Saturday, March 14, 2015

परिवेश से संवाद करती कहानियाँ : 'और दीप जल उठे'


ʻरिश्तों का अहसासʼ कहानी संग्रह के बाद ʻऔर दीप जल उठेʼ श्रीमती सुरेखा शर्मा का दूसरा कहानी संग्रह व चौथी पुस्तक है। इसमें 15 कहानियाँ संकलित हैं। अपने परिवेश से संवाद करती और कहानीकारा के व्यक्तित्व से जुड़ी ये बहुआयामी कहानियाँ जमीन और माटी की उपज कही जा सकती हैं। जीवन के प्रति आस्था और प्रतिष्ठा के स्वर इन रचनाओं में निरंतर तरंगित हैं।
ʻऔर दीप जल उठेʼ एक सशक्त और मार्मिक पारिवारिक कहानी है जिसमें बुजुर्ग सास की उपस्थिति को बहू ने पूरा मान दिया। इससे सास के अहं की शिला खंडित होती चली गई। वैसे तो मिट्टी के दीप हर दीवाली पर जलाए जाते थे लेकिन इस बार के दीप कुछ खास थे। ये थे – अन्तर्मन के दीप। इन्होंने ऐसा आलोक बिखेरा जो पाठकों के दिल को आलोकित करता रहेगा, जिसका उजाला पुकार-पुकार कर कहेगा – अहं के तम को हटाते चलो ताकि यत्र-तत्र-सर्वत्र खुशी के जीप जलते रहें।
इस संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ संदेशपरक हैं। घटनाक्रम में गत्यात्मकता है। पाठक की जिज्ञासा अंत तक बनी रहती है। ʻअपराधबोधʼ कहानी अजनबी बालक के प्रति ममता व अपनत्व भरे व्यवहार का अनूठा उदाहरण है। इसमें वेदना है, संवेदना है, रुदन है और अपनी गलती स्वीकार करने का मनोविज्ञान है। ʻकाहे को ब्याही विदेशʼ में अभिभावकों को सचेत किया गया है कि रिश्ते करते समय पूरी छानबीन करनी जरूरी है। रूढ़िवादिता पर प्रहार करती, कथ्य की तेजधार व पद्यात्मक सरसता से भरपूर यथार्थवादी कहानी है – ʻमाता की चुनरी।ʼ
ʻपश्चाताप की आगʼ कहानी का मूलभाव है कि स्नेह-प्यार की पगडंडी पर सहज गति से चलते हुए, बीच राह में, लालच की चट्टान आ जाने पर परिवार का कोई न कोई पात्र अकाल मृत्यु का शिकार हो जाता है। यथार्थ व आदर्श का मिश्रण है यह कहानी। स्वार्थ की आग में झुलसती रही बाबूजी की संतान जबकि नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने वाली थी शांतमना सेविका सरस्वती। उसके ये शब्द बाबूजी की संतान के गाल पर करारा तमाचा जड़ते हैं – ʻमैं तो बाबूजी का चित्र लेने आई थी। मुझे इन कागज़ों से क्या लेना। सात-आठ महिनों में एक पिता का प्यार जो उन्होंने मुझे दिया, उससे अधिक एक दुखिया बेटी को क्या चाहिए था।ʼ
गुरु-शिष्य परम्परा पर आधारित मनोवैज्ञानिक कहानी ʻगुरु मर्यादाʼ पाठक के मन-मस्तिष्क को झकझोरती है और सुखान्त तक पहुँचाकर उसे ʻवाहʼ कहने को मजबूर करती है। बुरी सोच पर अच्छी सोच की विजय दर्शाती इस कहानी की सराहना करनी बनती है। परत-दर-परत रिश्तों का सच उजागर करती है ʻमनोव्यथाʼ कहानी जिसमें एक ओर सरलता, नेकनीति और संस्कृति है तो दूसरी ओर भौतिकता, बदनीयती व विकृति है। और अंत में शाश्वत सत्य उभर कर आता है कि सर्प-सम प्रकृति के स्वामियों से दूरी रखनी बनती है अन्यथा उन्हें दूध पिलाते रहो और बदले में बदनामी का विष पीते रहो।
ʻपश्चाताप के आँसूʼ कहानी आगाह करती है कि जरूरत से ज्यादा लाड़-प्यार तथा जेबखर्च बच्चे को बिगाड़ते हैं। महिला सशक्तिकरण का ज्वलंत उदाहरण पेश करती है ʻतप का फलʼ कहानी। कथानायिका अनिता के माध्यम से कहा जा सकता है कि नारी अबला हरगिज नहीं, वह सबला है। हाँ, सबलता के अँकुर को पनपाने के लिए संघर्ष व मेहनत का खाद-पानी देना पड़ता है। इस कहानी का कथानक मंथर गति की सरिता की तरह बढ़ता गया है। ʻबड़ी बहूʼ कहानी में मध्यमवर्गीय परिवार की कलहकारी स्थिति का ऐसा शब्दचित्र खींचा गया है मानो कहानीकारा की आँखों के सामने सब घटित हुआ हो। बड़े परिवार की त्रासदी समेटने वाली यह कहानी पाठक के मुँह से ʻआहʼ निकलवाती है।
स्त्री-पुरुष के स्वस्थ सम्बन्धों पर आधारित प्रेरक व रोचक रचना ʻमन का मीतʼ में समुद्र तट का ऐसा जीवन्त वर्णन है जैसे प्रकृति साकार होकर सामने आ खड़ी हुई हो। ʻनई राहʼ रचना उन पुरुषों की खबर लेती है जो पदोन्नति पाने के लिए अपनी पत्नी को सीढ़ी बनाने से नहीं हिचकते। करनी का फल मिले बिना नहीं रहता का निचोड़ पेश करती है ʻकरनी का फलʼ कहानी। लालच और भ्रष्टाचार के आवरण को अनावृत करता हुआ इसका कथ्य उन लोगों के मुँह पर करारा तमाचा है जो असहायों की मजबूरी का फायदा उठाकर मानवता के दामन पर कलंक लगाते हैं। इसमें पुलिस विभाग के काले कारनामों का कच्चा चिट्ठा खोला गया है।
ʻउद्यापनʼ कहानी माँ, पुत्र व बहू के त्रिकोण को लेकर रची गई है। इसमें यथार्थ का दर्द है तो आदर्श की दवा भी है। इसमें ग्रामीण व शहरी जीवनशैली का अन्तर दर्शाया गया है। एक पक्ष गलत को भी, मजबूरीवश, सहन करता रहता है परन्तु जब परिवर्तन का देवता अवतरित होता है तो वह कुत्सित प्रवृतियों को सात्विकता में बदलकर ही दम लेता है।
बेचैनी और सुकून के बीच की स्पेस में विचरती इन कहानियों का मूल भाव है कि बुराई की उम्र बहुत लम्बी नहीं होती। किसी न किसी मोड़ पर आकर वह दम तोड़ देती है। लेखिका कहानियों में एक आदर्श, सुन्दर और नैतिक व्यक्ति को गढ़ती है। भाषा के सम्बन्ध में लेखिका सहज है। भावों के आग्रह पर शब्द स्वयं यथोचित स्थान पा गए हैं। आवश्यकतानुसार मुहावरों का प्रयोग है। गद्य में पद्य की सी लयात्मकता है। उपदेशात्मक, आत्मकथात्मक तथा वर्णनात्मक शैलियों का प्रयोग किया गया है। निपात शब्दों के बहुल प्रयोग से परहेज करना बनता था। पात्रों के नाम के साथ ʻजीʼ का सम्बोधन अटपटा लगता है। एक रचना में पात्रों को एक ही पुरुषवाचक सर्वनाम में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
त्रुटिरहित छपाई तथा आकर्षक आवरण वाली यह पुस्तक पाठकों की सोच को विस्तार देगी और उनसे आत्मीय रिश्ता बनाएगी, ऐसी उम्मीद है।

                                          समीक्षक–कृष्णलता यादव, गुड़गाँव  


                                                पुस्तक का नाम – और दीप जल उठे
                                                लेखिका – सुरेखा शर्मा ʻशान्तिʼ
                                                पृष्ठ – 104, मूल्य – 200 रु.

                                                प्रकाशक – समन्वय प्रकाशन, गाजियाबाद।

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