Saturday, May 23, 2015

हमीद जालंधरी की ग़ज़ल

डूबता देख के तूफां में सफीना अपना,
दोस्त आये हैं कि ठंडा करें सीना अपना|

छोड़कर शहर को जंगल में गुजारे सावन,
साल भर में है यही एक महिना अपना|

चार-सू गूँज रही है ये सदा बस्ती में,
रहियो हुश्यार कि दुश्मन है कमीना अपना|

तुम वो मुख्तार कि मुर्दों को जिला देते हो,
हम वो मजबूर कि मरना है न जीना अपना|

कोई सुनता नहीं दुनिया में फुगाने-दरवेश,
वही दावर है कि हक जिसने है छीना अपना|

रह गई पास फकत दौलते-इखलास 'हमीद'
बह गया सैले-हवादिस में दफीना अपना||


मुख्तार=अधिकर्ता 
फुगाने-दरवेश=सन्यासी की दुहाई 
दावर=न्यायकर्ता 
दौलते-इखलास=निश्छलता की दौलत 
सैले-हवादिस=दुर्घटनाओं की बाढ़ 
दफीना=गड़ा हुआ खजाना 





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