Saturday, May 23, 2015

सईद कैस की ग़ज़ल

याद कर लेता हूँ उल्फत के फ़साने कितने,
मुझको मिल जाते हैं रोने के बहाने कितने\

उम्र उसने भी उम्मीदों में गंवायी सारी,
रंज हमने भी उठाये हैं न जाने कितने|

वस्ल की रुत भी गई हिज्र के मौसम भी गए,
हमने इस उम्र में देखे हैं ज़माने कितने|

दिल सा खुशफहम भला और कोई क्या होगा,
तुझसे मिलने के बनाता है बहाने कितने|

नज़अ के वक़्त मुझे आग लगा दे कोई,
लोग आयेंगे मिरा बोझ उठाने कितने|

ज़िन्दगी भर मुझे मायूस न होना आया,
हसले मुझको दिए मेरे खुदा ने कितने|

जब भी देखा किसी दीवार का साया ऐ 'कैस'
याद आये मुझे ग़ुरबत में ठिकाने कितने|

नज़अ=प्राणों का अंत 

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