क्या सभ्यता और
संस्कृति एक दूसरे को प्रभावित करती हैं? सभ्यता और संस्कृति में क्या अन्तर
है? संस्कृति एवं साहित्य के बीच कौन से अन्त:सूत्र हैं? लोकसंस्कृति एवं साहित्य में क्या अन्त:संबंध है? संस्कार एवं संस्कृति की मूल अवधारणा क्या है? संस्कृति एवं साहित्य
के ऐसे ही अनेक बहुआयामी पक्षों का शोधपरक दस्तावेज है आलोच्य कृति 'संस्कृति एवं साहित्य : संबंधों के अन्त:सूत्र’ जिसमें फीरोजाबाद के
प्रख्यात हिंदीसेवी रचनाकार डॉ.रामसनेहीलाल शर्मा 'यायावर’ ने संबंधित सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संदर्भों का सूक्ष्म विवेचन किया है।
गीत-गज़ल, दोहा-नवगीत एवं शोध के क्षेत्र में दर्जनभर पुस्तकों के रचियता एवं सांस्कृतिक
व साहित्यिक पृष्ठभूमि के शोधलेखन के जाने-माने हस्ताक्षर यायावर जी ने इस कृति
में आठ शोधपरक आलेखों को स्थान दिया है। जिनमें प्रथम दो आलेखों में उक्त
अन्त:संबंधों एवं अन्त:सूत्रों की विस्तृत व्याख्या की गयी है।
संस्कृति मर्मज्ञ डॉ.यायावर मानते हैं कि सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अभय, अस्तेय, आस्था, उपकार, कृतज्ञता, क्षमा, गरिमा, तितिक्षा, दया, दीप्ति, धृति, इंद्रिय-निग्रह, संयम, निष्कलुषता, शमन, परितोष, मुदिता, वीरता, शिष्टता, सदाचार आदि जितने भी मानव-मूल्य विकसित हुए हैं या धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का पुरुषार्थ चतुष्टय आदि सब कुछ संस्कृति की परिधि में आता है।
वस्तुत: संस्कृति मानव जीवन को उदात्त, महान एवं श्रेष्ठ बनाने वाली साधना
है।
इस कृति के
प्रथम आलेख 'संस्कृति एवं साहित्य’ में जहाँ लेखक ने संस्कृति एवं
तार्किक विवेचन बेहद सरलता से प्रस्तुत किया है, वहीं 'लोकसंस्कृति एवं साहित्य’ नामक आलेख में साहित्यिक-लोकसांस्कृतिक
संबंधों की व्याख्या मूलतत्वों के साथ की गयी है। जिनमें लोकनृत्य, लोकगीत, लोकपर्व, लोकसंगीत, लोकगाथा, लोकाचार, लोकदेवता, लोकमानस को रेखांकित करते हुए संस्कृति मर्मज्ञ यायावर जी कहते हैं कि
लोकसंस्कृति एक ऐसा अक्षय कोष है, जिसमें से जितना भी आहरण किया जाए कम
नहीं होता। क्योंकि लोकसंस्कृति एक जीवंत, प्राणवान गतिशील सरिता है।
'हिन्दी के सांस्कृतिक उपन्यास : एक विहंगावलोकन’ नामक आलेख में विद्वान लेखक ने प्रेरक उदाहरणों के साथ सांस्कृतिक-उपन्यासों
में छिपे संबंधित बिंदुओं को उजागर किया है। इस आलेख में जिन उपन्यासों की चर्चा
की गयी है, उनमें चित्रलेखा (भगवतीचरण वर्मा), वयं रक्षाम: (आचार्य चतुरसेन
शास्त्री), 'दिवोदास’,
सिंह सेनापति जय यौधेय (राहुल सांस्कृत्यायन), महायात्रा-गाथा (रांगेय राघव), उखड़े हुए लोग (राजेन्द्र यादव), सुबह-दोपहर-शाम (कमलेश्वर), जिंदगीनामा (कृष्णा सोबती) आदि के नाम
उल्लेखनीय हैं।
'आचार्य चतुरसेन शास्त्री के उपन्यासों में अलौकिक तत्व’ नामक आलेख में लेखक ने करीब चार दर्जन उपन्यासों के रचनाकार आचार्य चतुरसेन
शास्त्री के उपन्यासों की विस्तृत चर्चा करते हुए इनमें छिपे अलौकिक तत्वों को
प्रामाणिकता के साथ रेखांकित किया है। इसी प्रकार ब्रज संस्कृति पर आधारित दो आलेख
प्रभावी बन पड़े हैं। जिनमें क्रमश: भारतीय चेतना के योगदान व ब्रज लोककथाओं की
सांस्कृतिक पृष्ठभूमि मुखरित हुई है। 'हिन्दू राष्ट्रवाद का व्यावहारिक
रूप’ नामक अंतिम आलेख में डॉ.यायावर ने भारतीय राष्ट्रवाद के सांस्कृतिक स्वरूप को
राष्ट्रीयता का पयार्य बताया है।
मीनाक्षी प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस शोधपरक दस्तावेजी कृति में सभी आलेखों के संदर्भ
दिए गए हैं, जिससे इस साधना के महत्व को सहज ही समझा जा सकता है। एक सौ बीस पृष्ठों वाली
इस पुस्तक की कीमत डेढ़ सौ रुपये उचित है। पुस्तक की छपाई सुन्दर है तथा आवरण
आकर्षक है। यह शोध-पुस्तक साहित्य एवं संस्कृति के उपासकों एवं शोधार्थियों के लिए
मील का पत्थर साबित होगी- ऐसी आशा है।
-सत्यवीर 'नाहडिय़ा’
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