Monday, April 6, 2015

परहित की पगडंडियां तलाशते दोहे

विचार विधाओं में बंधकर कदापि नहीं रहा करते हैं। कई विधाओं में एक साथ इसी बात को पुख्ता करते हुए छह लघुकथाबालकविता और बालकथा संग्रहों के पश्चात कृष्णलता यादव की सातवीं कृति मन में खिला वसंत’ (दोहा-संग्रह) हाल ही में प्रकाशित हुई है।समीक्ष्य कृति मन में खिला वसंत’ में 666 विविधवर्णी दोहे संकलित हैं जो आठ उपशीर्षकों के अंतर्गत विभाजित किए गए हैंकामनापर्यावरणआपदादीवालीहोलीराजनीतिनीति और विविध। कामना’ के अंतर्गत कवयित्री ने परनिंदाआडम्बरजाति-पाति के बंधनों व दुर्भाव को बिसराकर जनकल्याण की भावना को प्रमुखता देते हुए मां शारदे से कामना की है। वह कहती हैं :-सुनो अरज मां शारदेदो अपना आशीष। उत्तम होवे भावनाघटे जगत् की टीस॥ वास्तव में आज के दौर की सर्वोपरि चिन्ता हैदूषित पर्यावरण। पर्यावरण का दूषित होना सम्पूर्ण मानव-जाति के लिए खतरे की घंटी है। दूषित पर्यावरण पेड़-पौधोंजीव-जंतुओंनदियोंधरतीपहाड़ोंहवा आदि सभी के लिए अहितकर है। तभी तो कवयित्री चीत्कार कर उठती हैं :-हरियाली छिटकी हुईसूने हैं मैदान। कहीं वाह’ का दौर हैकहीं आह’ के गान॥ किसी भी प्रकार की आपदा’ जीवन को नष्ट करती है। इसकी पृष्ठभूमि में मानव का बड़ा हाथ है। कवयित्री की चिन्ता साफ दृष्टिï गोचार होती है:-भोर हुई निरभागिनीखुशी रही कब शेष।क्रूर काल का डाकियाकहे शोक-संदेश॥ ‘दीवाली’ उजियारों का पर्व है जो अंधकार पर प्रकाश की विजय का घोतक भी है। देखिए :-ज्यों-ज्यों जलती जा रहीनवदीपों की पांत।छोटी त्यों-त्यों हो रहीअंधियारे की आंत॥मस्ती का वाहक त्योहार है—’होली। यह बुरे भावों को जलाकर राख कर डालता है और हर दिशा में बस मिलन का बोलबाला दिखता है। फागुनी हवाओं में भी रंग-अबीर तैरने लगता है। एक उदाहरण :-होली पर अंटने लगे,भेदभाव के कूप।राजा हो या रंक होलगें सभी समरूप॥इक्कीसवीं शताब्दी में राजनीति’ से नीति $गायब हो गयी हैरह गया है सिर्फ राज। विकृत राजनीति ने लोकतंत्र का रूप खूब बिगाड़ दिया है। बेचैन नर-नारी यहां-वहां मारे-मारे फिरते हैं तथा स्वतंत्र होकर भी परतंत्र लगते हैं। भ्रष्टाचारमहंगाईकालाधनरिश्वतचोरबाज़ारीबलात्कारलूटनारेआश्वासनचाटुकारितास्वार्थपरताघोटाले आदि इसी घृणित राजनीति के अनेकानेक चेहरे हैं।पांवों में नित चुभ रहेराजनीति के शूल। ‘राज’ राज होकर रहागया नीतियां भूल॥ ‘नीतिमानव को प्रीति की रीति सिखाती हुई चलती है जबकि अनीति गहरे गड्ढïे में धकेलती है। चालाकीबदनीयतकटु-वाणीकाम-क्रोधईष्र्या-द्वेषपरनिन्दाअज्ञानतानिठल्लापनअहंकारझूठदुष्टतामोह आदि को त्यागकर खुशबू की डगर पर पांव बढ़ाना ही समझदारी का काम है। प्यारसहयोगमित्रताभाईचाराअपनापनसद्भावनाविश्वाससाहसउत्तम उधम, गुणीजनों का साथ सही दिशा का निर्धारण कर लक्ष्य-प्राप्ति में सहायक बनते हैं। देखिए :-राहों में कांटे मिलेमंजि़ल भी थी दूर। कांटे बदले फूल मेंसाहस था भरपूर॥ कवयित्री कृष्णलता यादव ने विविध’ उपशीर्षक के अंतर्गत विभिन्न भावों से ओतप्रोत दोहे रखे हैं जो जीने की कला सिखाते हैंभटके हुए इन्सान को सचेत करते हैंबिगड़ी व्यवस्था पर चोट मारते हैंसुलह की वजह बांटते हैंधरा को स्वर्ग बनाने की कामना रखते हैंममता की छांव परोसते हैं और मानवता को दानवता के खूनी पंजों से मुक्त कराने का दम भरते हैं। उदाहरण दृष्टव्य है :-मानवता को थामिएहोने लगी अचेत।फिर ना कहना बावरेचिडिय़ा चुग गई खेत॥ अलग-अलग रंगों से पाठकों को रूबरू करवाते ये दोहे कथ्य और शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्ट बन गए हैं। नये-नये बिम्ब एवं प्रतीक इनके प्राण हैं। इनकी सरलसहज एवं रोचक भाषा-शैली है। लोकोक्तियों एवं मुहावरों का प्रयोग सलीके से हुआ है। एक दोहे (पृष्ठ-21) की पुनरावृत्ति (पृष्ठ-64) शायद भूलवश हो गयी है। कुछेक शब्दों का तुक असंगत लगता है। कुल मिलाकर परिवेशगत विसंगतियों का पर्दाफाश करते हुए सभी दोहे परहित की पगडंडियां तलाशते नज़र आते हैं।

                                                   घमंडीलाल अग्रवाल
०पुस्तक : मन में खिला वसंत ०कवयित्री : कृष्णलता यादव ०प्रकाशक : अयन प्रकाशन, 1/20, महरौलीनयी दिल्ली-110030 ०प्रथम संस्करण : 2012 ०पृष्ठ संख्या : 96 ०मूल्य : रुपये 150/-.
देनिक ट्रिब्यून से साभार 

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