़’ भी गांव और नगर के बीच की खाई की ओर इशारा करती है|
प्रतापसिंह सोढ़ी ‘शहीद की माँ’ में शहीद बेटे की तस्वीर के माध्यम से देश की दुर्दशा के बीच स्वतंत्रता दिवस की धूमधाम के विरोधाभास को बड़े ही मर्मस्पर्शी रूप में प्रस्तुत करते हैं|
ज्योति जैन की ‘अपाहिज’ लघुकथा सोच को सार्थक दिशा देने वाली एक सशक्त लघुकथा है| इसमें पायल अपाहिज यश को अपना जीवन साथी चुनती है क्योंकि वह स्वयं फैसला लेने में सक्षम है| अमन पूर्णतया स्वस्थ होते हुए भी रीढ़विहीन है क्योंकि जिन्दगी के अहम् फैसले स्वयं नहीं ले सकता| यश को चुनकर पायल न केवल साहस का परिचय देती है वरन समाज के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करती है|
सुकेश साहनी सदैव शिल्प और कथ्य के स्तर पर पुरानी जमीन तोड़ते रहे हैं| इस संग्रह की लघुकथा ‘बिरादरी’ में उन्होंने बड़े सधे हुए अंदाज में इस बात को रेखांकित किया है कि किस तरह मनुष्य का व्यवहार सामने वाले के स्टेटस को देखकर पल-पल रंग बदलता है| भाषा के स्तर भी उन्होंने ध्यानाकर्षक प्रयोग किए हैं यथा, ‘किसी पुराने परिचित से सामना होने की आशंका मात्र से मेरे कान गर्म हो उठे’, ‘दांयीं आंख के नीचे बड़े-से मंसे के कारण मुझे अपने बचपन के दोस्त सीताराम को पहचानने में देर नहीं लगी’, ‘मैंने प्यार से उसकी तौंद को मुकियाते हुए कहा|’ साहनी की ‘आईना’ भी एक स्थापित उपन्यासकार की गरीबों के प्रति सहानुभूति के खोखलेपन को आईना प्रतीक के माध्यम से एकदम मौलिक तरीके से अभिव्यक्त करती है|
मुरलीधर वैष्णव की ‘पॉकेटमार’ तीर्थस्थलों पर पंडे-पुजारियं द्वारा की जाने वाली लूट पर प्रकाश डालती है तो अंजु दुआ जैमिनी की ‘कमाई का गणित’ इन पवित्र स्थलों पर दुकानदारों द्वारा भक्तों के साथ की जाने वाली चालाकियों का रोचक बयान है|
संग्रह की कई लघुकथाओं में दरकते रिश्तों को नयेपन के साथ विश्वसनीय तरीके से चित्रित किया गया है| ये लघुकथाएं हैं आशा शैली की ‘खोटा सिक्का’, कमल कपूर की ‘सर्वेंट क्वार्टर’ व ‘सहारे’, ज्योति जैन की ‘झप्पी’, कृष्णकुमार यादव की ‘बेटे की तमन्ना’, शकुन्तला किरण की ‘कोहरा’, सुरेश शर्मा की ‘भूल’ , अमरनाथ चौधरी अब्ज की ‘वसीयत’ आदि| इनमें से कमल कपूर की ‘सर्वेंट क्वार्टर’ को पाठक लम्बे समय तक भूल नहीं पायेंगे| पोता पेंटिंग में घर बनाता है, घर में अलग-थलग सर्वेंट क्वार्टर| पिता खुश होता है कि बेटा सर्वेंट के लिए भी अलग घर बना रहा है| इस पर बेटा कहता है कि यह आपके लिए है, जब बूढ़े हो जाओगे तब इसमें रहोगे| दादाजी भी तो सर्वेंट क्वार्टर में ही रहते हैं| यह लघुकथा उस पुरानी कहानी का आधुनिक परिवेश में सार्थक रूपान्तरण है जिसमें बेटा मिट्टी के बरतन को संभालकर रखता है जिसमें दादाजी को बचा-खुचा खाना खिलाया जाता रहा है| सूर्यकान्त नागर की ‘कुकिंग क्लास’ तथा डॉ.सुधा जैन की ‘समाज सेवा’ सास-बहू के रिश्तों के तनाव को नये ढंग से परिभाषित करती हैं| अर्थहीन होते जा रहे रिश्तों को लेकर प्रभात दुबे की ‘गर्म हवा’ जबर्दस्त लघुकथा है| यह रचना वृद्ध लोगों की त्रासदी को घनीभूत संवेदना के साथ प्रस्तुत करती है| यह जानकर कि शर्माजी को उनके बेटे-बहू ने वृद्धाश्रम भेज दिया है, उनके साथ रोज घूमने वाले शेष दो वृद्ध बुरी तरह सहम जाते हैं| उन्हें अपना भविष्य दिखने लगता है| ट्रीटमेंट के लिहाज से यह लघुकथा बेहद सशक्त है|

यह सच है कि आज के समय में तमाम रिश्ते बेमानी होते जा रहे हैं, वृद्धजन लगातार अपनों ही के द्वारा अपमान झेलने को मजबूर हैं और स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं| ऐसे में डॉ.दिनेश पाठक शशि की ‘साया’ एवं डॉ.योगेन्द्र नाथ शुक्ल की ‘टूटी घड़ी’ अंधेरे में प्रकाश की बारीक लकीर की तरह नयी आशा जगाती है| ‘साया’ में अपनी बीमार वृद्धा मां की मृत्यु पर बेटा स्वयं को अकेला और अनाथ-सा अनुभव करता है जबकि ‘टूटी घड़ी’ में पुत्र अपनी मां की निशानी स्वरूप बची एक टूटी घड़ी के प्रति पिता के भावनात्मक लगाव को देखकर उसे कमरे से फेंकने की बजाय पुनः वहीं रख देता है| ये दोनों लघुकथाएं इस बात के प्रति आश्वस्त करती हैं कि अभी तक मानवीय संवेदनाएं पूरी तरह मरी नहीं हैं कि अभी भी बहुत कुछ बचा हुआ है|
संग्रह में ऐसी लघुकथाएं भी हैं जिनमें अभावग्रस्त आम आदमी की भूख और जिल्लत भरी जिंदगी को नये शिल्प और अछूते प्रतीकों के माध्यम से वाणी दी गई है| पेट की ‘आग’(देवांशु पाल) ‘भूत’(डॉ.पूरन सिंह) पर भारी पड़ती है| ‘भूत’ लघुकथा का नायक भूख के आगे बेबस होकर श्मशान घाट पर रखे भोजन को ग्रहण करने से भी भयभीत नहीं होता है| ‘पैण्ट की सिलाई’(डॉ.रामकुमार घोटड़), ‘साहब का कुत्ता’(आकांक्षा यादव), ‘पसीना और धुंआ’(अंजु दुआ जैमिनी), ‘सोने की चेन’(डॉ.रामनिवास मानव) तथा ‘पहली चिन्ता’(डॉ.कमल चोपड़ा) लघुकथाएं आम आदमी की बेबसी को अपने-अपने ढंग से बयान करती है| डॉ.कमल चोपड़ा की ‘धर्मयुद्ध’ भी उल्लेखनीय है जो बेबाकी के साथ सांप्रदायिक दंगों के राजनीतिक मुखौटे को बेनकाब करती है| डॉ.सतीशराज पुष्करणा की ‘अंधेरा’ भी इसी अंधेरे पक्ष के चलते चारों ओर पसरे वैचारिक शून्य को भरने की सर्जनात्मक कोशिश है|
संग्रह में कुछ और लघुकथाएं हैं जो कथ्य या शिल्प की ताजगी के चलते अलग से ध्यान आकर्षित करती हैं| ये हैं ‘विरेचन’(डॉ.पुरुषोत्तम दुबे), ‘गुस्सा’(गुरुनाम सिंह रीहल), ‘मामाजी’(नदीम अहमद नदीम), ‘यकीन’, ‘भरोसा’(निशा भोंसले), ‘घिसाई’(राजेन्द्र साहिल), ‘प्रश्न चिह्न’(प्रदीप शशांक), ‘फर्क’(इंदु गुप्ता), ‘मध्यस्थ’(मालती बसंत), ‘सुकन्या’(कुंवर प्रेमिल) और ‘नया क्षितिज’(साधना ठकुरेला)| ‘विरेचन’ में चुटीले संवादों के माध्यम से पर निंदा सबसे बड़ा सुख कहावत को चरितार्थ किया गया है तो ‘गुस्सा’ में कायर का गुस्सा सदैव कमजोर पर निकलता है को| ‘मामाजी’ और ‘नया क्षितिज’ में पुरुष मानसिकता पर सार्थक चोट की गई है| साधना ठकुरेला ने चिड़े का प्रतीक लेकर एक नयी बात कही है कि नर किसी भी प्रजाति का हो नारी के प्रति उसका रवैया सदा समान रहता है|
आज भ्रष्टाचार ने इस कदर शिष्टाचार का रूप धारण कर लिया है कि ईमानदार आदमी की निष्ठा भी अविश्वसनीय लगती है(यकीन)| दूसरी ओर राजेन्द्र सिंह साहिल की ‘घिसाई’ ईमानदार आदमी के भोलेपन और तद्जन्य बेबसी को बताती है| निशा भोंसले की ‘भरोसा’ में पिता द्वारा जवान बेटी को दिया गया यह जवाब मन को झिंझोड़कर रख देता है, ‘तुम पर (भरोसा) है पर इस शहर पर नहीं|’ यह अकेला वाक्य लोगों की मानसिकता पर एक मुकम्मल बयान है| ‘प्रश्न चिह्न’ समय के साथ लोगों के बदलते मिजाज का अच्छा जायजा लेती है| यहां तलाक मिल जाने की खुशी(?) में युवती को मिठाई बांटते हुए दिखाया गया है| संतोष सुपेकर की ‘उलझन’ तथा ‘एक और जानवर’ भी नयी जमीन पर खड़ी दिखायी देती है| लेखक जब एक व्यक्ति को घायल बैल पर गाड़ी चढ़ाते देखता है तो उसकी यह टिप्पणी बहुत कुछ कह देती है, ‘सबने केवल एक जानवर देखा, पर मैंने दो जानवर देखे, एक चौपाया और एक दोपाया|’ वस्तुतः आज समाज में दोपाये जानवरों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है जिनके प्रति एक साहित्यकार ही अपनी लेखनी द्वारा लोगों को सचेत कर सकता है|
आजकल जातिवाद भी हमारे समाज में नासूर की तरह फैलता जा रहा है| अफसोस कि राजनेता अपने नहित स्वार्थों के लिए इस सड़ांध को बचाए और बनाये रखना चाहते हैं| हालांकि जातिवाद के इस पहलू पर गौर करने वाली लघुकथाओं का अभाव है फिर भी इसके परंपरागत कारणों पर प्रहार करने वाली कतिपय लघुकथाएं यहां संकलित की गई हैं| ये लघुकथाएं हैं त्रिलोक सिंह ठकुरेला की ‘रीति-रिवाज’, आनन्द कुमार की ‘विभेद’, ‘अपवित्र’ अशोक भाटिया की ‘बंद दरवाजा’ तथा डॉ.सुरेश उजाला की ‘जातिगत द्वेष|’
यद्यपि सभी लघुकथाओं में यथार्थ को विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है और भाषा के प्रति भी पर्याप्त सावचेती बरती गई है फिर भी कहीं-कहीं असावधानीवश कुछ छिद्र रह गये हैं| उदाहरण के लिए जातिगत भेदभाव की मनोवृत्ति पर प्रहार करने वाली लघुकथा ‘विभेद’ का आरंभ यों होता है, ‘बात आज से 20-25 साल पूर्व की है|’ यह पंक्ति अनावश्यक है और लघुकथा के शिल्प को क्षति पहुंचाने वाली है| लगता है जैसे लेखक किसी सत्य घटना का बयान करने जा रहा है| इसी तरह ‘सोने की चेन’ लघुकथा जो आरंभ में बहुत सहजता के साथ आगे बढ़ रही होती है कि ‘मैं’ पात्र द्वारा चेन वाले से पूछा गया यह प्रश्न पाठकों को चौंका देता है, ‘भाई, यदि तुम्हारी चेन इतनी बढ़िया है तो इसे अपनी बेटी और बीवी को क्यों नहीं पहनाते?’ यह वाक्य यथार्थ को खंडित करने वाला है क्योंकि लघुकथा में कहीं नहीं बताया गया है कि लेखक (मैं) ने चेन वाले की बीवी व बेटी को पहले कहीं देखा है कि ये दोनों नकली चेन नहीं पहने हुए हैं| पाठक के मन में तो यह सवाल भी उत्पन्न होता है कि लेखक को कैसे पता कि चेन वाले के एक बेटी भी है| जरा सी असावधानी लघुकथा की विश्वसनीयता को सवालों के घेरे में खड़ा कर देती है| एक लघुकथा में वाक्य प्रयोग आता है, ‘उल्लास से छलकता, उसका मन सहसा बुझ गया|’ बुझता वह है जो जलता है| छलकने वाला तो रीतता है| अतः यहां छलकने के साथ बुझना का प्रयोग अप्रासंगिक है| एक और लघुकथा में वाक्य-खण्ड आता है, ‘एक पान के ठेले के सामने खड़े रिक्शेवाले की वजह से’ जबकि होना चाहिए ‘पान के एक ठेले के सामने...|’
कुल मिलाकर ‘आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं’ संग्रह की आधिकतर लघुकथाओं में नये शिल्प और संवेदना के साथ समकालीन जीवन मूल्यों तथा समाज में व्याप्त विसंगतियों का गहराई के साथ जायजा लिया गया है| ये लघुकथाएं निस्सन्देह पाठकों को रोजमर्रा की समस्याओं पर नये सिरे से सोचने के लिए बाध्य करेंगी|

संदर्भ-

आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं, संपादक-त्रिलोक सिंह ठकुरेला, प्रकाशक-अरिहन्त प्रकाशन, जोधपुर |

Wednesday, April 8, 2015

संवेदनाओं का विस्तार करता लघुकथा संग्रह : प्रतिबिम्ब


आधुनिक परिवेश और प्रकृति की उपज है - लघुकथा। लघुकथा की परिभाषा इसके नाम में ही शामिल है। यह सीमित आकार वाली वह कथात्मक रचना है जो द्वन्द्वमूलक नाटकीय प्रसंग विधान के माध्यम से विकृति पर प्रहार करके पाठकों को सही सांस्कृतिक दिशा में सोचने को प्रेरित करती है। लघुकथा की आकारगत लघुता उसे कलात्मक कसाव प्रदान करती है। साथ ही पाठक की संवेदनशीलता जगाकर मन की ऋतु का परिवर्तन कर सकती है। कहते हैं, लघुकथा लेखन गागर में सागर भरने जैसा है। बात ठीक है, परन्तु यह ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि सागर में कई विषैले जीव-जन्तु भी रहते हैं। इन सबको एक साथ भर लेने से गागरी फूटने का डर रहता है।

Monday, April 6, 2015

कबीर की शैली में धारदार रचनाएं

रघुविन्द्र यादव के दो दोहा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं तथा मुझ में संत कबीर’ उनका प्रथम कुंडलिया छंद संग्रह है। कुंडलिया एक मुश्किल छंद है और इसे साधना सहज नहीं है। इसे तो वही साध सकता है जिसे खांडे की धार पर नंगे पांव चलने में महारत हासिल हो। वे अपने प्रथम कुंडलिया छंद संग्रहमुझमें संत कबीर’ में एक छंदसिद्ध कवि के रूप में सामने आये हैं। हिंदी कविता में कुंडलियां छंद कवि गिरधर के नाम से जाना जाता हैलेकिन रघुविन्द्र यादव ने अपना संबंध कबीर से जोड़ा है और इसकी वजह भी अब हम कवि से ही जानें :-मरने मैं देता नहींअपना कभी ज़मीर।इसीलिए ज़िंन्दा रहामुझमें संत कबीर।।मुझमें संत कबीर बैठकर दोहे रचता।कहता सच्ची बातकलम से झूठ न बचता।(पृ.55)इस कृति की राह से गुजरने पर पता चलता है कि कवि का रास्ता वाकई कबीर का है। उनकी कविता ऐन मुहाने पर चोट करती है। देखें यह पंक्तियां जो पाठक की चेतना पर चोट करती है

समय से संवाद करते मुक्तकों का संग्रह : आँसू का अनुवाद

काव्य के विषयगत दो भेद होते हैं-प्रबंध काव्य और मुक्तक काव्य। प्रबंध काव्य में विषय विशेष को छंदोबद्ध कविता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि मुक्तक काव्य की विषय सामग्री स्वतंत्र होती है और चार सममात्रिक पंक्तियों में ही स्वतंत्र भाव अथवा विचार को किसी छंद में प्रस्तुत करती है। मुक्तक काव्य में छंद विशेष की बाध्यता नहीं होती और यह किसी भी छंद में लिखा जा सकता है, मगर जिस भी छंद का चुनाव किया जाये उसका निर्वाह किया जाना अपेक्षित है। सामान्यत: मुक्तक में चार सममात्रिक पंक्तियाँ होती हैं। जिसकी पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुकान्त या समान्त होता है, जबकि तीसरी पंक्ति में तुकान्त/समान्त होता भी है और नहीं भी, लेकिन कथ्य का उद्वेग अवश्य होता है। आपाधापी के इस दौर में लोगों के पास  लम्बी कविताओं को पढऩे का वक्त नहीं है इसलिए दोहे की तरह मुक्तक भी लोकप्रिय होते जा रहे हैं।

विद्रूपताओं को बेपर्दा करता गीतिका संग्रह : कौन सुने इकतारा

भद्रजनों को संबोधित कर पद्य में बात कहने की परम्परा काफी पुरानी है। कबीर साहब जहाँ 'साधो' संबोधन का प्रयोग करते थे, वहीं उर्दू-फारसी के रचनाकार 'शैख जी' को संबोधित कर अपनी बात कहते रहे हैं। श्री रमेश जोशी का सद्य प्रकाशित गीतिका संग्रह 'कौन सुने इकतारा' इसी शैली की रचनाओं का संग्रह है, जिसे डॉ.रणजीत ने कबीर की चौथी विधा बताया है। जोशी जी ने अपनी बात 'भगत जी' और 'भगतो' संबोधनों का प्रयोग करते हुए गीतिका में कही है। जोशी जी ने कबीर की शैली को ही आत्मसात नहीं किया है वरन् उनकी रचनाओं की धार और मार भी कबीर जैसी ही है-

सुने न कोई हाल भगत जी
भूलो दर्द मलाल भगत जी
राजा बहरा जनता गूँगी
पूछे कौन सवाल भगत जी
भूख मज़ूरी मौज़ दलाली
बुरा देश का हाल भगत जी
अब घडिय़ालों के कब्ज़े में
है बस्ती का ताल भगत जी
कवि ने राजनीति, समाज, मंच, मीडिया, पर्यावरण, शिक्षा, नारी, पश्चिम के अंधानुकरण, भ्रष्टाचार, स्वार्थपरता, जीवन की विसंगतियों, मूल्यहीनता, गाँवों की बदहाली आदि जीवन और जगत से जुड़े अनेक विषयों पर अपनी लेखनी चलाई है। आलोच्य कृति में कुल 105 गीतिकाएँ शामिल की गई हैं।
जोशी जी का संवेदना-संसार व्यापक है और सहज-सरल भाषा में अपनी बात कहने में निपुणता हासिल है। कवि सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण से आहत है, उसे लगता है कि अब 'मंच मीडिया और सत्ता सभी पर लम्पट भाँड और नचनिया काबिज़ हो गए हैं', 'उपभोक्ता को ललचाने के लिए मॉडल वस्त्र उतार रही हैं', 'संयम गायब है और सबको भोग का बुखार चढ़ा है', 'सत्ता काजल की कोठरी बन चुकी है, जिसमें कोई दूध का धुला नहीं है', 'ब्रेक डाँस की महफिलें हैं, जहाँ इकतारा सुनने वाला कोई नहीं है' और 'पूर्व के अंधों को पश्चिम में उजियाला नज़र आ रहा है।' कवि ने जीवन के जटिल यथार्थ को भी धारदार भाषा में सहजता से प्रकट किया है।
नारी पूजक इस देश में आज यदि कोई सबसे अधित असुरक्षित है तो वह है नारी। जो गर्भ में भी सुरक्षित नहीं वह घर और समाज में कैसे सुरक्षित होगी? कवि जब नारी की दशा का वर्णन करते हुए कहता है-
हवा धूप से डरता जिसकी
बेटी हुई जवान भगत जी
---
द्रौपदियों पर ही लगता है
दुर्योधन का दाँव भगत जी
तो आज के समाज का नंगा यथार्थ अपने विद्रूपित चेहरे के साथ सामने आ जाता है। इसी प्रकार जब कवि मौजूदा व्यवस्था के षड्यंत्रकारी शोषक चेहरे को बेनकाब करते हुए कहता है-
सस्ते शिक्षा ऋण पर चाहे
ध्यान न दे सरकार भगत जी
मगर कार ऋण देने खातिर
बैंक खड़े तैयार भगत जी
---
जाने दस्यु-मुक्त कब होगी
लोकतंत्र की चम्बल भगतो
---
लोकतंत्र में कुत्ता करता
हड्डी की रखवाली भगतो
तो भारतीय राजनीति का कड़वा सच सामने आ जाता है कि किस तरह लोकतंत्र में लोक उपेक्षित है।
कवि की पैनी नज़र से समाज की विसंगतियाँ और विद्रूपताएँ छुपी नहीं हैं। बुजुर्गों को आज जिस प्रकार से उपेक्षित और अपमानित किया जा रहा है वह दुखद और विचारणीय है-
जब से नई बहू आई है
बाहर बैठी माँ जी भगतो
कवि की भाषा मुहावरेदार है और कथ्य को प्रभावशाली बनाने के लिए उर्दू, फारसी, पंजाबी, अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ देशज शब्दों का भी प्रयोग किया है-
छाछ शिकंजी को धमकाता
अमरीका का ठंडा भगतो
है बंदर के हाथ उस्तरा
कर डालेगा कुंडा भगतो
कवि अपने परिवेश के प्रति सजग और संवेदनशील है। जल को व्यापार की वस्तु बना दिए जाने और अब तक स्वच्छ पेयजल उपलब्ध न होने पर कटाक्ष किया है-
क्या दारू क्या गंदा पानी
हमको मरना पीकर भगतो
---
ढोर पखेरू निर्धन प्यासे
पानी के भी दाम भगत जी
चौतरफा पतन और गिरावट के बावजूद कवि निराश नहीं है, उसे यकीन है कि सुबह ज़रूर आएगी-
आशा से आकाश थमा है
कभी न छोड़ो आस भगत जी
अंधियारे के पीछे-पीछे
आता सदा उजास भगत जी
मीथकों का प्रयोग अत्यंत प्रभावी है। द्रौपदी, दुर्योधन, कृष्ण, कंस, राम, सीता, दसानन आदि का प्रयोग करके कवि ने अभिव्यक्ति को दमदार बनाया है। पेपर बैक इस 112 पृष्ठ वाली कृति की साज-सज्जा आकर्षक और मूल्य 125 रुपए बहुत वाजि़ब है। कबीर की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले इस संग्रह का साहित्य जगत से व्यापक स्वागत होगा, ऐसा विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है।

कृति-कौन सुने इकतारा
कवि-रमेश जोशी
पकाशक-अनुज्ञा बुक्स, शहादरा, दिल्ली
पृष्ठ-112 मूल्य-125 रुपए

                                                                 -रघुविन्द्र यादव


बात तो बोलेगी

बात बोलेगी मुरादाबाद के चर्चित रचनाकार श्री योगेन्द्र वर्मा व्योम की सद्य प्रकाशित कृति है। जिसे गुँजन प्रकाशन, मुरादाबाद ने प्रकाशित किया है। इस कृति में देश के पन्द्रह प्रसिद्ध गीत/नवगीतकारों और शायरों के साक्षात्कार प्रस्तुत किए गए हैं। जिनमें डॉ.शिवबहादुर सिंह भदौरिया, श्री ब्रजभूषण सिंह गौतम अनुराग, श्री देवेन्द्र शर्मा इन्द्र, श्री सत्यनारायण, श्री अवधबिहारी श्रीवास्तव, श्री शचीन्द्र भटनागर, डॉ.माहेश्वर तिवारी, श्री मधुकर अष्ठाना, श्री मयंक श्रीवास्तव, डॉ.कुँवर बेचैन, श्री ज़हीर कुरैशी, डॉ.ओमप्रकाश सिंह, डॉ.राजेन्द्र गौतम, श्री आनन्दकुमार गौरव और डॉ.कृष्णकुमार राज शामिल हैं।

साक्षात्कार का सबसे महत्वपूर्ण पहलु है कि साक्षात्कार करने वाले को खुद इस बात का पूरी तरह से ज्ञान होना चाहिए कि वह सामने वाले से क्या जानना चाहता है और इसी आधार पर प्रश्रोत्तरी तैयार की जानी चाहिए। श्री योगेन्द्र व्योम ने यह कार्य पूरी दक्षता के साथ किया है। उन्होंने ने न सिर्फ देश के वरिष्ठ रचनाकारों से उनके साहित्य के संदर्भ में चर्चा की है अपितु गीत-नवगीत और $गज़ल की दशा और दिशा के बारे में भी महत्त्वपूर्ण सवाल किए हैं। वरिष्ठ रचनाकारों के साथ की गई चर्चा नये कलमकारों के पथ-प्रदर्शक का काम करेगी। नये रचनाकार और पाठक जान सकेंगे कि गीत और नवगीत में क्या अंतर है, $गज़ल और गीत-नवगीत में क्या अंतर है और इनके सृजन के लिए क्या-क्या बातें ध्यान में रखना जरूरी है कि साहित्य टिकाऊ बने।
गीत-नवगीत के भविष्य के प्रति पुरानी पीढ़ी की सोच क्या है और वे किस हद तक आश्वस्त हैं, शायर गीत के साथ और गीतकार गज़ल के साथ न्याय कर रहे हैं या नहीं, गीत के कथ्य में क्या परिवर्तन आया है, नवगीत के समक्ष क्या चुनौतियाँ हैं, हिन्दी $गज़ल को कहाँ तक सफलता मिली है आदि सवालों के जवाब श्री व्योम ने उन रचनाकारों से पूछे हैं जिनका इन विधाओं को बुलंदियों पर ले जाने में अहम योगदान है।
बात बोलेगी के माध्यम से केवल गीत और गज़ल की ही जानकारी पाठकों को नहीं मिलेगी बल्कि वरिष्ठ रचनाकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व से भी पाठक रूबरू हो सकेंगे। अगर यह कहा जाए कि कृति हर लिहाज से एक एतिहासिक दस्तावेज बन गई है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। आकर्षक आवरण, सुन्दर और शुद्ध छपाई वाली इस 208 पृष्ठ वाली कृति का मूल्य 300 रुपये वाजिब ही कहा जाएगा। कृति पठनीय है और व्योम जी बधाई के पात्र।

                                                                         -रघुविन्द्र यादव 


परहित की पगडंडियां तलाशते दोहे

विचार विधाओं में बंधकर कदापि नहीं रहा करते हैं। कई विधाओं में एक साथ इसी बात को पुख्ता करते हुए छह लघुकथाबालकविता और बालकथा संग्रहों के पश्चात कृष्णलता यादव की सातवीं कृति मन में खिला वसंत’ (दोहा-संग्रह) हाल ही में प्रकाशित हुई है।समीक्ष्य कृति मन में खिला वसंत’ में 666 विविधवर्णी दोहे संकलित हैं जो आठ उपशीर्षकों के अंतर्गत विभाजित किए गए हैंकामनापर्यावरणआपदादीवालीहोलीराजनीतिनीति और विविध। कामना’ के अंतर्गत कवयित्री ने परनिंदाआडम्बरजाति-पाति के बंधनों व दुर्भाव को बिसराकर जनकल्याण की भावना को प्रमुखता देते हुए मां शारदे से कामना की है। वह कहती हैं :-सुनो अरज मां शारदेदो अपना आशीष। उत्तम होवे भावनाघटे जगत् की टीस॥ वास्तव में आज के दौर की सर्वोपरि चिन्ता हैदूषित पर्यावरण। पर्यावरण का दूषित होना सम्पूर्ण मानव-जाति के लिए खतरे की घंटी है। दूषित पर्यावरण पेड़-पौधोंजीव-जंतुओंनदियोंधरतीपहाड़ोंहवा आदि सभी के लिए अहितकर है। तभी तो कवयित्री चीत्कार कर उठती हैं :-हरियाली छिटकी हुईसूने हैं मैदान। कहीं वाह’ का दौर हैकहीं आह’ के गान॥ किसी भी प्रकार की आपदा’ जीवन को नष्ट करती है। इसकी पृष्ठभूमि में मानव का बड़ा हाथ है। कवयित्री की चिन्ता साफ दृष्टिï गोचार होती है:-भोर हुई निरभागिनीखुशी रही कब शेष।क्रूर काल का डाकियाकहे शोक-संदेश॥ ‘दीवाली’ उजियारों का पर्व है जो अंधकार पर प्रकाश की विजय का घोतक भी है। देखिए :-ज्यों-ज्यों जलती जा रहीनवदीपों की पांत।छोटी त्यों-त्यों हो रहीअंधियारे की आंत॥मस्ती का वाहक त्योहार है—’होली। यह बुरे भावों को जलाकर राख कर डालता है और हर दिशा में बस मिलन का बोलबाला दिखता है। फागुनी हवाओं में भी रंग-अबीर तैरने लगता है। एक उदाहरण :-होली पर अंटने लगे,भेदभाव के कूप।राजा हो या रंक होलगें सभी समरूप॥इक्कीसवीं शताब्दी में राजनीति’ से नीति $गायब हो गयी हैरह गया है सिर्फ राज। विकृत राजनीति ने लोकतंत्र का रूप खूब बिगाड़ दिया है। बेचैन नर-नारी यहां-वहां मारे-मारे फिरते हैं तथा स्वतंत्र होकर भी परतंत्र लगते हैं। भ्रष्टाचारमहंगाईकालाधनरिश्वतचोरबाज़ारीबलात्कारलूटनारेआश्वासनचाटुकारितास्वार्थपरताघोटाले आदि इसी घृणित राजनीति के अनेकानेक चेहरे हैं।पांवों में नित चुभ रहेराजनीति के शूल। ‘राज’ राज होकर रहागया नीतियां भूल॥ ‘नीतिमानव को प्रीति की रीति सिखाती हुई चलती है जबकि अनीति गहरे गड्ढïे में धकेलती है। चालाकीबदनीयतकटु-वाणीकाम-क्रोधईष्र्या-द्वेषपरनिन्दाअज्ञानतानिठल्लापनअहंकारझूठदुष्टतामोह आदि को त्यागकर खुशबू की डगर पर पांव बढ़ाना ही समझदारी का काम है। प्यारसहयोगमित्रताभाईचाराअपनापनसद्भावनाविश्वाससाहसउत्तम उधम, गुणीजनों का साथ सही दिशा का निर्धारण कर लक्ष्य-प्राप्ति में सहायक बनते हैं। देखिए :-राहों में कांटे मिलेमंजि़ल भी थी दूर। कांटे बदले फूल मेंसाहस था भरपूर॥ कवयित्री कृष्णलता यादव ने विविध’ उपशीर्षक के अंतर्गत विभिन्न भावों से ओतप्रोत दोहे रखे हैं जो जीने की कला सिखाते हैंभटके हुए इन्सान को सचेत करते हैंबिगड़ी व्यवस्था पर चोट मारते हैंसुलह की वजह बांटते हैंधरा को स्वर्ग बनाने की कामना रखते हैंममता की छांव परोसते हैं और मानवता को दानवता के खूनी पंजों से मुक्त कराने का दम भरते हैं। उदाहरण दृष्टव्य है :-मानवता को थामिएहोने लगी अचेत।फिर ना कहना बावरेचिडिय़ा चुग गई खेत॥ अलग-अलग रंगों से पाठकों को रूबरू करवाते ये दोहे कथ्य और शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्ट बन गए हैं। नये-नये बिम्ब एवं प्रतीक इनके प्राण हैं। इनकी सरलसहज एवं रोचक भाषा-शैली है। लोकोक्तियों एवं मुहावरों का प्रयोग सलीके से हुआ है। एक दोहे (पृष्ठ-21) की पुनरावृत्ति (पृष्ठ-64) शायद भूलवश हो गयी है। कुछेक शब्दों का तुक असंगत लगता है। कुल मिलाकर परिवेशगत विसंगतियों का पर्दाफाश करते हुए सभी दोहे परहित की पगडंडियां तलाशते नज़र आते हैं।

                                                   घमंडीलाल अग्रवाल
०पुस्तक : मन में खिला वसंत ०कवयित्री : कृष्णलता यादव ०प्रकाशक : अयन प्रकाशन, 1/20, महरौलीनयी दिल्ली-110030 ०प्रथम संस्करण : 2012 ०पृष्ठ संख्या : 96 ०मूल्य : रुपये 150/-.
देनिक ट्रिब्यून से साभार 

जिन्दगी की डाल से तोड़े गये- ‘नागफनी के फूल’

रघुविन्द्र यादव बहुमुखी प्रतिभा के धनी संवेदनशील रचनाधर्मी हैं। आलोक प्रकाशन, नीरपुर, नारनौल से सद्य प्रकाशित 80 पृष्ठीय ‘नागफनी के फूल’ उनके 25 शीर्षकों में बंटे 424 दोहों का मनभावन संग्रह है। इसमें सरल भाषा में लिखे गये दोहों में जीवन, राजनीति, यथार्थ, जीवन की विसंगतियों, मूल्यहीनता, भ्रष्ट व्यवस्था, आतंकवाद, गाँव की बदलती हालत, पर्यावरण प्रदूषण, रिश्तों में फैलती स्वार्थपरता, संबंधों की मृदुता, हिन्दी की महत्ता आदि अनेक विषयों पर प्रभावी दोहे अनुस्यूत हैं। इन दोहों में मिथकों का नवीनीकरण करते हुए यथार्थ को वाणी दी गई है और सरल प्रतीकों से जीवन के सत्य को रुपापित किया गया है। इनका संवेदना-संसार व्यापक है। वे व्यक्ति से लेकर विश्व और अंतरिक्ष तक को अपना कथ्य बनाते हैं। भाषा पर कवि का अधिकार है और समन्वय का परिपालन करते हुए दोहाकार ने परिमार्जित शब्दावली से लेकर विदेशी और देशज शब्दों का खुलकर प्रयोग किया है। लोक-संस्कृति और लोक-जीवन के प्रति कवि का गहरा अनुराग है। इसीलिए तो शहर की जिन्दगी उसे ‘घर में ही वनवास’ भोगने जैसी लगती है। सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण से कवि आहत है, इसीलिए उसे लगता है कि अब ‘लोग नागों से भी अधिक विषैले हो गए हैं’, ‘आँगन में नागफनी’ उग आई हैं, चीखती द्रौपदी की लाज बचाने वाला कोई नहीं क्योंकि आज के केशव स्वंय गुण्डों से मिल गए हैं, नेता और दलाल देश को लूट कर खा रहे हैं और हमारी संवेदनाएं सूख गई हैं। धारदार भाषा में जीवन के जटिल यथार्थ को प्रकट करने की कवि की क्षमता प्रसंशनीय है। महिलाओं पर होने वाले अत्याचार और पुलिस के खौ$फनाक भक्षक चेहरे को उजागर करते हुए जब यादव जी कहते हैं- 

संसद में होती रही, महिला हित की बात।
थाने में लुटती रही, इज्जत सारी रात।।

तो आज का नंगा यथार्थ अपने विद्रूपित चेहरे के साथ सामने आ जाता है। इसी तरह जब वे आज की व्यवस्था के षडय़ंत्रकारी शोषक चेहरे को निरावृत्त करते हुए कहते हैं-

हत्या, डाका, रहजनी, घूस और व्यभिचार।
नेता करने लग गये, लाशों का व्यापार।।

तो आज की राजनीति का सच सामने आ जाता है। भू्रणहत्या जैसे दुर्दान्त पाप हों, या प्रकृति का अनियन्त्रित और अंधाधुंध दोहन, नेताओं की धूर्तता हो या पुलिस का अत्याचार, आज की पीढ़ी में पनपती अनास्था हो या पारिवारिक मूल्यों का क्षरण, फैलते बाजारवाद का दुर्दान्त चेहरा हो गया वैश्वीकरण के अंतहीन दुष्परिणाम, कवियों की गिरती छवि हो या पत्रकारिता का थ्रिल तलाशता बाजारी चेहरा, महँगाई की मार से बेदम हुआ अवाम हो या संबंधों में पनपी स्वार्थपरता, मूल्यों की टूटन हो या संस्कृति का क्षरण यादव जी सच को सच की भाषा में उकेरना जानते हैं। वे आज की समस्याओं और प्रश्रों से सीधे-सीधे मुठभेड़ करते हैं। यथार्थ जीवन की विकृतियों और दुर्दान्तताओं पर सीधे-सीधे चोट करते कुछ दोहे दृष्टव्य हैं-

विद्वानों पर पड़ रहे, भारी बेईमान।
हंसों के दरबार में, कौवे दें व्याख्यान।।
* * *
दो रोटी के वास्ते, मरता था जो रोज।
मरने पर उसके हुआ, देशी घी का भोज।।
* * *
जब से उनको मिल गई, झंडी वाली कार।
गुण्डे सारे हो गये, नेताजी के यार।।
* * *
नफरत बढ़ती जा रही, घटा आपसी प्यार।
जब से पहुँचा गाँव में, केबल का व्यापार।।
* * *
नारी थी नारायणी, बनी आज उत्पाद।
लाज-शर्म को त्याग कर, करे अर्थ को याद।।

इन दोहों की धार बड़ी तीखी है। भाषा के संबंध में कवि अत्यंत उदारवादी है। उसने एक ओर ख्वाहिश, उसूल, अदब, गिरवी, ज़लसे, तमन्ना, रहबर, राहजनी, अवाम तथा शान जैसे उर्दू फारसी शब्दों का प्रयोग किया है तो केबल टी.वी.जैसे अंग्रेजी शब्द भी इनमें उपलब्ध हैं। कुछ शब्दों को कवि ने देशज शैली में भी प्रयुक्त किया है, यथा मन्तरी, डूबन आदि। मिथकों का प्रयोग अत्यंत शानदार है। द्रौपदी, कृष्ण, देवकी, केशव आदि का प्रयोग करके कवि ने अभिव्यक्ति को दमदार बनाया है परन्तु यथार्थ की ऐसी दमदार अभिव्यक्ति वाले कुछ दोहों में भी कहीं-कहीं संरचनात्मक त्रुटियाँ रह गयीं हैं, परन्तु ये दोष अपवाद स्वरूप हैं, अन्यथा ये दोहे निर्दोष हैं। हमारा विश्वास है कि ‘‘नागफनी के फूल’’ के ये दोहे साहित्य जगत में सम्मान पायेंगे।   

समीक्षक 
डॉ.रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ 
डी.लिट.
86, तिलकनगर, बाईपास रोड़,  फीरोजाबाद (उत्तर प्रदेश)-283203 

Monday, March 30, 2015

पतझड़ में मधुमास की तरह



लघुकथाकारों में कृष्णलता यादव एक चिरपरिचित नाम है और इसकी साक्षी हैं उनके द्वारा लिखी गई अनगिनत लघुकथाएं। हालिया प्रकाशित चौथा लघुकथा-संग्रह ‘पतझड़ में मधुमास’ में संकलित लघुकथाओं में आम जीवन से जुड़ा लगभग हर पक्ष अपनी विसंगतियों के साथ-साथ आशा व सकारात्मकता के साथ उपस्थित है। लेखिका में क्षणों को पकड़कर उसकी समीक्षा करनेवाली संवेदनशीलता है जो इन लघुकथाओं में स्पष्ट रूप से उभरती दिखती है। आधुनिकता ने हमारे जीवन और इसकी पद्धति को कहां तक प्रभावित कर डाला है, उसके सशक्त उदाहरण मिलते हैं, ‘पैकेज’, ‘हाइटेक’, ‘ग्लोबलाइजेशन’, ‘घेरे अपने-अपने’ और ‘ममता’ प्रभृति लघुकथाओं में। उदाहरण के लिए ‘आधुनिकता का रंग’ को ले सकते हैं जिसमें शराब पीकर सड़क पर बेसुध पड़े बेटे के बारे में जब हेड कांस्टेबल उसके पिता को फोन पर सूचित करता है तो पिता प्रत्युत्तर में कहता है—‘अजी साहब, यही उम्र है लाइफ को इंज्वाय करने की।’
बच्चों के प्रति संवेदनशीलता के साथ-साथ कृष्णलता महिलाओं और बुजुर्गों की मनःस्थिति पर सूक्ष्म पकड़ रखती हैं। ‘नेह का बंधन’, ‘सयानपत’, ‘बहिष्कार’, ‘समय का दस्तूर’, ‘सोच’, ‘कुशंका’, ‘यही सच है’, ‘अनमोल खजाना’, ‘कथनी’, ‘अमृतकण’, विश्वास-अविश्वास’, ‘पर-उपदेश’, ‘बुढ़ापे की लाज’ सरीखी लघुकथाएं वयोवृद्धों के मन का विभिन्न कोणों से पड़ताल करती हैं। ‘सोच’ की अंतिम पंक्तियां—‘बहन, तुम-सी भाग्यशाली कोई नहीं। तुम जी-जान से नब्बेसाला सास की सेवा करके, घर बैठी पुण्य कमा रही हो। क्या इससे बड़ा कोई तीर्थ हो सकता है?’ महिला की स्वस्थ चिंतनधारा को इंगित करती हैं। वहीं दूसरी ओर ‘कड़वा सच’ नारी-मन की एक स्वार्थपरक छवि को केंद्रित करने में सार्थक रही है। इसी तरह ‘आक्रोश‘ में शोषण के विरुद्ध महिलाओं का संगठन एक आदर्श विद्रोह के रूप में परिलक्षित हुआ है। समाज और परिवार से जुड़े प्रसंग संग्रह की संस्कारगत विशिष्टताएं हैं। बेटी-बेटे का फर्क की मानसिकता ‘कामकाजी का जन्म’, ‘बेटे का धन’ आदि में बखूबी हुआ है। संग्रह की कुछेक लघुकथाओं के थीम पर पहले भी कई लघुकथाएं लिखी जा चुकी हैं। उदाहरणार्थ ‘दिल के अरमां’ और ‘अपनी अपनी मदिरा’ थीम पर वरिष्ठ लघुकथाकार उम्दा लघुकथाएं दे चुके हैं। उनसे तुलना कर अपनी लेखनी क्षमता का लघुकथाकार स्वयं भलीभांति मूल्यांकन कर सकती हैं। बहरहाल लघुकथाओं में सपाटबयानी से बचने का जितना भी प्रयत्न किया जाएगा, रचना उतनी ही सार्थक व परिपक्व बनकर उभरेगी। एक ही थीम पर कुछ अलग-सी लिखी गई लघुकथा का असर कहीं अधिक होता है। और सब कुछ कहने के बजाय लघुकथा स्वयं कहे तो उसकी संप्रेषण-क्षमता कुछ अधिक बढ़ जाती है। संक्षेप में कहा जाय तो कृष्णलता की ये लघुकथाएं सचमुच पतझड़ में मधुमास की ही तरह हैं जो आश्वस्त करती हैं।
-रतन चंद ‘रत्नेश

0पुस्तक : पतझड़ में मधुमास 
0लेखिका : कृष्णलता यादव 
0प्रकाशक : अयन प्रकाशन, नई दिल्ली
 0पृष्ठ संख्या : 90 0मूल्य :  रुपये 220.
देनिक ट्रिब्यून से साभार 

Thursday, March 19, 2015

संस्कृति एवं साहित्य का शोधपरक दस्तावेज


क्या सभ्यता और संस्कृति एक दूसरे को प्रभावित करती हैं? सभ्यता और संस्कृति में क्या अन्तर है? संस्कृति एवं साहित्य के बीच कौन से अन्त:सूत्र हैं? लोकसंस्कृति एवं साहित्य में क्या अन्त:संबंध है? संस्कार एवं संस्कृति की मूल अवधारणा क्या है? संस्कृति एवं साहित्य के ऐसे ही अनेक बहुआयामी पक्षों का शोधपरक दस्तावेज है आलोच्य कृति 'संस्कृति एवं साहित्य : संबंधों के अन्त:सूत्रजिसमें फीरोजाबाद के प्रख्यात हिंदीसेवी रचनाकार डॉ.रामसनेहीलाल शर्मा 'यायावरने संबंधित सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संदर्भों का सूक्ष्म विवेचन किया है। गीत-गज़ल, दोहा-नवगीत एवं शोध के क्षेत्र में दर्जनभर पुस्तकों के रचियता एवं सांस्कृतिक व साहित्यिक पृष्ठभूमि के शोधलेखन के जाने-माने हस्ताक्षर यायावर जी ने इस कृति में आठ शोधपरक आलेखों को स्थान दिया है। जिनमें प्रथम दो आलेखों में उक्त अन्त:संबंधों एवं अन्त:सूत्रों की विस्तृत व्याख्या की गयी है।
            संस्कृति मर्मज्ञ डॉ.यायावर मानते हैं कि सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अभय, अस्तेय, आस्था, उपकार, कृतज्ञता, क्षमा, गरिमा, तितिक्षा, दया, दीप्ति, धृति, इंद्रिय-निग्रह, संयम, निष्कलुषता, शमन, परितोष, मुदिता, वीरता, शिष्टता, सदाचार आदि जितने भी मानव-मूल्य विकसित हुए हैं या धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का पुरुषार्थ चतुष्टय आदि सब कुछ संस्कृति की परिधि में आता है। वस्तुत: संस्कृति मानव जीवन को उदात्त, महान एवं श्रेष्ठ बनाने वाली साधना है।
इस कृति के प्रथम आलेख 'संस्कृति एवं साहित्य में जहाँ लेखक ने संस्कृति एवं तार्किक विवेचन बेहद सरलता से प्रस्तुत किया है, वहीं 'लोकसंस्कृति एवं साहित्यनामक आलेख में साहित्यिक-लोकसांस्कृतिक संबंधों की व्याख्या मूलतत्वों के साथ की गयी है। जिनमें लोकनृत्य, लोकगीत, लोकपर्व, लोकसंगीत, लोकगाथा, लोकाचार, लोकदेवता, लोकमानस को रेखांकित करते हुए संस्कृति मर्मज्ञ यायावर जी कहते हैं कि लोकसंस्कृति एक ऐसा अक्षय कोष है, जिसमें से जितना भी आहरण किया जाए कम नहीं होता। क्योंकि लोकसंस्कृति एक जीवंत, प्राणवान गतिशील सरिता है।
            'हिन्दी के सांस्कृतिक उपन्यास : एक विहंगावलोकन नामक आलेख में विद्वान लेखक ने प्रेरक उदाहरणों के साथ सांस्कृतिक-उपन्यासों में छिपे संबंधित बिंदुओं को उजागर किया है। इस आलेख में जिन उपन्यासों की चर्चा की गयी है, उनमें चित्रलेखा (भगवतीचरण वर्मा), वयं रक्षाम: (आचार्य चतुरसेन शास्त्री), 'दिवोदास, सिंह सेनापति जय यौधेय (राहुल सांस्कृत्यायन), महायात्रा-गाथा (रांगेय राघव), उखड़े हुए लोग (राजेन्द्र यादव), सुबह-दोपहर-शाम (कमलेश्वर), जिंदगीनामा (कृष्णा सोबती) आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।
            'आचार्य चतुरसेन शास्त्री के उपन्यासों में अलौकिक तत्व नामक आलेख में लेखक ने करीब चार दर्जन उपन्यासों के रचनाकार आचार्य चतुरसेन शास्त्री के उपन्यासों की विस्तृत चर्चा करते हुए इनमें छिपे अलौकिक तत्वों को प्रामाणिकता के साथ रेखांकित किया है। इसी प्रकार ब्रज संस्कृति पर आधारित दो आलेख प्रभावी बन पड़े हैं। जिनमें क्रमश: भारतीय चेतना के योगदान व ब्रज लोककथाओं की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि मुखरित हुई है। 'हिन्दू राष्ट्रवाद का व्यावहारिक रूप नामक अंतिम आलेख में डॉ.यायावर ने भारतीय राष्ट्रवाद के सांस्कृतिक स्वरूप को राष्ट्रीयता का पयार्य बताया है।
            मीनाक्षी प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस शोधपरक दस्तावेजी कृति में सभी आलेखों के संदर्भ दिए गए हैं, जिससे इस साधना के महत्व को सहज ही समझा जा सकता है। एक सौ बीस पृष्ठों वाली इस पुस्तक की कीमत डेढ़ सौ रुपये उचित है। पुस्तक की छपाई सुन्दर है तथा आवरण आकर्षक है। यह शोध-पुस्तक साहित्य एवं संस्कृति के उपासकों एवं शोधार्थियों के लिए मील का पत्थर साबित होगी- ऐसी आशा है।             

-सत्यवीर 'नाहडिय़ा

भावों की जगमग : रास्ता तय करते-करते

भावाभिव्यक्ति के अनेक साधन; जिनमें कविता भी एक है। जब-जब कोई घटना मन से कुछ कह जाती है तो बहुमुखी भावनाओं का प्रबल प्रवाह रोके नहीं रुकता। शब्दों के साँचे में ढल कर वह फूट पड़ता है-वेगवती धारा के मानिंद। कवि के मन कुछ और है, जगती के कुछ और। 'कुछ और के मध्य का यह फासला जितना अधिक होता है रचना उतनी ही तीव्र वेग से फलांगती है विसंगतियों के पाषाण-सुसंगति स्थापित करने के ईमानदार प्रयास में। अच्छी रचना वही है जो पाठक को चकित ही नहीं चिंतित भी करे और यही रचनाकार का पुरस्कार भी है। 'रास्ता तय करते-करते लघुकथाकार व कवि डॉ.रूप देवगुण की 123 अति लघु कविताओं का संग्रह है। इन कविताओं को सात खण्डों में विभाजित किया गया है। कविताओं की संक्षिप्तता के विषय में कवि का मानना है कि समयाभाव के कारण लघुकथाएं व लघुकविताएं पाठक के अधिक निकट हैं। अतुकांत शैली में लिखी इन कविताओं की भाषा अलंकारिकता के बोझ से मुक्त है। उनमें चित्रात्मकता, सम्प्रेषणीयता, सांकेतिकता के गुण विद्यमान हैं। कविताओं का कलेवर जितना संक्षिप्त है, भाव जगत उतना ही विस्तार लिए है। 'बिन न्हाए/नहा लें अंदर तकÓ कवि के व्यापक दृष्टिकोण का परिचायक है। इन कविताओं में कवि कहीं प्रकृति का चितेरा बनकर प्रस्तुत हुआ है। कहीं यथार्थ के धरातल पर आ खड़ा हुआ तो कहीं आदर्श का चंदन घिस रहा है। संग्रह का मुखपृष्ठ शीर्षक से मेल खाता हुआ तथा आकर्षक बन पड़ा है। कवि का समन्वयवादी दृष्टिकोण टेर लगाता है कि ऊंचाइयों को निहारते हुए निचाइयों की अनदेखी ना करें-और देख लें। कभी नीचे की खाई को/तो कभी सामने/पहाड़ की ऊंचाई को। कविताओं की प्रतीकात्मकता देखते ही बनती है-आंसू ढलकने लगे थे/उन बादलों की तरह/जिनमें न बिजली होती/और न किसी तरह का शोर। 'नए अध्याय का श्रीगणेश गागर में सागर भरते हुए आत्मविश्वास की सीख दे रही है। कवि को प्रकृति से अगाध प्रेम है। यही कारण है, बादल, समुद्र, सीपी, बरसात आदि स्वाभाविक रूप से कविताओं के विषय बने हैं। कवि की पीड़ा है-समुद्र के प्रति उपेक्षा क्यों? हम उसे नाराज़ क्यों कर देते हैं? सब सो रहे हैं/समुद्र दर्द से करवटें ले रहा है/उसका दर्द समझना है। कौन समझेगा यह दर्द? ज्वलंत प्रश्न है यह हम सबके लिए। उत्तर पाने के लिए हम चाहे आत्ममंथन करें या परिवेश को खंगालें।
            परिवर्तन प्रकृति का नियम है। इस नियम का अनुकरण करते हुए रूढि़वादिता को त्यागने की सिफारिश की गई है-और हम हैं कि/वर्षों तक ओढ़ते रहते है/पुराने लबादों को। 'संवाद की स्थिति तक कविता बहुत कुछ सोचने को विवश करती है। बरगद के प्रतीक से बुजुर्गों की उपेक्षा पर चिंता व्यक्त की गई है। इसकी जवाबदेह है वह पीढ़ी जो अति-आधुनिकता के पाश में बुरी तरह जकड़ी हुई है। स्वयं को परहित के लिए होम करने वालों के क्या कहने! कविता की यह पंक्ति अतिप्रेरक बन पड़ी है-बादल कहीं गया नहीं/गया क्या/वह रहा ही नहीं। संसार में आया है सो जाएगा ज़रूर। हंसते-हंसते जाने की बात ही कुछ और है, तो क्यों न सुगनचंद मुक्तेश की तरह विपरीत स्थिति में भी रचनारत रह कर खुशी-खुशी विदा लें।
            आशा है, साहित्य जगत् में काव्यसंग्रह का स्वागत किया जाएगा।

-कृष्णलता यादव

एक प्रेरणादायक बाल-कृति : मुस्काता चल

कृष्णलता यादव एक सुपरिचित कथा लेखिका हैं। अब तक इनके तीन लघुकथा संग्रह-अमूल्य धरोहर, भोर होने तक तथा चेतना के रंग के अतिरिक्त एक बाल कथा संग्रह-दोस्ती की मिसाल तथा एक बाल कविता संग्रह-मीठे बोल भी प्रकाशित हो चुके हैं। समय-समय पर इनकी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत होती रही हैं। मुस्काता चल कृष्णलता यादव का नवीनतम बाल कविता संग्रह है।
            मुस्काता चल की सभी 26 बाल कविताओं में विषय वैविध्य के अनुसार निम्रप्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है-प्रेरणाप्रद, शिक्षाप्रद, जीव-जन्तुओं संबंधी, रिश्ते-नातों पर आधारित एवं पर्व-त्यौहारों की बाल कविताएँ।
            प्रेरणाप्रद कविताओं में मुस्काता चल, हुनर बच्चों के, करवट बदली, सपनों का उपहार दें, नूतन पथ का सेनानी, सीमा के सिपाही तथा चींटी से सीख प्रमुख हैं। सपनों का उपहार दें की पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-
            हर बालक बाला के मुख पर
            गौरवमयी मुस्कान है।
            आशा की यह किरण सुनहरी
            धीर-वीर बलवान है।।
            शिक्षाप्रद कविताओं के शीर्षक हैं-कमाना सीख, सबकी छिपी भलाई, बनूं नहीं हलवाई, सबकी अपनी बोली, बचत का पाठ, छतरी, सूरज दादा, मिट्टी की महिमा तथा खूब सुहाना कल। छतरी की पंक्तियाँ देखिए-
            धूप चढ़ी तब तानी छतरी।
            कब करती मनमानी छतरी।।
            तपन सहे औरों की खातिर।
            देखो कितनी दानी छतरी।।
            कुछ कविताओं में जीव-जन्तुओं को माध्यम बनाया गया है। जिनके उदाहरण हैं-मच्छर, हठीला तोता, मधुमक्खी, ओ रे कागा, आ री चिडिय़ा। ओ रे कागा की पंक्तियाँ-
            ओ रे कागा मुझे बताओ
            क्यों है तेरी कड़वी बोली?
            क्या तुमको अच्छी न लगती
            कभी-कभी की हँसी-ठिठोली।।
            नानी जी, कह दो मुझे कहानी, समझदारी, रिश्ते-नातों पर आधारित कविताएँ हैं। कह दो मुझे कहानी की कुछ पंक्तियाँ देखिए-
            नानी जी ओ नानी जी,
            कह दो मुझे कहानी जी।
            राजा की या रानी की,
            धूप, हवा और पानी की।।
            पर्व-त्यौहारों के अन्तर्गत होली पर एक कविता है-होली आई।
            इसी प्रकार संग्रह में कुछ कविताएँ कथात्मक शैली में हैं। कविताओं की भाषा सरल, सहज एवं बोधगम्य है। बच्चे खेल-खेल में इन्हें कण्ठस्थ कर सकते हैं। चित्रांकन से कृति की सार्थकता बढ़ गई है।

- घमंडीलाल अग्रवाल