Monday, March 16, 2015

दार्शनिक चिंतन से परिपूर्ण कविताएं

          
मानवीय भावनाओं एवं संवेदनाओं की सहज अभिव्यक्ति को कविता कहते हैं। कविता का जन्मना असाधारण स्थिति है अन्यथा हर मन में कविता उत्पन्न हो जाती। अन्य साहित्यिक विधाओं की तरह कविता केवल समकालीन प्रतिक्रियाओं में सिमट कर नहीं रहती। यह नदी-नीर की तरह न जाने कहां-कहां की चट्टानों को तोड़ती हुई, राह बनाती हुई अपनी मंजिल तक पहुंचती है। यह चुपके-चुपके अतीत, वर्तमान और भविष्य की सच्चाई को, अपने अंदाज में, कान में फूंककर आगे बढ़ जाती है।
धीरे से, मगर पूरे बल से, दार्शनिक अंदाज में जीवन सत्यों को कान में फूंकने वाली कविताओं का संग्रह है - मैं अनजान नहीं। मीनाक्षी आहुजा द्वारा सृजित इन कविताओं में पाठक का मन रमाने की क्षमता है। ये छोटी-छोटी कविताएं बड़ी-सी बात कहती हैं तो रसिक पाठक यह हुई न बात कहे बिना नहीं रह सकता। इन कविताओं में यादें हैं, तन्हाई है, प्रेम की पुकार है, सपनों का संसार है, सौन्दर्यानुभूति है वहीं उपभोक्तावादी संस्कृति है। सरकारी नीतियों का कड़वा सच है तो भागमभागी का दंश भी है। बात रिश्तों की हो या जीवन की, कवयित्री की गहन अनुभूतियां शब्दों के सांचे में ढलकर प्रश्न उठाती हैं, जवाब देती हैं तो कहीं सोचने-मनन करने को बाध्य करती हैं यथा - क्यों औरत के हाथ में/ होती है / आरजू की लकीर।
कवयित्री सुलझे हुए सुझाव भी देती है कि मानव मानव ही रह जाए तो अच्छा है। सुख का संसार बसाने के लिए अपने भीतर उतरना होता है। आदमी और जानवर के मध्य तहजीब का फासला रखने के लिए सहनशीलता अनिवार्य है। जीवन की दुविधापूर्ण स्थितियां भी बयां की गई हैं - गवारा नहीं किसी को / किसी की मुस्कराहट / और समझना है मुश्किल / चुप की फितरत। कई एक स्थानों पर आशावादिता का शंखनाद किया गया है - बीज बोएंगे सच के तो / पेड़ ज़रूर बनेंगे वक़्त आने पर। विपरीत परिस्थितियों से जूझकर मंजिल पाने का संदेश ध्वनित हुआ है। विखंडन को सृजन का पथ प्रणेता माना है। जागृति क्या है ? इसके उत्तर में कवयित्री का कथन है कि जब अपने-पराए, सुख-दुख का भाव बोध खत्म होता है तब जागृति होती है। प्रेम की ऊंचाई को छूने वाली एक कविता के ये शब्द दृष्टव्य हैं - शब्दों के उस पार / तुम को पा ही लूंगी / संभाल रखे हैं ख़त कई / कभी तो पढ़ ही लूंगी।
इसी प्रकार हिम्मत का पक्ष लेती हुई ये पंक्तियां जीवट से भरती हैं - गर्मी है अगर / धूप के टुकड़े हैं / तो चीर कर बादलों का सीना / निकल आएगा / एक बार फिर आसमान में। संतान के लिए माता-पिता की भूमिका का प्रभावपूर्ण व चित्रात्मक वर्णन है - पिता का साया होता है / सुरक्षित घर-सा। तुम समेट लोगी / मुझे है यकीन / ए मां / जब भी बिखर जाती हूं। वस्तुतः इन कविताओं में घर परिवार की खिलखिलाहट, बालपन की मासूमियत, रिश्तों की बुनावट और अनुशासन की पगडंडियां हैं। कहीं-कहीं पुरुष के दंभ को चुनौती दी गई है। खास बात यह कि हिम्मत के पंख लगाकर आसमान छूने का, मूल्यों को संवर्द्धित करने का संकल्प भी है - स्वयं रहूंगी कायम / जिंदगी के साथ / अपने मूल्यों पर। कथ्य व शिल्प की दृष्टि से विश्वास की महक, कागज की किश्ती, सबक, ठंडक, विस्तार, बेसुरा, तुम बताओ सखी, बेबाक लड़की, किताब में तितली और नई डगर आदि रचनाएं उत्कृष्ट बन पड़ी हैं। लड़की का साहस महिला सशक्तिकरण की टेर लगाने वाली कविता है। यदि इस कविता को पढ़ने के साथ-साथ गुन भी लिया जाए तो लड़की के साहस पर प्रश्न उठाने का सवाल ही न उठे।
कई कविताओं में, आने वाला कल ज़रूर सुहावना होगा, का स्वर मुखरित हुआ है। यह स्वर टूटे दिलों को जोड़ता है, थके जिस्मों को आरोगता है, रिश्तों को खंगालता है और रिक्तियों को भरता है। दार्शनिक चिंतन से परिपूर्ण ये कविताएं देर तक व दूर तक पाठक के साथ रहती हैं। बानगी स्वरूप - अन्तर्मन में / मेहंदी की तरह / रचते चले जाएं तो / अपनत्व भरे हरफ़ / हो जाते हैं निर्दोष। कवयित्री को चुभन है इस बात की कि व्यक्तित्व में रिक्तता क्यों व्याप्त है ? इस रिक्तता को भरने का सद्प्रयास है यह कविता संग्रह, ऐसा मेरा मानना है।
ये कविताएं छंदमुक्त हैं परन्तु इनमें आंतरिक लय व प्रवाह विद्यमान है। न शब्दों का आडम्बर है, न उलझी हुई भाषा, भाव या शैली। कहीं कोई लुकाव-छिपाव नहीं। अनुप्रास, रूपक व विरोधाभास आदि अलंकारों का खुलकर प्रयोग किया गया है। यदि कविताओं के शीर्षक-चयन में अधिक मंथन कर लिया जाता तो सोने पर सुहागे वाली बात होती।
भावों की सुकुमारिता से सज्जित काव्य संग्रह मैं अनजान नहीं साहित्यिक जगत में अपना स्थान बनाएगा, ऐसी उम्मीद करती हूं। कवयित्री को साधुवाद एवं शुभाशीष।

                                          समीक्षक - कृष्णलता यादव गुड़गांव




पुस्तक का नाम - मैं अनजान नहीं                          
कवयित्री - मीनाक्षी आहुजा                                  
प्रकाशक - बोधि प्रकाशन, एफ-77, सैक्टर 9, जयपुर।             

पृष्ठ संख्या - 120, मूल्य - 150 रु.                           

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