Monday, June 15, 2015

छंद-गीत

पीर पानी हो गयी है,
क्या करुँ मैं जिन्दगी ?

आँख में मेरे घनी सी,
हो गयी है क्यों नमी?
सोचता हूँ साधना में-
रह गयी है क्या कमी ?
मीत तेरी प्रीति में ही,
फूल ख्वाबों के सजा,
रो रही है सादगी,
कैसे वरूँ मैं जिन्दगी ?

पीर पानी हो गयी है,
क्या करूँ मैं जिन्दगी ?

यूँ सँजोना क्यों पड़ा है,
प्राण कोने में मुझे ।
हो दुखी है क्यों चली,
प्रीति रोने को तुझे ।
ले अँधेरा सो रहा है,
दीप तेरी रात का ।
भावनाएं जागती-
आहें भरूँ मैं जिन्दगी ।

पीर पानी हो गयी है,
क्या करूँ मैं जिन्दगी ?

भोर में आ के कहीं से,
छू लिया तू ने सही ।
आसमानी गीत तेरा,
गा रही मेरी जमीं ।
ले सितारा भोर में भी,
चाँद साथी जागता है,
प्राण में ही है सुधा-
कैसे मरूँ मैं जिन्दगी ?

पीर पानी हो गयी है,
क्या करूँ मैं जिन्दगी ?

-शिव नारायण यादव "सारथी"
ग्राम-देवारा हरख पूरा
जिला-आजमगढ़ (उ.प्र.)

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