Thursday, March 19, 2015

भावों की जगमग : रास्ता तय करते-करते

भावाभिव्यक्ति के अनेक साधन; जिनमें कविता भी एक है। जब-जब कोई घटना मन से कुछ कह जाती है तो बहुमुखी भावनाओं का प्रबल प्रवाह रोके नहीं रुकता। शब्दों के साँचे में ढल कर वह फूट पड़ता है-वेगवती धारा के मानिंद। कवि के मन कुछ और है, जगती के कुछ और। 'कुछ और के मध्य का यह फासला जितना अधिक होता है रचना उतनी ही तीव्र वेग से फलांगती है विसंगतियों के पाषाण-सुसंगति स्थापित करने के ईमानदार प्रयास में। अच्छी रचना वही है जो पाठक को चकित ही नहीं चिंतित भी करे और यही रचनाकार का पुरस्कार भी है। 'रास्ता तय करते-करते लघुकथाकार व कवि डॉ.रूप देवगुण की 123 अति लघु कविताओं का संग्रह है। इन कविताओं को सात खण्डों में विभाजित किया गया है। कविताओं की संक्षिप्तता के विषय में कवि का मानना है कि समयाभाव के कारण लघुकथाएं व लघुकविताएं पाठक के अधिक निकट हैं। अतुकांत शैली में लिखी इन कविताओं की भाषा अलंकारिकता के बोझ से मुक्त है। उनमें चित्रात्मकता, सम्प्रेषणीयता, सांकेतिकता के गुण विद्यमान हैं। कविताओं का कलेवर जितना संक्षिप्त है, भाव जगत उतना ही विस्तार लिए है। 'बिन न्हाए/नहा लें अंदर तकÓ कवि के व्यापक दृष्टिकोण का परिचायक है। इन कविताओं में कवि कहीं प्रकृति का चितेरा बनकर प्रस्तुत हुआ है। कहीं यथार्थ के धरातल पर आ खड़ा हुआ तो कहीं आदर्श का चंदन घिस रहा है। संग्रह का मुखपृष्ठ शीर्षक से मेल खाता हुआ तथा आकर्षक बन पड़ा है। कवि का समन्वयवादी दृष्टिकोण टेर लगाता है कि ऊंचाइयों को निहारते हुए निचाइयों की अनदेखी ना करें-और देख लें। कभी नीचे की खाई को/तो कभी सामने/पहाड़ की ऊंचाई को। कविताओं की प्रतीकात्मकता देखते ही बनती है-आंसू ढलकने लगे थे/उन बादलों की तरह/जिनमें न बिजली होती/और न किसी तरह का शोर। 'नए अध्याय का श्रीगणेश गागर में सागर भरते हुए आत्मविश्वास की सीख दे रही है। कवि को प्रकृति से अगाध प्रेम है। यही कारण है, बादल, समुद्र, सीपी, बरसात आदि स्वाभाविक रूप से कविताओं के विषय बने हैं। कवि की पीड़ा है-समुद्र के प्रति उपेक्षा क्यों? हम उसे नाराज़ क्यों कर देते हैं? सब सो रहे हैं/समुद्र दर्द से करवटें ले रहा है/उसका दर्द समझना है। कौन समझेगा यह दर्द? ज्वलंत प्रश्न है यह हम सबके लिए। उत्तर पाने के लिए हम चाहे आत्ममंथन करें या परिवेश को खंगालें।
            परिवर्तन प्रकृति का नियम है। इस नियम का अनुकरण करते हुए रूढि़वादिता को त्यागने की सिफारिश की गई है-और हम हैं कि/वर्षों तक ओढ़ते रहते है/पुराने लबादों को। 'संवाद की स्थिति तक कविता बहुत कुछ सोचने को विवश करती है। बरगद के प्रतीक से बुजुर्गों की उपेक्षा पर चिंता व्यक्त की गई है। इसकी जवाबदेह है वह पीढ़ी जो अति-आधुनिकता के पाश में बुरी तरह जकड़ी हुई है। स्वयं को परहित के लिए होम करने वालों के क्या कहने! कविता की यह पंक्ति अतिप्रेरक बन पड़ी है-बादल कहीं गया नहीं/गया क्या/वह रहा ही नहीं। संसार में आया है सो जाएगा ज़रूर। हंसते-हंसते जाने की बात ही कुछ और है, तो क्यों न सुगनचंद मुक्तेश की तरह विपरीत स्थिति में भी रचनारत रह कर खुशी-खुशी विदा लें।
            आशा है, साहित्य जगत् में काव्यसंग्रह का स्वागत किया जाएगा।

-कृष्णलता यादव

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