Tuesday, March 17, 2015

परिवार और परिवेश का प्रतिबिम्ब - चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ


      अहले-जमीं से दूर रहने पर उसी दूरी का अहसास, जिये गये पलों की यादें - जिनकी इमारतें खट्टे-मीठे तजुर्बों से सजाई गयी है, उन बीते पलों की कोख से जन्म लेती है सोच, जो इस नये प्रवासी वातावरण में अपने आप को समोहित करने में जुटी है। यहां की ज़िंदगी, आपाधापी का रवैया, रहन-सहन, घर और बाहर की दुनिया की कशमकश ! और कशकश की इस भीड़ में जब इन्सान ख़ुद से भी बात करने का मौका नहीं पाता है तो सोच के अंकुर कलम के सहारे खुद को प्रवाहित करते हैं, प्रकट करते हैं।
      कहानी लिखना - एक प्रवाह में बह जाना है। कल्पना के परों पर सवार होकर जब मन परिंदा परवाज़ करता है तो सोच की रफ़्तार अपने मन की कल्पना को इस तरह ख़यालों की रौ में बहा ले जाती है कि कल्पना और यथार्थ का अंतर मिटता चला जाता है। ऐसा कब होता है, कैसे होता है, क्यों होता है - कहना नामुमकिन है। लेखक जब ख़ुद अपनी रचना के पात्रों में इस कदर घुल-मिल जाता है तो लगता है एक विराट संसार उसके तन-मन में संचारित हुआ जाता है और फिर वहां मची हलचल को, उस दहकती दशा को कलम के माध्यम से अभिव्यक्त किये बिना उसे मुक्ति नहीं मिलती.      
         हर इन्सान के आस-पास और अन्तर्मन में एक हलचल होती है। सोचों की भीड़, रिश्तों की भीड़, पाबंदियों की भीड़, सुबह से शाम, शाम से रात, बस दिन ढलता है, सूरज उगता और फिर ढल जाता है और जैसे जैसे मानव-मन अपने परिवेश से परिचित होकर घुलता मिलता जाता है तो फिर एक अपनाइयत का दायरा बनने लगता है; मन थाह पाने लगता है।

      जी हां ! कुदरत के सभी तत्त्वों के ताने-बाने से बुनी हुई ऐसी कहानियां, आधुनिक समाज में बदलते जीवन मूल्यों को रेखांकित करती हुई हमसे रूबरू हो रही है, श्री अमरेन्द कुमार के कहानी संग्रह "चूड़ीवाला और अन्य कहानियां" के झरोखों से। अमरेन्द्र जी का परिचय देना सूरज को उंगली दिखाने के बराबर है।
अमरेन्द्रका जन्म बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में हुआ। आपने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मुज़फ़्फ़पुर में संपन्न की। स्नातक की डिग्री मोतीलाल नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, इलाहाबाद से प्राप्त करने के पश्चात आपने अमेरिका की ओहायो स्टेट यूनीवर्सिटी से औद्योगिकी अभियंत्रण में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की। संप्रति आप अमेरिका में डाउ केमिकल मे कार्यरत हैं और मिशिगन प्रांत में रहते हैं। साहित्य, चित्रकला, संगीत एवं भ्रमण में आपकी रुचि है। आपकी रचनाएँ अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। आप संयुक्त राज्य अमेरिका से निकलने वाली पत्रिका क्षितिज और ई-विश्वा का सम्पादन भी करते रहे हैं। वे हिन्दी साहित्य का प्रचार-प्रसार अपने लेखन के माध्यम से करते हैं.
उनकी कहानियों में एक ऐसी दबी चिंगारी पाई जाती है जो पाठक को अपनी आंच की लपेट में लेने से बाज नहीं आती। इस संग्रह में आठ कहानियां है जिनमें मेरी पसंदीदा रहीं - मीरा, चूड़ीवाला, चिड़िया, एक पत्ता टूटा हुआ, ग्वासी, रेत पर त्रिकोण ।
      'मीरा' अमरेन्द्र जी की एक लम्बी कहानी है। एक तरह से कोई जिया गया वृतांत, जिसमें विस्मृतियों की अनेक गांठें परस्पर खुलती रहती है। इस संग्रह की भूमिका में उनके ही शब्दों में परतें खोलती हुई कलम कह उठती है - " कहानी मनुष्य की अनुभूत मनोदशाओं का एक पूरा दस्तावेज़ है। यह एक ऐसी दुनिया है जहां सब कुछ अपना है - पात्र, परिवेश, परिस्थ्ति, आरम्भ, विकास और परिणति " आगे उनका कथन है कि कहानी का अंत कभी नहीं होता, उसमें एक विराम आ जाता है। एक कहानी से अनेक कहानियां निकलती है.."
      सच ही तो है ! उनकी कहानियां अपने जिये अनुभवों का एक लघु धारावाहिक उपन्यासिक प्रयास प्रस्तुत करती है जो शब्दों के सैलाब से अभिव्यक्त होता है जिसमें कहानी का किरदार, अपने आस- पास का माहौल, रहन- सहन, कथन-शैली से जुड़ते हुए भी किताना बेगाना रहता है। एक विडंबनाओं का पूरा सैलाब उमड़ पड़ता है कहानी 'मीरा' के दरमियान जिसमें समोहित है आदमी की पीड़ा, तन्हाईयों का आलम, परिस्थितियों से जूझते हुए कहीं घुटने टेक देने की पीड़ा, उसके बाद भी दिल का कोई कोना इन दशाओं और दिशाओं के बावजूद वैसा ही रहता है - "कोरा, अछूता, निरीह, बेबस और कमजोर"।
      "मां नहीं रही.." खबर आई, समय जैसे थम गया, सांस अटक गयी, आंसू निकले और साथ में एक आर्तनाद" लेखक के पात्र का दर्द इस विवरण में शब्दों के माध्यम से परिपूर्णता से ज़ाहिर हो रहा है। आगे लिखते है " सब कुछ लगा जैसे ढहने, बहने, गिरने और चरमराने और मैं उनके बीछ दबता, घुटता, और मिटता चला गया " नियति की बख़्शी हुई बेबसी शायद इन्सान की आखिरी पूंजी है। मन परिन्दा सतह से उठकर अपनी जड़ों से दूर हो जाता है, लेकिन क्या वह बन्धन, उस ममता, उस बिछोह के दुख से उपर उठ पाता है ?
      अतीत की विशाल परछाईयों में कुछ कोमल, कुछ कठोर, कुछ निर्मल, कुछ म्लान, कुछ साफ, कुछ धुंधली सी स्मृतियां, टटोलने पर हर मानव मन के किसी कोने में सुरक्षित पायी जाती है। दर्द के दायरे में जिया गया हर पल किसी न किसी मोड़ पर फिर जीवित हो उठता है । अमरेंद्र जी की क़लम की स्याही कहानी की रौ में कहती-बहती इसी मनोदशा से गुज़रे 'मीरा' के जीवन को रेखांकित कर पाई है,  जो बचपन, किशोरावस्था से जवानी और फिर उसी उम्र की ढलान से सूर्योदय से सूर्यास्त तक का सफ़र करती है। कहानी में अमरेन्द्र ने अनुरागी मन के बंधन को खूब उभारा है जहां मीरा की सशक्तता सामने ज़िन्दा बनकर आती है - वहीं नारी जो संकल्पों के पत्थर जुटाकर, अपनी बिख़री आस्थाओं की नींव पर एक नवीन संसार का निर्माण करती है। मानवीय संबंधों की प्रभावशाली कहानी है 'मीरा' !
      उम्र भी क्या चीज है - बदलते मौसमों का पुलिन्दा ! शरीर और आत्मा का अथक सफ़र जहाँ हर मोड़ पर एक प्रसंग की परतें खुलती हैं, वहीं दूसरे मोड़ पर एक अन्य कथा को जन्म देती है। जीवन के परिवेश के विविध रंगों के ताने-बाने से बुनी ये कहानियां कहीं प्रकृति के समुदाय के प्रभावशाली बिंब सामने दरपेश कर पाती है, कहीं चाहे अनचाहे रिश्तों की संकरी गलियों से हमें अपना अतीत दोहराने पर मजबूर करती है। कहानी 'चूड़ीवाला' एक और ऐसी कहानी है जिसका मर्म दिल को छू लेता है। इसके वृतांत में 'सलीम चाचा' नामक चूड़ी बेचनेवाले किरदार का ता-उम्र का सफ़र और सरमाया है जो उन्होंने बख़ूबी निभाया है सामने आया है, जिसने बालावस्था से वृद्धावस्था तक हर चौखट की शान को अपनी मान-मर्यादा समझा। एक मोड़ पर आकर उन्हें यह अहसास दिलाया जाता है कि "घर की बहू बेटियाँ उनकी बेची चीज़ों की खरीदार हैं और वे फ़कत बेचनेवाले" । इन्सान के तेवर भी न जाने कब मौसम की तरह बदल जाते हैं ! कभी एक ही चोट काफ़ी होती है बिखराव के लिये। ऐसा ही तूफान उमड़ा सलीम चाचा के मन में और वही उन्हें ले डूबा। परस्पर इन्सानी रिश्तों का मूल्यांकन हुआ जिसमें एक अमानुषता का प्रहार मानवता पर भारी साबित हुआ।
      शैली और शिल्प का मिला जुला सरलता से भरा विवरण कहीं-कहीं अमरेन्द्र जी की कल्पना को यथार्थ के दायरे में लाकर खड़ा करता है - एक चलचित्र की तरह उनकी कहानी 'चिड़िया' में। जिसमें एक मूक गुफ़्तार होती है उस बेज़ुबान चिड़िया और कहानी के मूल किरदार के बीच; जहां एक नया रिश्ता पनपता है। ऐसा महसूस होता है कि स्वयं को सबसे विकसित प्राणी मानने वाले मनुष्य को भी अपने परिवेश से और बहुत कुछ सीखना बाकी है. एक संबंध जो मानव मन को एक साथ कई अहसासात के साथ जोड़ देता है, उस पल के अर्थ में अमरेन्द्र जी की भाषा ज्ञानार्थ को ढूंढ रही है, अपनी -अपनी कथा कहते हुए.  जो सीमाओं की सीढ़ियाँ पार करते हुए शब्दावली की अनेक धाराओं की तरह निरंतर कल-कल बह रहीं हैंउस चिड़िया के आने और न आने के बीच की समय गति में मानवीय मन की उकीरता, उदासी, तड़प, छटपटाहट शायद कलम की सीमा से भले परे  हो, पर मन की परिधि में निश्चित ही क़रीब रही है. कहना, सुनना और सुनाना शायद इसके आगे निरर्थक और निर्मूल हो जाते हैं. रिश्ते में एक अंतहीन व्यथा-कथा शब्दों से अभिव्यक्त होकर मन के एक कोने में अमिट छाप बन कर बस जाती है.
         सशक्त भाषा, पुरसर शैली और क़िरदार की संवाद शक्ति, शब्दों की सरलता इन कहानियों को पठनीय बनाती है. शब्द शिल्प की नागीनेदारी उन्हें और भी जीवंत कर देती है. कहानियों  के माध्यम से लेखक अपने ही मन की बंधी हुई गांठें और मानव-मन की परतों को भी उधेड़  रहे हैं,  उदहारण के लिए कहानी 'गवासी'  ही लें.   ज़मीन से जुडी यादें हरेक शख़्स की यादों के किसी हिस्से पर अधिकार रखती है और इंसान चाहकर भी ख़ुद को उन अधिकारों से वंचित  नहीं रख पाता. ऐसी  ही  नींव पर ख़ड़ी है गवासी-एक इमारत जो स्मृतिओं के रेगिस्तान में अब भी टहलती हैबीते हुए कल के 'आज' भी जिसके आँगन में पदचाप किये बिना चले जाते हैं‍- जैसे किसी बुज़र्ग के फैले हुए दामन में, जो अपने परिवार को बिखरने से बचाने के लिए अपने अंत को टाले हुए है.     
                 स शैली के प्रवाह पर सोच भी चौंक पड़ती है, ठिठक कर रुक जाती है . "मृत्यु तो जैसे आ गयीलेकिन जीवन ने जैसे आत्म-समर्पण करने से मना कर दिया हो...हाँ ऐसी ही है "गवासी" आश्चर्य चकित रूप में ख़ुद से जोड़ने वाली कहानी...कहानी कम..वृतांत ज़ियादा.
"एक पत्ता टूटा हुआ"  काफ़ी हद तक मौसमों के बदलते तेवर दर्शाता हुआ वृतांत लगा,  जो हवाओं के थपेड़ों के साथ जूझते हुए सोच की उड़ानों पर सवार होकर घर से दूर, मंजिल तक का सफ़र तय कर पाया है.
वो दर बदर, मकाँ बदर, मंजिल बदर हुआ
पत्ता गिरा जो शाख से जुड़ कर न ज़ुड़ सका
कथा में हास्य-रस का स्वाद भी ख़ूब है. एक पत्ता अपने-अपने जीवन के हर पहलू का बयाँ कर रहा है, स्नेह के छुहाव काप्यार की थपथपी का, औरों के पावों तले रौंदे जाने पर चरमराहट का, किताबों की कैद से रिहाई पाने के बाद ठण्ड के अहसास का, बड़ा ही सहज और रोचक प्रस्तुतीकरण है. लेखक की यह ख़ूबी, पाठक को अपने साथ बाँध रखने की, अपने आप में एक मुबारक अस्तित्व्पूर्ण वजूद रखती है. जहाँ उम्र भर का अनुभव पल में सिमट रहा हो, वहीं पलों की गाथा ता-उम्र के सफ़र में भी संपूर्ण नहीं होती. रेखांकित की गई विषय-वस्तु सजीव, हास्य-रस में अलूदा एक पत्ते की आत्मा-कथा का चित्रण अति प्रभावशाली सिलसिले की तरह चलता रहा.  
      कहानी "रेत का त्रिकोण" मानव- मन की दशा और दिशा दर्शाती है, बिछड़कर भी जुड़े रहने की संभावना की पेचकाश है . कोई एक सूत्र है जो इंसान को इंसान से जोड़ता है, कोशिशें तो होंगी और होती रहेंगी, पर कब तक? क्या रेत के टीले पर बना भवन हवा के थपेड़ों से खुद को बचा पाया हैक्या रेत को मुट्ठी में कैद रख पाना संभव है?  कई सवाल अब भी जवाब की तलाश में भटक रहे हैं, सर फोड़ रहे हैं.  मानव- मन का प्रवाह अपनी गति से चल रहा है और भाषा का तरल प्रवाह पाठक के मन को मुक्ति नहीं दे रहा है.
        "रेलचलित मानस" नामक कहानी अपने उन्वान का प्रतिबिम्ब है. दुनिया के प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी भीड़ का एक हिस्सा है मानव. सफ़र में इस छोर से उस छोर तक का अनुभव ही ज़िन्दगी को मान्यता प्रदान करती है -जो आज के माहौल की आपाधापी में गुज़र जाती है, रूकती नहीं. जो गुज़रती रहे गुज़रने के पहले वही तो ज़िन्दगी है !
        अमरेन्द्र जी की कहानियाँ अपनी विषय-वस्तु, वर्णन-शैली के कारण रोचक और पाठनीय है, कभी कहानियाँ एक दुसरे से जुडी हुई, ज़मीन से, ज़र सेमानवता से- जैसे जीवन की धार में अनुभव रुपी मोती पिरोये गए हैं . प्रकृति के हर एक मौसम का वर्णन प्रभावशाली बिम्ब बनकर सामने आता है. इन कहानियों की एक ख़ूबी यह भी  है- वे जहाँ से शुरू होती हैं, वहीँ समाप्त होकर, और फिर वहीँ से प्रारंभ होने का सामर्थ्य भी रखती हैं.  इस दिशा में एक कदम आगे और आगे बढ़ते रहे इसी शुभकामना के साथ

समीक्षकः देवी नागरानी
न्यू जर्सी, यू. एस. . dnangrani@gmail.com,

पुस्तकः चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ,
लेखक; अमरेन्द्र कुमार, 
पन्नेः१७४, कीमतः रु॰125, 
प्रकाशकः पेंगुइन बुक्स एंड यत्र बुक्स  

Monday, March 16, 2015

दार्शनिक चिंतन से परिपूर्ण कविताएं

          
मानवीय भावनाओं एवं संवेदनाओं की सहज अभिव्यक्ति को कविता कहते हैं। कविता का जन्मना असाधारण स्थिति है अन्यथा हर मन में कविता उत्पन्न हो जाती। अन्य साहित्यिक विधाओं की तरह कविता केवल समकालीन प्रतिक्रियाओं में सिमट कर नहीं रहती। यह नदी-नीर की तरह न जाने कहां-कहां की चट्टानों को तोड़ती हुई, राह बनाती हुई अपनी मंजिल तक पहुंचती है। यह चुपके-चुपके अतीत, वर्तमान और भविष्य की सच्चाई को, अपने अंदाज में, कान में फूंककर आगे बढ़ जाती है।
धीरे से, मगर पूरे बल से, दार्शनिक अंदाज में जीवन सत्यों को कान में फूंकने वाली कविताओं का संग्रह है - मैं अनजान नहीं। मीनाक्षी आहुजा द्वारा सृजित इन कविताओं में पाठक का मन रमाने की क्षमता है। ये छोटी-छोटी कविताएं बड़ी-सी बात कहती हैं तो रसिक पाठक यह हुई न बात कहे बिना नहीं रह सकता। इन कविताओं में यादें हैं, तन्हाई है, प्रेम की पुकार है, सपनों का संसार है, सौन्दर्यानुभूति है वहीं उपभोक्तावादी संस्कृति है। सरकारी नीतियों का कड़वा सच है तो भागमभागी का दंश भी है। बात रिश्तों की हो या जीवन की, कवयित्री की गहन अनुभूतियां शब्दों के सांचे में ढलकर प्रश्न उठाती हैं, जवाब देती हैं तो कहीं सोचने-मनन करने को बाध्य करती हैं यथा - क्यों औरत के हाथ में/ होती है / आरजू की लकीर।
कवयित्री सुलझे हुए सुझाव भी देती है कि मानव मानव ही रह जाए तो अच्छा है। सुख का संसार बसाने के लिए अपने भीतर उतरना होता है। आदमी और जानवर के मध्य तहजीब का फासला रखने के लिए सहनशीलता अनिवार्य है। जीवन की दुविधापूर्ण स्थितियां भी बयां की गई हैं - गवारा नहीं किसी को / किसी की मुस्कराहट / और समझना है मुश्किल / चुप की फितरत। कई एक स्थानों पर आशावादिता का शंखनाद किया गया है - बीज बोएंगे सच के तो / पेड़ ज़रूर बनेंगे वक़्त आने पर। विपरीत परिस्थितियों से जूझकर मंजिल पाने का संदेश ध्वनित हुआ है। विखंडन को सृजन का पथ प्रणेता माना है। जागृति क्या है ? इसके उत्तर में कवयित्री का कथन है कि जब अपने-पराए, सुख-दुख का भाव बोध खत्म होता है तब जागृति होती है। प्रेम की ऊंचाई को छूने वाली एक कविता के ये शब्द दृष्टव्य हैं - शब्दों के उस पार / तुम को पा ही लूंगी / संभाल रखे हैं ख़त कई / कभी तो पढ़ ही लूंगी।
इसी प्रकार हिम्मत का पक्ष लेती हुई ये पंक्तियां जीवट से भरती हैं - गर्मी है अगर / धूप के टुकड़े हैं / तो चीर कर बादलों का सीना / निकल आएगा / एक बार फिर आसमान में। संतान के लिए माता-पिता की भूमिका का प्रभावपूर्ण व चित्रात्मक वर्णन है - पिता का साया होता है / सुरक्षित घर-सा। तुम समेट लोगी / मुझे है यकीन / ए मां / जब भी बिखर जाती हूं। वस्तुतः इन कविताओं में घर परिवार की खिलखिलाहट, बालपन की मासूमियत, रिश्तों की बुनावट और अनुशासन की पगडंडियां हैं। कहीं-कहीं पुरुष के दंभ को चुनौती दी गई है। खास बात यह कि हिम्मत के पंख लगाकर आसमान छूने का, मूल्यों को संवर्द्धित करने का संकल्प भी है - स्वयं रहूंगी कायम / जिंदगी के साथ / अपने मूल्यों पर। कथ्य व शिल्प की दृष्टि से विश्वास की महक, कागज की किश्ती, सबक, ठंडक, विस्तार, बेसुरा, तुम बताओ सखी, बेबाक लड़की, किताब में तितली और नई डगर आदि रचनाएं उत्कृष्ट बन पड़ी हैं। लड़की का साहस महिला सशक्तिकरण की टेर लगाने वाली कविता है। यदि इस कविता को पढ़ने के साथ-साथ गुन भी लिया जाए तो लड़की के साहस पर प्रश्न उठाने का सवाल ही न उठे।
कई कविताओं में, आने वाला कल ज़रूर सुहावना होगा, का स्वर मुखरित हुआ है। यह स्वर टूटे दिलों को जोड़ता है, थके जिस्मों को आरोगता है, रिश्तों को खंगालता है और रिक्तियों को भरता है। दार्शनिक चिंतन से परिपूर्ण ये कविताएं देर तक व दूर तक पाठक के साथ रहती हैं। बानगी स्वरूप - अन्तर्मन में / मेहंदी की तरह / रचते चले जाएं तो / अपनत्व भरे हरफ़ / हो जाते हैं निर्दोष। कवयित्री को चुभन है इस बात की कि व्यक्तित्व में रिक्तता क्यों व्याप्त है ? इस रिक्तता को भरने का सद्प्रयास है यह कविता संग्रह, ऐसा मेरा मानना है।
ये कविताएं छंदमुक्त हैं परन्तु इनमें आंतरिक लय व प्रवाह विद्यमान है। न शब्दों का आडम्बर है, न उलझी हुई भाषा, भाव या शैली। कहीं कोई लुकाव-छिपाव नहीं। अनुप्रास, रूपक व विरोधाभास आदि अलंकारों का खुलकर प्रयोग किया गया है। यदि कविताओं के शीर्षक-चयन में अधिक मंथन कर लिया जाता तो सोने पर सुहागे वाली बात होती।
भावों की सुकुमारिता से सज्जित काव्य संग्रह मैं अनजान नहीं साहित्यिक जगत में अपना स्थान बनाएगा, ऐसी उम्मीद करती हूं। कवयित्री को साधुवाद एवं शुभाशीष।

                                          समीक्षक - कृष्णलता यादव गुड़गांव




पुस्तक का नाम - मैं अनजान नहीं                          
कवयित्री - मीनाक्षी आहुजा                                  
प्रकाशक - बोधि प्रकाशन, एफ-77, सैक्टर 9, जयपुर।             

पृष्ठ संख्या - 120, मूल्य - 150 रु.                           

Saturday, March 14, 2015

परिवेश से संवाद करती कहानियाँ : 'और दीप जल उठे'


ʻरिश्तों का अहसासʼ कहानी संग्रह के बाद ʻऔर दीप जल उठेʼ श्रीमती सुरेखा शर्मा का दूसरा कहानी संग्रह व चौथी पुस्तक है। इसमें 15 कहानियाँ संकलित हैं। अपने परिवेश से संवाद करती और कहानीकारा के व्यक्तित्व से जुड़ी ये बहुआयामी कहानियाँ जमीन और माटी की उपज कही जा सकती हैं। जीवन के प्रति आस्था और प्रतिष्ठा के स्वर इन रचनाओं में निरंतर तरंगित हैं।
ʻऔर दीप जल उठेʼ एक सशक्त और मार्मिक पारिवारिक कहानी है जिसमें बुजुर्ग सास की उपस्थिति को बहू ने पूरा मान दिया। इससे सास के अहं की शिला खंडित होती चली गई। वैसे तो मिट्टी के दीप हर दीवाली पर जलाए जाते थे लेकिन इस बार के दीप कुछ खास थे। ये थे – अन्तर्मन के दीप। इन्होंने ऐसा आलोक बिखेरा जो पाठकों के दिल को आलोकित करता रहेगा, जिसका उजाला पुकार-पुकार कर कहेगा – अहं के तम को हटाते चलो ताकि यत्र-तत्र-सर्वत्र खुशी के जीप जलते रहें।
इस संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ संदेशपरक हैं। घटनाक्रम में गत्यात्मकता है। पाठक की जिज्ञासा अंत तक बनी रहती है। ʻअपराधबोधʼ कहानी अजनबी बालक के प्रति ममता व अपनत्व भरे व्यवहार का अनूठा उदाहरण है। इसमें वेदना है, संवेदना है, रुदन है और अपनी गलती स्वीकार करने का मनोविज्ञान है। ʻकाहे को ब्याही विदेशʼ में अभिभावकों को सचेत किया गया है कि रिश्ते करते समय पूरी छानबीन करनी जरूरी है। रूढ़िवादिता पर प्रहार करती, कथ्य की तेजधार व पद्यात्मक सरसता से भरपूर यथार्थवादी कहानी है – ʻमाता की चुनरी।ʼ
ʻपश्चाताप की आगʼ कहानी का मूलभाव है कि स्नेह-प्यार की पगडंडी पर सहज गति से चलते हुए, बीच राह में, लालच की चट्टान आ जाने पर परिवार का कोई न कोई पात्र अकाल मृत्यु का शिकार हो जाता है। यथार्थ व आदर्श का मिश्रण है यह कहानी। स्वार्थ की आग में झुलसती रही बाबूजी की संतान जबकि नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने वाली थी शांतमना सेविका सरस्वती। उसके ये शब्द बाबूजी की संतान के गाल पर करारा तमाचा जड़ते हैं – ʻमैं तो बाबूजी का चित्र लेने आई थी। मुझे इन कागज़ों से क्या लेना। सात-आठ महिनों में एक पिता का प्यार जो उन्होंने मुझे दिया, उससे अधिक एक दुखिया बेटी को क्या चाहिए था।ʼ
गुरु-शिष्य परम्परा पर आधारित मनोवैज्ञानिक कहानी ʻगुरु मर्यादाʼ पाठक के मन-मस्तिष्क को झकझोरती है और सुखान्त तक पहुँचाकर उसे ʻवाहʼ कहने को मजबूर करती है। बुरी सोच पर अच्छी सोच की विजय दर्शाती इस कहानी की सराहना करनी बनती है। परत-दर-परत रिश्तों का सच उजागर करती है ʻमनोव्यथाʼ कहानी जिसमें एक ओर सरलता, नेकनीति और संस्कृति है तो दूसरी ओर भौतिकता, बदनीयती व विकृति है। और अंत में शाश्वत सत्य उभर कर आता है कि सर्प-सम प्रकृति के स्वामियों से दूरी रखनी बनती है अन्यथा उन्हें दूध पिलाते रहो और बदले में बदनामी का विष पीते रहो।
ʻपश्चाताप के आँसूʼ कहानी आगाह करती है कि जरूरत से ज्यादा लाड़-प्यार तथा जेबखर्च बच्चे को बिगाड़ते हैं। महिला सशक्तिकरण का ज्वलंत उदाहरण पेश करती है ʻतप का फलʼ कहानी। कथानायिका अनिता के माध्यम से कहा जा सकता है कि नारी अबला हरगिज नहीं, वह सबला है। हाँ, सबलता के अँकुर को पनपाने के लिए संघर्ष व मेहनत का खाद-पानी देना पड़ता है। इस कहानी का कथानक मंथर गति की सरिता की तरह बढ़ता गया है। ʻबड़ी बहूʼ कहानी में मध्यमवर्गीय परिवार की कलहकारी स्थिति का ऐसा शब्दचित्र खींचा गया है मानो कहानीकारा की आँखों के सामने सब घटित हुआ हो। बड़े परिवार की त्रासदी समेटने वाली यह कहानी पाठक के मुँह से ʻआहʼ निकलवाती है।
स्त्री-पुरुष के स्वस्थ सम्बन्धों पर आधारित प्रेरक व रोचक रचना ʻमन का मीतʼ में समुद्र तट का ऐसा जीवन्त वर्णन है जैसे प्रकृति साकार होकर सामने आ खड़ी हुई हो। ʻनई राहʼ रचना उन पुरुषों की खबर लेती है जो पदोन्नति पाने के लिए अपनी पत्नी को सीढ़ी बनाने से नहीं हिचकते। करनी का फल मिले बिना नहीं रहता का निचोड़ पेश करती है ʻकरनी का फलʼ कहानी। लालच और भ्रष्टाचार के आवरण को अनावृत करता हुआ इसका कथ्य उन लोगों के मुँह पर करारा तमाचा है जो असहायों की मजबूरी का फायदा उठाकर मानवता के दामन पर कलंक लगाते हैं। इसमें पुलिस विभाग के काले कारनामों का कच्चा चिट्ठा खोला गया है।
ʻउद्यापनʼ कहानी माँ, पुत्र व बहू के त्रिकोण को लेकर रची गई है। इसमें यथार्थ का दर्द है तो आदर्श की दवा भी है। इसमें ग्रामीण व शहरी जीवनशैली का अन्तर दर्शाया गया है। एक पक्ष गलत को भी, मजबूरीवश, सहन करता रहता है परन्तु जब परिवर्तन का देवता अवतरित होता है तो वह कुत्सित प्रवृतियों को सात्विकता में बदलकर ही दम लेता है।
बेचैनी और सुकून के बीच की स्पेस में विचरती इन कहानियों का मूल भाव है कि बुराई की उम्र बहुत लम्बी नहीं होती। किसी न किसी मोड़ पर आकर वह दम तोड़ देती है। लेखिका कहानियों में एक आदर्श, सुन्दर और नैतिक व्यक्ति को गढ़ती है। भाषा के सम्बन्ध में लेखिका सहज है। भावों के आग्रह पर शब्द स्वयं यथोचित स्थान पा गए हैं। आवश्यकतानुसार मुहावरों का प्रयोग है। गद्य में पद्य की सी लयात्मकता है। उपदेशात्मक, आत्मकथात्मक तथा वर्णनात्मक शैलियों का प्रयोग किया गया है। निपात शब्दों के बहुल प्रयोग से परहेज करना बनता था। पात्रों के नाम के साथ ʻजीʼ का सम्बोधन अटपटा लगता है। एक रचना में पात्रों को एक ही पुरुषवाचक सर्वनाम में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
त्रुटिरहित छपाई तथा आकर्षक आवरण वाली यह पुस्तक पाठकों की सोच को विस्तार देगी और उनसे आत्मीय रिश्ता बनाएगी, ऐसी उम्मीद है।

                                          समीक्षक–कृष्णलता यादव, गुड़गाँव  


                                                पुस्तक का नाम – और दीप जल उठे
                                                लेखिका – सुरेखा शर्मा ʻशान्तिʼ
                                                पृष्ठ – 104, मूल्य – 200 रु.

                                                प्रकाशक – समन्वय प्रकाशन, गाजियाबाद।

Sunday, March 8, 2015

गीति-काव्य का नया प्रयोग:कैसे बुनें चदरिया साधो


छांदस काव्य-विधाओं गीत-$गज़ल व दोहों के जाने माने रचनाकार डा. राधेश्याम शुक्ल किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। समीक्ष्य कृति 'कैसे बुनें चदरिया साधोÓ उनकी गीति-काव्य का नवीन प्रयोग है, जिसमें  गीत के अलावा गीत-कविता बहुआयामी प्रभाव छोड़ती हैं। गीत क नये स्वरूप नवगीत के मनोहारी प्रयोग के साथ संग्रह की रचनाएं दिल की गहराइयों में उतरती चली जाती हैं। हिंदी एवं संस्कृत भाषा के अधिकारी विद्वान होने के अलावा डा. शुक्ल एक समर्थ समीक्षक, चिंतनशील विचारक तथा समय के अध्येता के रूप में लब्धप्रतिष्ठ रहे हैं तथा इस संग्रह में भी उनके बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व के प्रेरक भाव मुखरित होते है।
वाराणसी (उ.प्र.)के गांव सेमरा में जन्मे तथा हिसार (हरियाणा) में साधनारत डा. शुक्ल ने इस संग्रह में भी उनका प्रिय विषय गांव-शहर कितने ही गीतों में ढ़ला है। इन गीतों की मर्मस्पर्शी भावभूमि का अंदाजा मुखड़ों से ही लगाया जा सकता है-
एक अन्धी भीड़ का, भूगोल है मेरा शहर, आंधियां विज्ञापनी इतिहास रचती हैं... यह शहर, नपता रहा है, लाल फीते से... कुछ कहीं हो जाय, यह संभावनाओं का शहर है...ऊपर से पहचाना, अन्दर से अनजाना है, मन से उतरा गांव, लगे अब एक बहाना है...पिता, गांव में, पूत, शहर में, पर, दोनों ही, दुख के घर में...तब तब लगी, खरोंच मर्म पर, जब जब गांव गया...दिन दबंगई, रात रहजनी, मिला जंगली ढंग गांव में...आदि उल्लेखनीय है।
इन रचनाओं में गीति-काव्य के सभी मूलतत्वों में रची बसी माटी की सौंधी महक तथा माटी की पीर की टीस महसूसी जा सकती है। संग्रह की तमाम रचनाएं समय के साथ कदमताल करती प्रतीत होती हैं। कहीं लोक जीवन के मार्मिक शब्दचित्र हैं तो कहीं प्रकृति व संस्कृति की विकृति के मुंह बोलते गीत झरने, कहीं सामाजिक विसंगतियों पर करारी चोट है, तो कहीं सूक्ष्म मानवीय संवेदनाओं का बहुआयामी शाब्दिक रेखांकन, कहीं देस-परदेस की पीड़ा है तो कहीं घर-परिवार की इंद्रधनुषी भावनाओं का मर्मस्पर्शी विवेचन। शीर्षक रचना से उभरी पीड़ा अनेक यक्षप्रश्र खड़े करती है-
कैसे बुनें चदिरया साधो!
उलझ गए हैं ताने-बाने!...
चादर बुनना छोड़, इन दिनों,
कलावन्त हैं 'जालÓ बुन रहे,
हम सारे 'कबीरÓ चुप हो कर,
हैं उनकी युक्तियां सुन रहे।
संग्रह की अनेक रचनाओं में रचनाकार ने बाजारु संस्कृति पर तीखे कटाक्ष करते हुए अनूठे अंदाज में बात कही है। कुछ अंश देखिये-
चमकदार चीजों से, भरा पड़ा ग्लोबल बाज़ार, कबीरा, क्या लेगा?...मल्टिनेशनल प्लेटों में हम, जैसे सजे 'पुलावÓ, हमें परदेसी खाएगा...चूल्हे तक बाजाऱ आ गया, अम्माँ, घर संभाल कर रखना...।
संग्रह में पुरवाई वक्त को समझ, कितना चीखे 'लोकÓ,  आय है 'ईमेलÓ हम तोते हैं, वक्त का फरमान है, पुरखों का तालाब, कभी हुए हम विद्यापति, घाट-घाट का पानी, मैं कस्तूरी हिरन अकेला, शहर से गांव मत आना, बहुत बेहया जमाना री सोन हिरनी प्रभावी शिल्प सौष्ठव एवं कहन के अंदाज के कारण अंदर तक छूती हैं।
अभिनव प्रकाशन, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित इस कृति की छपाई सुंदा है। आकर्षक एवं प्रासंगिक कलात्मक आवरण से सजी इस पुस्तक में तमाम रचनाओं में सामाजिक प्रतिबद्धता, प्रतीकात्मकता, गेयता, काल प्रासंगिकता अन्य विशेषताएं हैं। प्रख्यात समीक्षक एवं वरिष्ठ साहित्यकार डा. सुरेश गौतम ने पुस्तक की भूमिका में उचित ही कहा है कि राधेश्याम के शुक्ल के गीतों, $गज़लों और दोहों मे जो धार है, वही धार इन नवगीतों में भी है। विभिन्न विधाओं की करीब आधा दर्जन चर्चित कृतियों के रचनाकार डा. शुक्ल की यह रचना गीति काव्य को समृद्ध करते हुए इसे नयी ऊंचाइयां प्रदान करेगी-ऐसी आशा है।


                                         सत्यवीर नाहडिय़ा
संपर्क सूत्र : 9416711141

पुस्तक : कैसे बुनें चदरिया साधो
लेखक : डा. राधेश्याम शुक्ल
प्रकाशक : अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद
मूल्य : 200 रु. पृष्ठ : 176