Sunday, June 14, 2015

रँग जीवन हैं कितने

सुख अनंत मन की सीमा में, 
दुख के क्षण हैं कितने ? 
अभिलाषा आकाश विषद है, 
है प्रकाश से भरा गगन. 
रोक सकेंगे बादल कितना, 
किरणों का अवनि अवतरण.
चपला चीर रही हिय घन का, 
तम के घन हैं कितने ? 
दुख के क्षण हैं कितने ? 

काल-चक्र चल रहा निरंतर, 
निशा-दिवस आते जाते, 
बारिश सर्दी गर्मी मौसम, 
नव अनुभव हमें दिलाते. 
है अमृतमयी पावस फुहार, 
जल प्लावन हैं कितने ? 
दुख के क्षण हैं कितने ?
 
अनजानों की ठोकर सह लें, 
क्षम्य नहीं आपस में भूल. 
ये मानव रिश्ते भी क्या हैं, 
आज फूल कल बनते शूल. 
कभी मलय से सौम्य सुगन्धित, 
दग्ध अगन हैं कितने ? 
दुख के क्षण हैं कितने ? 

छल फरेब को कैसे मापें, 
कौन सान कसें ईमान. 
निर्वासित क्यों शौर्य वर्यता, 
क्यों कुंठित हो रहे ज्ञान. 
आदर्शों की रसवंती में, 
कुत्सित्जन हैं कितने ? 
दुख के क्षण हैं कितने ? 

स्वर्ग-नर्क सब यहीं धरा पर, 
अपने कर्मों की छाया. 
सुख-दुख में परिमार्जन करना, 
लोभ-मोह मन की माया. 
विस्तृत होते इन्द्रधनुष से, 
रँग जीवन हैं कितने ? 

सुख अनंत मन की सीमा में, 
दुख के क्षण हैं कितने ?
                                    -हरिवल्लभ शर्मा

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