Thursday, April 9, 2015

डॉ.कृष्णकुमार ' नाज़' की ग़ज़ल

शाम का वक़्त है शाखों को हिलाता क्यों है
तू थके-मांदे परिंदों को उड़ाता क्यों है

स्वाद कैसा है पसीने का ये मजदूर से पूछ
छाँव में बैठकर अंदाजा लगता क्यों है

मुझको सीने से लगाने में है तौहीन अगर
दोस्ती के लिए फिर हाथ बढाता क्यों है


मुस्कराना है मेरे होंठों की आदत में शुमार
इसका मतलब मेरे सुख-दुख से लगता क्यों है

भूल मत तेरी भी औलाद बड़ी होगी कभी
तू बुजुर्गों को खरी-खोटी सुनाता क्यों है

वक़्त का कौन भला रोक सका है पगले
सुइयां घड़ियों की तू पीछे घुमाता क्यों है

प्यार के रूप हैं सब, त्याग, तपस्या-पूजा
इनमें अंतर का कोई प्रश्न उठाता क्यों है

देखना चैन से सोना न कभी होगा नसीब
ख्वाब की तू कोई तसवीर बनाता क्यों है

जिसने तुझको कभी अपना नहीं समझा ऐ नाज़
हर घडी उसके लिए अश्क बहाता क्यों है
                        -डॉ.कृष्णकुमार 'नाज़' 

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