Sunday, June 14, 2015

'कुण्डलिया संचयन' का प्रकाशन

आधुनिक छंद मुक्त कविता के दौर में प्राचीन भारतीय छंदों का चलन जैसे बीते युग की बात हो चला था| ऐसे में प्राचीन भारतीय छंदों को पुनर्जीवन प्रदान कर उन्हें पुनर्स्थापित करने में कई साहित्यकार बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं| त्रिलोक सिंह ठकुरेला सुपरिचित कुण्डलियाकार हैं। इन्होंने कुण्डलिया छंद के उन्नयन के लिए 'कुण्डलिया छंद के सात हस्ताक्षर' और 'कुण्डलिया-कानन' का सम्पादन किया है। अब श्री त्रिलोक सिंह ठकुरेला द्वारा सम्पादित तीसरा कुण्डलिया संकलन 'कुण्डलिया संचयन' निकट भविष्य में साहित्यजगत के समक्ष होगा | कुण्डलिया संकलन 'कुण्डलिया संचयन' में सर्वश्री अशोक कुमार रक्ताले , डा.जगन्नाथ प्रसाद बघेल , डा.ज्योत्स्ना शर्मा ,परमजीत कौर 'रीत' ,डा. प्रदीप शुक्ल , महेंद्र कुमार वर्मा ,राजेंद्र बहादुर सिंह 'राजन' ,राजेश प्रभाकर , शिवानंद सिंह 'सहयोगी' , शून्य आकांक्षी , साधना ठकुरेला , हातिम जावेद , हीरा प्रसाद 'हरेंद्र' और त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कुण्डलियां संकलित हैं|

रँग जीवन हैं कितने

सुख अनंत मन की सीमा में, 
दुख के क्षण हैं कितने ? 
अभिलाषा आकाश विषद है, 
है प्रकाश से भरा गगन. 
रोक सकेंगे बादल कितना, 
किरणों का अवनि अवतरण.
चपला चीर रही हिय घन का, 
तम के घन हैं कितने ? 
दुख के क्षण हैं कितने ? 

काल-चक्र चल रहा निरंतर, 
निशा-दिवस आते जाते, 
बारिश सर्दी गर्मी मौसम, 
नव अनुभव हमें दिलाते. 
है अमृतमयी पावस फुहार, 
जल प्लावन हैं कितने ? 
दुख के क्षण हैं कितने ?
 
अनजानों की ठोकर सह लें, 
क्षम्य नहीं आपस में भूल. 
ये मानव रिश्ते भी क्या हैं, 
आज फूल कल बनते शूल. 
कभी मलय से सौम्य सुगन्धित, 
दग्ध अगन हैं कितने ? 
दुख के क्षण हैं कितने ? 

छल फरेब को कैसे मापें, 
कौन सान कसें ईमान. 
निर्वासित क्यों शौर्य वर्यता, 
क्यों कुंठित हो रहे ज्ञान. 
आदर्शों की रसवंती में, 
कुत्सित्जन हैं कितने ? 
दुख के क्षण हैं कितने ? 

स्वर्ग-नर्क सब यहीं धरा पर, 
अपने कर्मों की छाया. 
सुख-दुख में परिमार्जन करना, 
लोभ-मोह मन की माया. 
विस्तृत होते इन्द्रधनुष से, 
रँग जीवन हैं कितने ? 

सुख अनंत मन की सीमा में, 
दुख के क्षण हैं कितने ?
                                    -हरिवल्लभ शर्मा

Saturday, June 13, 2015

गीत -श्वेता राय

जेठ की तपती छाया भी लगती मुझको मधुमास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!

सूनी-सूनी दुपहरिया में
नयन जोहते तेरी बाट
संझा में होकर के बेकल
भटके सुधियाँ घाट-घाट
पछुआ भी लहरा कर भरती फागुन के रंग रास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!

चंपा चमेली की खुशबू से
साँसे रहती पगी मेरी
रात चाँद अकुलाहट से
रहती आँखे जगी मेरी
आवारा बादल दे जाते सावन का आभास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!

भोर अरुणिमा का सूरज आ
कण-कण में जब ताप भरे
डाल-डाल तब गाकर कोयल
मन के सब संताप हरे
चिड़ियों की चह-चह बिखराती अधरों पर मधु हास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!

                                                                                     -श्वेता राय 

ग़ज़ल- कालीचरण सिंह राजपूत

बनाओ मत खुदा उसको उसे इंसान रहने दो।
समुन्दर से जुदा क़तरे की हर पहचान रहने दो।

समझनी ही नहीं मुझको ये मज़हब ज़ात की बातें,
बनो तुम शौक से वाइज़ मुझे नादान रहने दो।

हर इक रस्ते की मंज़िल हो ज़रूरी तो नहीं यारो,
कि कुछ रस्ते तुम अपनी जीस्त के अनजान रहने दो।

कभी दिल आश्ना थे हम भरम इतना रहे बाक़ी,
अभी होठों पे तुम अपने ज़रा मुस्कान रहने दो।

लगी जब आग घर में तो कहा मुझसे बुज़ुर्गों ने,
उठा लो हाथ में गीता सभी सामान रहने दो।

क़सम खाकर ज़रूरी तो नहीं वो सच ही बोलेगा,
तो फिर गीता कुर'आं अल्लाह और भगवान रहने दो।

-कालीचरण सिंह राजपूत 
पता- नरैनी जिला--बांदा ( उत्तर प्रदेश )
मोबा---09721903281