छांदस काव्य-विधाओं गीत-$गज़ल व दोहों के जाने माने रचनाकार डा. राधेश्याम शुक्ल किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। समीक्ष्य कृति 'कैसे बुनें चदरिया साधोÓ उनकी गीति-काव्य का नवीन प्रयोग है, जिसमें गीत के अलावा गीत-कविता बहुआयामी प्रभाव छोड़ती हैं। गीत क नये स्वरूप नवगीत के मनोहारी प्रयोग के साथ संग्रह की रचनाएं दिल की गहराइयों में उतरती चली जाती हैं। हिंदी एवं संस्कृत भाषा के अधिकारी विद्वान होने के अलावा डा. शुक्ल एक समर्थ समीक्षक, चिंतनशील विचारक तथा समय के अध्येता के रूप में लब्धप्रतिष्ठ रहे हैं तथा इस संग्रह में भी उनके बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व के प्रेरक भाव मुखरित होते है।
वाराणसी (उ.प्र.)के गांव सेमरा में जन्मे तथा हिसार (हरियाणा) में साधनारत डा. शुक्ल ने इस संग्रह में भी उनका प्रिय विषय गांव-शहर कितने ही गीतों में ढ़ला है। इन गीतों की मर्मस्पर्शी भावभूमि का अंदाजा मुखड़ों से ही लगाया जा सकता है-
एक अन्धी भीड़ का, भूगोल है मेरा शहर, आंधियां विज्ञापनी इतिहास रचती हैं... यह शहर, नपता रहा है, लाल फीते से... कुछ कहीं हो जाय, यह संभावनाओं का शहर है...ऊपर से पहचाना, अन्दर से अनजाना है, मन से उतरा गांव, लगे अब एक बहाना है...पिता, गांव में, पूत, शहर में, पर, दोनों ही, दुख के घर में...तब तब लगी, खरोंच मर्म पर, जब जब गांव गया...दिन दबंगई, रात रहजनी, मिला जंगली ढंग गांव में...आदि उल्लेखनीय है।
इन रचनाओं में गीति-काव्य के सभी मूलतत्वों में रची बसी माटी की सौंधी महक तथा माटी की पीर की टीस महसूसी जा सकती है। संग्रह की तमाम रचनाएं समय के साथ कदमताल करती प्रतीत होती हैं। कहीं लोक जीवन के मार्मिक शब्दचित्र हैं तो कहीं प्रकृति व संस्कृति की विकृति के मुंह बोलते गीत झरने, कहीं सामाजिक विसंगतियों पर करारी चोट है, तो कहीं सूक्ष्म मानवीय संवेदनाओं का बहुआयामी शाब्दिक रेखांकन, कहीं देस-परदेस की पीड़ा है तो कहीं घर-परिवार की इंद्रधनुषी भावनाओं का मर्मस्पर्शी विवेचन। शीर्षक रचना से उभरी पीड़ा अनेक यक्षप्रश्र खड़े करती है-
कैसे बुनें चदिरया साधो!
उलझ गए हैं ताने-बाने!...
चादर बुनना छोड़, इन दिनों,
कलावन्त हैं 'जालÓ बुन रहे,
हम सारे 'कबीरÓ चुप हो कर,
हैं उनकी युक्तियां सुन रहे।
संग्रह की अनेक रचनाओं में रचनाकार ने बाजारु संस्कृति पर तीखे कटाक्ष करते हुए अनूठे अंदाज में बात कही है। कुछ अंश देखिये-
चमकदार चीजों से, भरा पड़ा ग्लोबल बाज़ार, कबीरा, क्या लेगा?...मल्टिनेशनल प्लेटों में हम, जैसे सजे 'पुलावÓ, हमें परदेसी खाएगा...चूल्हे तक बाजाऱ आ गया, अम्माँ, घर संभाल कर रखना...।
संग्रह में पुरवाई वक्त को समझ, कितना चीखे 'लोकÓ, आय है 'ईमेलÓ हम तोते हैं, वक्त का फरमान है, पुरखों का तालाब, कभी हुए हम विद्यापति, घाट-घाट का पानी, मैं कस्तूरी हिरन अकेला, शहर से गांव मत आना, बहुत बेहया जमाना री सोन हिरनी प्रभावी शिल्प सौष्ठव एवं कहन के अंदाज के कारण अंदर तक छूती हैं।
अभिनव प्रकाशन, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित इस कृति की छपाई सुंदा है। आकर्षक एवं प्रासंगिक कलात्मक आवरण से सजी इस पुस्तक में तमाम रचनाओं में सामाजिक प्रतिबद्धता, प्रतीकात्मकता, गेयता, काल प्रासंगिकता अन्य विशेषताएं हैं। प्रख्यात समीक्षक एवं वरिष्ठ साहित्यकार डा. सुरेश गौतम ने पुस्तक की भूमिका में उचित ही कहा है कि राधेश्याम के शुक्ल के गीतों, $गज़लों और दोहों मे जो धार है, वही धार इन नवगीतों में भी है। विभिन्न विधाओं की करीब आधा दर्जन चर्चित कृतियों के रचनाकार डा. शुक्ल की यह रचना गीति काव्य को समृद्ध करते हुए इसे नयी ऊंचाइयां प्रदान करेगी-ऐसी आशा है।
सत्यवीर नाहडिय़ा
संपर्क सूत्र : 9416711141
पुस्तक : कैसे बुनें चदरिया साधो
लेखक : डा. राधेश्याम शुक्ल
प्रकाशक : अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद
मूल्य : 200 रु. पृष्ठ : 176
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