वहाँ न जाना शीत तुम, दीन बसे जिस ओर।
चिथड़ों में लिपटे हुए, काट रहे हों भोर।।
काट रहे हों भोर, न कोई छप्पर सिर पर।
फिरते नंगे पाँव, पेट ही भरना दूभर।
बनना उनकी मीत, न उनको कभी सताना।
दीन बसे जिस ओर, शीत तुम वहाँ न जाना।।
धूप चदरिया बिछ गई, चलो भगाएँ शीत।
दर्शन देने आ गया, दिनकर बनकर मीत।।
दिनकर बनकर मीत, चटाई आँगन डालें।
बेर और अमरूद, बाँटकर, मिलकर खा लें।
पिंटू, चिंटू, राम, घरों
से निकलो भैया।
चलो भगाएँ शीत, बिछ रही धूप चदरिया।।
शहरों से की प्रार्थना, गाँवों ने इस बार।
नए बरस को बंधुओं, भेजो हमरे द्वार।।
भेजो हमरे द्वार, तरक्की हम भी चाहें।
सूखे रहें न खेत, स्वर्ण सी फसल उगाएँ।
बुत बनकर चुप ओढ़, खड़े हो क्यों बहरों से?
गाँवों ने इस बार, प्रार्थना की शहरों से।।
दूध नहाई पूर्णिमा, शरद परी की रात।
जन जन पर्व मना रहा, छत पर रखकर भात।।
छत पर रखकर भात, मधुर रस घोले रैना।
सजी चाँदनी आज, लिए कजरारे नैना।
शीतल सुरभित मंद, हवा तन मन को भाई।
शरद परी की रात, पूर्णिमा दूध नहाई।।
सतरंगी सपने लिए, आँगन उतरे रंग।
दिन फागुन के आ गए, झूम उठा हर अंग।।
झूम उठा हर अंग, फिर चली हवा बसंती।
सुर सरगम के साथ, सजी होली रसवंती।
घुँघरू बांधे पाँव, ताल पर लगे थिरकने।
आँगन उतरे रंग, लिए सतरंगी सपने।।
अमृत वर्षा कर चले, बादल अपने धाम।
हरियाली लिखकर गए, धरती माँ के नाम।।
धरती माँ के नाम, पल्लवित होगा वैभव।
दीप पर्व के साथ, मनेगा मंगल उत्सव।
खिले खेत खलिहान, और जन जन मन हर्षा।
बादल अपने धाम, चले, कर
अमृत वर्षा।।
जिस घर में गूँजे सदा, किलकारी का शोर।
प्यारी मीठी बोलियाँ, हलचल चारों ओर।।
हलचल चारों ओर, खिलौने फैले-फैले।
दीवारों पर दाग, फर्श हों मैले-मैले।
कहनी इतनी बात, सभी यह कहते अक्सर।
बन जाता सुख धाम, चपल बच्चे हों जिस घर।
कई दशानन देश में, पनप रहे हैं आज।
बालाएँ भयभीत हैं, फैला चौपट राज।।
फैला चौपट राज, बसी अंधेर नगरिया।
पनघट नहीं सुरक्ष, किस तरह भरें गगरिया।
दीवारों में कैद, हो गए घर के आँगन।
पनप रहे हैं आज, देश में कई दशानन।।
-कल्पना रामानी, मुंबई
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