Friday, April 24, 2015

अंसार कंबरी की ग़ज़ल

धूप का जंगल, नंगे पावों, इक बंजारा करता क्या
रेत के दरिया, रेत के झरने, प्यास का मारा करता क्या
बादल-बादल आग लगी थी, छाया तरसे छाया को
पत्ता-पत्ता सूख चुका था, पेड़ बेचारा करता क्या
सब उसके आँगन में अपनी, राम कहानी कहते थे
बोल नहीं सकता था कुछ भी, घर-चौबारा करता क्या
तुमने चाहे चाँद-सितारे, हमको मोती लाने थे
हम दोनों की राह अलग थी, साथ तुम्हारा करता क्या
ये है तेरी, और न मेरी, दुनिया आनी-जानी है
तेरा-मेरा, इसका-उसका, फिर बँटवारा करता क्या
टूट गये जब बंधन सारे और किनारे छूट गये      
बीच भँवर में मैंने उसका, नाम पुकारा करता क्या
-ज़फर मंजि़ल, 11/116-ग्वालटोली, कानपुर

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