विचार विधाओं में बंधकर कदापि नहीं रहा करते हैं। कई विधाओं में एक साथ इसी बात को पुख्ता करते हुए छह लघुकथा, बालकविता और बालकथा संग्रहों के पश्चात कृष्णलता यादव की सातवीं कृति ‘मन में खिला वसंत’ (दोहा-संग्रह) हाल ही में प्रकाशित हुई है।समीक्ष्य कृति ‘मन में खिला वसंत’ में 666 विविधवर्णी दोहे संकलित हैं जो आठ उपशीर्षकों के अंतर्गत विभाजित किए गए हैं—कामना, पर्यावरण, आपदा, दीवाली, होली, राजनीति, नीति और विविध। ‘कामना’ के अंतर्गत कवयित्री ने परनिंदा, आडम्बर, जाति-पाति के बंधनों व दुर्भाव को बिसराकर जनकल्याण की भावना को प्रमुखता देते हुए मां शारदे से कामना की है। वह कहती हैं :-सुनो अरज मां शारदे, दो अपना आशीष। उत्तम होवे भावना, घटे जगत् की टीस॥ वास्तव में आज के दौर की सर्वोपरि चिन्ता है—दूषित पर्यावरण। पर्यावरण का दूषित होना सम्पूर्ण मानव-जाति के लिए खतरे की घंटी है। दूषित पर्यावरण पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं, नदियों, धरती, पहाड़ों, हवा आदि सभी के लिए अहितकर है। तभी तो कवयित्री चीत्कार कर उठती हैं :-हरियाली छिटकी हुई, सूने हैं मैदान। कहीं ‘वाह’ का दौर है, कहीं ‘आह’ के गान॥ किसी भी प्रकार की ‘आपदा’ जीवन को नष्ट करती है। इसकी पृष्ठभूमि में मानव का बड़ा हाथ है। कवयित्री की चिन्ता साफ दृष्टिï गोचार होती है:-भोर हुई निरभागिनी, खुशी रही कब शेष।क्रूर काल का डाकिया, कहे शोक-संदेश॥ ‘दीवाली’ उजियारों का पर्व है जो अंधकार पर प्रकाश की विजय का घोतक भी है। देखिए :-ज्यों-ज्यों जलती जा रही, नवदीपों की पांत।छोटी त्यों-त्यों हो रही, अंधियारे की आंत॥मस्ती का वाहक त्योहार है—’होली’। यह बुरे भावों को जलाकर राख कर डालता है और हर दिशा में बस मिलन का बोलबाला दिखता है। फागुनी हवाओं में भी रंग-अबीर तैरने लगता है। एक उदाहरण :-होली पर अंटने लगे,भेदभाव के कूप।राजा हो या रंक हो, लगें सभी समरूप॥इक्कीसवीं शताब्दी में ‘राजनीति’ से नीति $गायब हो गयी है, रह गया है सिर्फ राज। विकृत राजनीति ने लोकतंत्र का रूप खूब बिगाड़ दिया है। बेचैन नर-नारी यहां-वहां मारे-मारे फिरते हैं तथा स्वतंत्र होकर भी परतंत्र लगते हैं। भ्रष्टाचार, महंगाई, कालाधन, रिश्वत, चोरबाज़ारी, बलात्कार, लूट, नारे, आश्वासन, चाटुकारिता, स्वार्थपरता, घोटाले आदि इसी घृणित राजनीति के अनेकानेक चेहरे हैं।पांवों में नित चुभ रहे, राजनीति के शूल। ‘राज’ राज होकर रहा, गया नीतियां भूल॥ ‘नीति’मानव को प्रीति की रीति सिखाती हुई चलती है जबकि अनीति गहरे गड्ढïे में धकेलती है। चालाकी, बदनीयत, कटु-वाणी, काम-क्रोध, ईष्र्या-द्वेष, परनिन्दा, अज्ञानता, निठल्लापन, अहंकार, झूठ, दुष्टता, मोह आदि को त्यागकर खुशबू की डगर पर पांव बढ़ाना ही समझदारी का काम है। प्यार, सहयोग, मित्रता, भाईचारा, अपनापन, सद्भावना, विश्वास, साहस, उत्तम उधम, गुणीजनों का साथ सही दिशा का निर्धारण कर लक्ष्य-प्राप्ति में सहायक बनते हैं। देखिए :-राहों में कांटे मिले, मंजि़ल भी थी दूर। कांटे बदले फूल में, साहस था भरपूर॥ कवयित्री कृष्णलता यादव ने ‘विविध’ उपशीर्षक के अंतर्गत विभिन्न भावों से ओतप्रोत दोहे रखे हैं जो जीने की कला सिखाते हैं, भटके हुए इन्सान को सचेत करते हैं, बिगड़ी व्यवस्था पर चोट मारते हैं, सुलह की वजह बांटते हैं, धरा को स्वर्ग बनाने की कामना रखते हैं, ममता की छांव परोसते हैं और मानवता को दानवता के खूनी पंजों से मुक्त कराने का दम भरते हैं। उदाहरण दृष्टव्य है :-मानवता को थामिए, होने लगी अचेत।फिर ना कहना बावरे, चिडिय़ा चुग गई खेत॥ अलग-अलग रंगों से पाठकों को रूबरू करवाते ये दोहे कथ्य और शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्ट बन गए हैं। नये-नये बिम्ब एवं प्रतीक इनके प्राण हैं। इनकी सरल, सहज एवं रोचक भाषा-शैली है। लोकोक्तियों एवं मुहावरों का प्रयोग सलीके से हुआ है। एक दोहे (पृष्ठ-21) की पुनरावृत्ति (पृष्ठ-64) शायद भूलवश हो गयी है। कुछेक शब्दों का तुक असंगत लगता है। कुल मिलाकर परिवेशगत विसंगतियों का पर्दाफाश करते हुए सभी दोहे परहित की पगडंडियां तलाशते नज़र आते हैं।
घमंडीलाल अग्रवाल
०पुस्तक : मन में खिला वसंत ०कवयित्री : कृष्णलता यादव ०प्रकाशक : अयन प्रकाशन, 1/20, महरौली, नयी दिल्ली-110030 ०प्रथम संस्करण : 2012 ०पृष्ठ संख्या : 96 ०मूल्य : रुपये 150/-.
देनिक ट्रिब्यून से साभार

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