शोषक-शोषित रह गई, दुनिया में दो जात।मूरख जन ही अब करें, वर्ण भेद की बात।।वर्ण-भेद की बात,समझ है जिनकी छोटी।जाति-धर्म की आड़, बिठाते शातिर गोटी।(पृष्ठ 68)इन दिनों जब गंगा शुद्धीकरण का बहुत शोर बरपा है, तब ऐसे में यह पंक्तियां बहुत वाजिब सवाल उठाती हैं—गंदा नाला बन गई, नदियों की सिरमौर।गंगाजी को चाहिए, एक भगीरथ और।।(पृ. 19)धर्म के पाखंड को बेपर्दा करती कवि की यह पंक्तियां उसकी पक्षधरता के साक्ष्य के तौर पर देखी जा सकती हैं—गाड़ी, बंगले, चेलियां, अरबों की जागीर।ये सब जिसके पास हैं, वे ही आज फकीर।।उत्तर पूंजीवाद ने कैसे उस ‘नारी’ को जो कभी ‘नारायणी’ थी ‘उत्पाद’ बनाकर बाजार में उतार दिया और उसे इस साजिश का पता ही नहीं चला, इसी सत्य को उकेरती यह पंक्तियां देखें—नारी थी नारायणी, बनी आज उत्पाद।लाज-शर्म को त्यागकर, करे अर्थ को याद।।(पृ. 66)और यह पंक्तियां सीधे सत्ता की तरफ एक सवाल उछालती हैं—
अब तक भी है गांव में कष्टों की भरमार।साठ साल में आपने, क्या बदला सरकार।।(पृ.59)समग्रत: रघुविन्द्र यादव का प्रथम कुंडलियां छंद संग्रह इसलिए अपनी उपस्थिति अलग से दर्ज करता है क्योंकि इस संग्रह की कुंडलियों में कबीर जैसा अक्खड़पन और सच्चाई मौजूद है। रघुविन्द्र के कबीर की जमात का कवि होने का इससे बड़ा साक्ष्य और क्या हो सकता है?
सुभाष रस्तोगी
0पुस्तक : मुझमें संत कबीर
0लेखक : रघुविन्द्र यादव
0प्रकाशक : अयन प्रकाशन, नयी दिल्ली-30
0पृष्ठ संख्या : 79 0मूल्य :रुपये 180.
दैनिक ट्रिब्यून से साभार

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