नारी करती नौकरी, उत्पीडऩ को झेल।
समता के अधिकार में, बाधक है यह खेल।।
बाधक है यह खेल, देश की साख गिराता।
उत्पीडऩ अपराध, घरों में भी दिख जाता।
कहाँ मिलेगा न्याय, घूमती मारी-मारी।
सरकारें नाकाम, दुखी है अब तक नारी।।
नारी पीड़ा सह रही, मन में है अवसाद।
संत वेश में घूमते, दुष्कर्मी आजाद।।
दुष्कर्मी आजाद, सताते नहीं अघाते।
करें नहीं परवाह, गंदगी भी फैलाते।
राजनीति का मंच, भरे अपराधी भारी।
हमको यही मलाल, कष्ट में अबला नारी।।
गाँधी के इस देश में, हिंसा है आबाद।
निरपराध है जेल में, अपराधी आजाद।।
अपराधी आजाद, बचाते भ्रष्टाचारी।
इनमें है उन्माद, कष्ट में जनता सारी।
जागे सकल समाज, रुके अपराधी आँधी।
जनता है लाचार, देख लो आकर गाँधी।।
टिकती है क्या झूठ पर, रिश्ते की बुनियाद।
झूठ बोल हर बात में, करते सदा विवाद।।
करते सदा विवाद, सवाल पूछ कर देखे।
मुखड़ा करे बयान, होंठ आँखों के लेखे।
कह लक्ष्मण कविराय, सच्चाई कभी न छिपती।
रिश्ते की बुनियाद, कभी न झूठ पर टिकती।।
-लक्ष्मण प्रसाद लड़ीवाला, जयपुर
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