Monday, April 6, 2015

कबीर की शैली में धारदार रचनाएं

रघुविन्द्र यादव के दो दोहा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं तथा मुझ में संत कबीर’ उनका प्रथम कुंडलिया छंद संग्रह है। कुंडलिया एक मुश्किल छंद है और इसे साधना सहज नहीं है। इसे तो वही साध सकता है जिसे खांडे की धार पर नंगे पांव चलने में महारत हासिल हो। वे अपने प्रथम कुंडलिया छंद संग्रहमुझमें संत कबीर’ में एक छंदसिद्ध कवि के रूप में सामने आये हैं। हिंदी कविता में कुंडलियां छंद कवि गिरधर के नाम से जाना जाता हैलेकिन रघुविन्द्र यादव ने अपना संबंध कबीर से जोड़ा है और इसकी वजह भी अब हम कवि से ही जानें :-मरने मैं देता नहींअपना कभी ज़मीर।इसीलिए ज़िंन्दा रहामुझमें संत कबीर।।मुझमें संत कबीर बैठकर दोहे रचता।कहता सच्ची बातकलम से झूठ न बचता।(पृ.55)इस कृति की राह से गुजरने पर पता चलता है कि कवि का रास्ता वाकई कबीर का है। उनकी कविता ऐन मुहाने पर चोट करती है। देखें यह पंक्तियां जो पाठक की चेतना पर चोट करती है

शोषक-शोषित रह गईदुनिया में दो जात।मूरख जन ही अब करेंवर्ण भेद की बात।।वर्ण-भेद की बात,समझ है जिनकी छोटी।जाति-धर्म की आड़बिठाते शातिर गोटी।(पृष्ठ 68)इन दिनों जब गंगा शुद्धीकरण का बहुत शोर बरपा हैतब ऐसे में यह पंक्तियां बहुत वाजिब सवाल उठाती हैंगंदा नाला बन गईनदियों की सिरमौर।गंगाजी को चाहिएएक भगीरथ और।।(पृ. 19)धर्म के पाखंड को बेपर्दा करती कवि की यह पंक्तियां उसकी पक्षधरता के साक्ष्य के तौर पर देखी जा सकती हैंगाड़ीबंगलेचेलियांअरबों की जागीर।ये सब जिसके पास हैंवे ही आज फकीर।।उत्तर पूंजीवाद ने कैसे उस नारी’ को जो कभी नारायणी’ थी उत्पाद’ बनाकर बाजार में उतार दिया और उसे इस साजिश का पता ही नहीं चलाइसी सत्य को उकेरती यह पंक्तियां देखेंनारी थी नारायणीबनी आज उत्पाद।लाज-शर्म को त्यागकरकरे अर्थ को याद।।(पृ. 66)और यह पंक्तियां सीधे सत्ता की तरफ एक सवाल उछालती हैं
अब तक भी है गांव में कष्टों की भरमार।साठ साल में आपनेक्या बदला सरकार।।(पृ.59)समग्रत: रघुविन्द्र यादव का प्रथम कुंडलियां छंद संग्रह इसलिए अपनी उपस्थिति अलग से दर्ज करता है क्योंकि इस संग्रह की कुंडलियों मेंकबीर जैसा अक्खड़पन और सच्चाई मौजूद है। रघुविन्द्र के कबीर की जमात का कवि होने का इससे बड़ा साक्ष्य और क्या हो सकता है?


सुभाष रस्तोगी

0पुस्तक : मुझमें संत कबीर 
0लेखक : रघुविन्द्र यादव 
0प्रकाशक अयन प्रकाशननयी दिल्ली-30 
0पृष्ठ संख्या : 79 0मूल्य :रुपये 180.
दैनिक ट्रिब्यून से साभार  


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