Friday, April 24, 2015

उत्कोच-दर्शन--डॉ.गार्गीशरण मिश्र 'मराल'

आप आश्चर्य करेंगे कि उत्कोच अर्थात घूस का भी कोई दर्शन हो सकता है! जी हाँ।
अपने इस दर्शन को समझाते हुए आर.टी.ओ. विवेकशरण जी कह रहे थे-'देखो भाई, मैं किसी का 
भी काम नहीं रोकता, उसे जल्दी से जल्दी निपटाता हूँ। क्योंकि काम में देर लगाना काम न करने के बराबर होता है। इतना ही नहीं फिर आपकी नीयत पर भी शक होने लगता है। इसलिए मैं काम शीघ्र निपटाता हूँ। फिर इस काम के बदले में उससे कोई कार्य-शुल्क की माँग भी नहीं करता। मेरी इस तत्परता से प्रसन्न होकर यदि कोई स्वेच्छा से कुछ दे देता है तो मैं उसे सहर्ष स्वीकार करता हूँ। ऐसा धन मेरी समझ में विकार रहित शुद्ध दूध की तरह होता है। यह उत्कोच का उत्तम प्रकार है। उत्कोच का मध्यम प्रकार वह होता है जब संकेत करने पर वह मिल जाये। उदाहरण के लिए जिसका काम मैंने तत्परता से कर दिया जब वह इसके बदले केवल धन्यवाद देकर जाने लगता तो मैं संकेत करता हूँ- 'मैंने आपका काम शीघ्र निपटा दिया। क्या इसके बदले मुझे पुरस्कार नहीं मिलना चाहिए?Ó इस संकेत से प्रेरित होकर यदि वह मुझे कुछ पत्र-पुष्प प्रदान कर देता है तो उसे मैं शुद्ध जल समझकर स्वीकार कर लेता हूँ। यह उत्कोच का मध्यम प्रकार है। उत्कोच का एक तीसरा प्रकार भी होता है, इसमें काम के बदले दाम पहले ही सौदेबाजी करके तय कर लिया जाता है। इसमें यह साफ कर दिया जाता है कि बिना दाम के काम नहीं होगा। इस शर्त के साथ काम करके जो उत्कोच प्राप्त किया जाता है, वह अधम कोटि का होता है। इसे मैं कभी स्वीकार नहीं करता। क्योंकि वह शुद्ध खून की तरह होता है और मैं खून चूसने वाला असुर अधिकारी नहीं हूँ।Ó 
इस वक्तव्य के साथ विवेकनारायण जी ने अपनी तकरीर समाप्त की।

-1436-बी, सरस्वती कॉलोनी, चेरीताल वार्ड, जबलपुर

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