Saturday, June 13, 2015

ग़ज़ल- कालीचरण सिंह राजपूत

बनाओ मत खुदा उसको उसे इंसान रहने दो।
समुन्दर से जुदा क़तरे की हर पहचान रहने दो।

समझनी ही नहीं मुझको ये मज़हब ज़ात की बातें,
बनो तुम शौक से वाइज़ मुझे नादान रहने दो।

हर इक रस्ते की मंज़िल हो ज़रूरी तो नहीं यारो,
कि कुछ रस्ते तुम अपनी जीस्त के अनजान रहने दो।

कभी दिल आश्ना थे हम भरम इतना रहे बाक़ी,
अभी होठों पे तुम अपने ज़रा मुस्कान रहने दो।

लगी जब आग घर में तो कहा मुझसे बुज़ुर्गों ने,
उठा लो हाथ में गीता सभी सामान रहने दो।

क़सम खाकर ज़रूरी तो नहीं वो सच ही बोलेगा,
तो फिर गीता कुर'आं अल्लाह और भगवान रहने दो।

-कालीचरण सिंह राजपूत 
पता- नरैनी जिला--बांदा ( उत्तर प्रदेश )
मोबा---09721903281

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