Thursday, March 19, 2015

एक प्रेरणादायक बाल-कृति : मुस्काता चल

कृष्णलता यादव एक सुपरिचित कथा लेखिका हैं। अब तक इनके तीन लघुकथा संग्रह-अमूल्य धरोहर, भोर होने तक तथा चेतना के रंग के अतिरिक्त एक बाल कथा संग्रह-दोस्ती की मिसाल तथा एक बाल कविता संग्रह-मीठे बोल भी प्रकाशित हो चुके हैं। समय-समय पर इनकी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत होती रही हैं। मुस्काता चल कृष्णलता यादव का नवीनतम बाल कविता संग्रह है।
            मुस्काता चल की सभी 26 बाल कविताओं में विषय वैविध्य के अनुसार निम्रप्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है-प्रेरणाप्रद, शिक्षाप्रद, जीव-जन्तुओं संबंधी, रिश्ते-नातों पर आधारित एवं पर्व-त्यौहारों की बाल कविताएँ।
            प्रेरणाप्रद कविताओं में मुस्काता चल, हुनर बच्चों के, करवट बदली, सपनों का उपहार दें, नूतन पथ का सेनानी, सीमा के सिपाही तथा चींटी से सीख प्रमुख हैं। सपनों का उपहार दें की पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-
            हर बालक बाला के मुख पर
            गौरवमयी मुस्कान है।
            आशा की यह किरण सुनहरी
            धीर-वीर बलवान है।।
            शिक्षाप्रद कविताओं के शीर्षक हैं-कमाना सीख, सबकी छिपी भलाई, बनूं नहीं हलवाई, सबकी अपनी बोली, बचत का पाठ, छतरी, सूरज दादा, मिट्टी की महिमा तथा खूब सुहाना कल। छतरी की पंक्तियाँ देखिए-
            धूप चढ़ी तब तानी छतरी।
            कब करती मनमानी छतरी।।
            तपन सहे औरों की खातिर।
            देखो कितनी दानी छतरी।।
            कुछ कविताओं में जीव-जन्तुओं को माध्यम बनाया गया है। जिनके उदाहरण हैं-मच्छर, हठीला तोता, मधुमक्खी, ओ रे कागा, आ री चिडिय़ा। ओ रे कागा की पंक्तियाँ-
            ओ रे कागा मुझे बताओ
            क्यों है तेरी कड़वी बोली?
            क्या तुमको अच्छी न लगती
            कभी-कभी की हँसी-ठिठोली।।
            नानी जी, कह दो मुझे कहानी, समझदारी, रिश्ते-नातों पर आधारित कविताएँ हैं। कह दो मुझे कहानी की कुछ पंक्तियाँ देखिए-
            नानी जी ओ नानी जी,
            कह दो मुझे कहानी जी।
            राजा की या रानी की,
            धूप, हवा और पानी की।।
            पर्व-त्यौहारों के अन्तर्गत होली पर एक कविता है-होली आई।
            इसी प्रकार संग्रह में कुछ कविताएँ कथात्मक शैली में हैं। कविताओं की भाषा सरल, सहज एवं बोधगम्य है। बच्चे खेल-खेल में इन्हें कण्ठस्थ कर सकते हैं। चित्रांकन से कृति की सार्थकता बढ़ गई है।

- घमंडीलाल अग्रवाल

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