जेठ की तपती छाया भी लगती मुझको मधुमास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!
सूनी-सूनी दुपहरिया में
नयन जोहते तेरी बाट
संझा में होकर के बेकल
भटके सुधियाँ घाट-घाट
पछुआ भी लहरा कर भरती फागुन के रंग रास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!
चंपा चमेली की खुशबू से
साँसे रहती पगी मेरी
रात चाँद अकुलाहट से
रहती आँखे जगी मेरी
आवारा बादल दे जाते सावन का आभास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!
भोर अरुणिमा का सूरज आ
कण-कण में जब ताप भरे
डाल-डाल तब गाकर कोयल
मन के सब संताप हरे
चिड़ियों की चह-चह बिखराती अधरों पर मधु हास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!
-श्वेता राय
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