बच्चे को सिखला रहे, झूठ बोलना पाप।
बोलेंगे बच्चे सदा, सच बोलें यदि आप।।
सच बोलें यदि आप, देश का भाग्य जगेगा।
कितने से हैं पाँव, दबा दुम, झूठ भगेगा।
कहें शून्य कविराय, बड़े यदि सच में सच्चे।
झूठ बोलना पाप, स्वयं सीखेंगे बच्चे।।
ज्योति जलाई सर्वदा, हुए स्वयं बलिदान।
किए समर्पित राष्ट्रहित, तन मन धन अरु प्रान।।
तन, मन,
धन अरु प्रान,
लड़े तानाशाही से।
भूख, गरीबी,
सोच, लड़े जल की काई से।
कहें शून्य कविराय, मुसीबत सदा उठाई।
कर उनका सम्मान, जिन्होंने ज्योति जलाई।।
झेला हमने इसलिए, हर काँटे का दंश।
ताकि चमन में खिल सकें, फूलों के सब वंश ॥
फूलों के सब वंश, महक वे सारे पाएँ।
गुलशन का हर द्वार, प्यार से जो खटकाएँ।
कहें शून्य कविराय, लगे खुशियों का मेला।
पाएँ सब आनंद, कष्ट इस कारण झेला॥
रोटी के लाले कहीं, कहीं सिकें पकवान।
कहीं अँधेरा हँस रहा, जगमग कहीं मकान॥
जगमग कहीं मकान, कहीं दरकीं दीवारें।
कहीं दिवाली रोज, कहीं निस-दिन झख मारें।
फिर भी देश महान, किसी के तन न लँगोटी।
देख किसी के ठाठ, किसी के पास न रोटी॥
सपनों में यह गगन भी, तभी बजाए शंख।
दीप जला हो आस का, हों साहस के पंख॥
हों साहस के पंख, न डर हो कड़ी धूप का।
जानो सबका मोल, मिले जल सिंधु, कूप का।
गैरों से कर प्रेम, न दूरी रख अपनों में।
हो ज़मीन का ध्यान, उड़ो जब भी सपनों में॥
आए दिन अब हादसे, मना रहे त्यौहार।
प्यार हुआ है बेअसर, असरदार तलवार।।
असरदार तलवार, घृणा की जलती बाती।
काम, क्रोध,
मद, लोभ, द्वेष की चौड़ी छाती।
कहें शून्य कविराय, भलाई जिसे न भाए।
वही शक्ति का केंद्र, वही अब आगे आए।।
भारी गर्मी पड़ रही, अबकी जेठ, असाढ़।
भीतर मन है काँपता, कहीं न आए बाढ़॥
कहीं न आए बाढ़, न सावन ऐसा बरसे।
भारी मचे तबाह, रुदन छूटे हर घर से।
राहत की क्या बात, चमकते महल अटारी।
बेघर होती आस, पड़े जब विपदा भारी॥
सोचें सब यह देश अब, कैसे बने महान।
चाहे जब लाशें बिछें, क्यों बनता श्मशान॥
क्यों बनता श्मशान, खून सडक़ों पर बहता।
जो देता उपदेश, जुर्म वह क्योंकर करता।
क्यों घायल है साँझ, लग रही रोज खरोचें।
चहके कैसे भोर, आज सब मिलकर सोचें॥
-शून्य आकांक्षी, कोटा
बहुत ही सुंदर ..समसामयिक कुण्डलियाँ ....रचनाकार को बधाई .....
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