Thursday, April 30, 2015

कुण्डलिया छंद


किसको दिखते हैं यहाँ, अपने अन्दर दोष|
कमी ढूंढकर गैर में, पाते सब संतोष||
पाते सब संतोष, मनुज की फितरत ऐसी |
अपनी जैसी सोच, सभी की दिखती वैसी|
कह यादव कविराय, बुरे सब दिखते जिसको|
उसकी घटिया सोच, भला वह कहता किसको?
                      2
किसे सुनाएँ द्रौपदी, अपने मन की पीर|
अब कौरव दरबार में, 'केशव' खींचें चीर||
'केशव' खींचें चीर, गई मर्यादा सारी|
करते हैं अपराध, आज तो भगवाधारी|
कह यादव कविराय, मनुज को सभ्य बनाएं|
यहाँ सभी विद्वान, बात हम किसे सुनाएँ||
-रघुविन्द्र यादव

Wednesday, April 29, 2015

हिम्मत को हथियार बनाले - ताराचन्द शर्मा "नादान"

पथिक, क्यूँ है व्यथित, गर राह है तेरी मुश्किल
न तज,  तू हौसला निज, पायेगा निश्चय मंजिल

पथ में  मिले  फूल  या  कांटे
सुख-दुःख तो  ईश्वर ने  बांटे
किसने अलग-अलग है  छांटें
चल, सबसे मिल साथ, सफर ना होगा बोझिल
पायेगा निश्चय मंजिल,   पायेगा निश्चय मंजिल

पग में  लाख  पड़े  हो छाले
हिम्मत को हथियार बनाले
मन  आशा का दीप जलाले
रुके,  पड़े जो थके,  बांह दे,  कर संग  शामिल
पायेगा  निश्चय मंजिल, पायेगा निश्चय मंजिल

जग में  कुछ ना लेकर आया
भला बुरा सब यहीं है पाया
फिर काहे की  है मोह माया
चले,  नही  कुछ  भले,  भलाई  संग में  ले चल
पायेगा निश्चय मंजिल,  पायेगा निश्चय मंजिल

ताराचन्द शर्मा "नादान"

Friday, April 24, 2015

दीपक तले अंधेरा- घमंडीलाल अग्रवाल

मशहूर पंडित दीर्घायुनंद के घर के बाहर बोर्ड लगा हुआ था-'यहाँ पर दीर्घायु प्राप्ति के लिए जाप किया जाता है। एक बार सेवा का मौका दें।Ó
वह सब कुछ समझते हुए भी समय लेकर एक दिन दीर्घायुनंद के पास गया। पंडित जी ने बताया-'आपकी राशि के अनुसार मंत्र की $कीमत बनती है ग्यारह हज़ार रुपये। कल मंत्रोच्चारण और पूजा-पाठ के अवसर पर यह राशि आप अदा कर दें।'
अगले दिन वह पंडित जी के घर पहुँचा। घर के बाहर जमा भीड़ ने बताया कि दीर्घायुनंद की 42 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई है।


-785/8, अशोक विहार, गुडग़ाँव

उत्कोच-दर्शन--डॉ.गार्गीशरण मिश्र 'मराल'

आप आश्चर्य करेंगे कि उत्कोच अर्थात घूस का भी कोई दर्शन हो सकता है! जी हाँ।
अपने इस दर्शन को समझाते हुए आर.टी.ओ. विवेकशरण जी कह रहे थे-'देखो भाई, मैं किसी का 
भी काम नहीं रोकता, उसे जल्दी से जल्दी निपटाता हूँ। क्योंकि काम में देर लगाना काम न करने के बराबर होता है। इतना ही नहीं फिर आपकी नीयत पर भी शक होने लगता है। इसलिए मैं काम शीघ्र निपटाता हूँ। फिर इस काम के बदले में उससे कोई कार्य-शुल्क की माँग भी नहीं करता। मेरी इस तत्परता से प्रसन्न होकर यदि कोई स्वेच्छा से कुछ दे देता है तो मैं उसे सहर्ष स्वीकार करता हूँ। ऐसा धन मेरी समझ में विकार रहित शुद्ध दूध की तरह होता है। यह उत्कोच का उत्तम प्रकार है। उत्कोच का मध्यम प्रकार वह होता है जब संकेत करने पर वह मिल जाये। उदाहरण के लिए जिसका काम मैंने तत्परता से कर दिया जब वह इसके बदले केवल धन्यवाद देकर जाने लगता तो मैं संकेत करता हूँ- 'मैंने आपका काम शीघ्र निपटा दिया। क्या इसके बदले मुझे पुरस्कार नहीं मिलना चाहिए?Ó इस संकेत से प्रेरित होकर यदि वह मुझे कुछ पत्र-पुष्प प्रदान कर देता है तो उसे मैं शुद्ध जल समझकर स्वीकार कर लेता हूँ। यह उत्कोच का मध्यम प्रकार है। उत्कोच का एक तीसरा प्रकार भी होता है, इसमें काम के बदले दाम पहले ही सौदेबाजी करके तय कर लिया जाता है। इसमें यह साफ कर दिया जाता है कि बिना दाम के काम नहीं होगा। इस शर्त के साथ काम करके जो उत्कोच प्राप्त किया जाता है, वह अधम कोटि का होता है। इसे मैं कभी स्वीकार नहीं करता। क्योंकि वह शुद्ध खून की तरह होता है और मैं खून चूसने वाला असुर अधिकारी नहीं हूँ।Ó 
इस वक्तव्य के साथ विवेकनारायण जी ने अपनी तकरीर समाप्त की।

-1436-बी, सरस्वती कॉलोनी, चेरीताल वार्ड, जबलपुर