Friday, April 10, 2015

अम्बरीष श्रीवास्तव के कुण्डलिया छंद

 दोहा कुण्डलिया बने, ले रोले का भार।
अंतिम से प्रारम्भ जो, होगा बेड़ा पार।।
होगा बेड़ा पार, छंद की महिमा न्यारी।
अंतिम में हो दीर्घ, कहे यह दुनिया सारी।
अम्बरीष क्या छंद, शिल्प ने सबको मोहा। 
सर्दी बरखा धूप, खिले हर मौसम दोहा।।

राधा-केशव साथ में, मन-मंदिर प्रिय हेतु।
नदी किनारे आ मिले, बना हृदय जो सेतु।|

बना हृदय जो सेतु, मिलन शाश्वत है होता।
उठे प्रेम की लहर, रूप रस हमें भिगोता।
अमर युगों का प्रेम, प्रीति को प्रभु ने साधा।
जय-जय राधा-कृष्ण, पूज मन मोहन-राधा।।

सविता अम्बर में खिले, छाये सदा प्रकाश।
कोटिश तारों से सजा, यह अनंत आकाश।।
यह अनंत आकाश, दिखे ईश्वर की माया।
हैं अनेक ही सूर्य, सदा अनुशासन छाया।
आलोकित जो सूर्य, रची जीवन की कविता।
धर्म और निज कर्म, निभा सम अम्बर सविता।।

मदमाती धरती खिली, सुरभित खिला वसंत।
परिवर्तन सच में हुआ, बहके साधु व संत।।
बहके साधु व संत, गमकती चले पवन भी।
मस्ती में ऋतुराज, प्रीति में डोले मन भी।
भ्रमर चेष्टा देख, नई कलिका शर्माती।
सजा पीत परिधान, प्रकृति युवती मदमाती।।
वैलेन्टाइन साथ में, मचा हुआ है शोर।
बाँहों में बाहें दिखें, मौज मने चहुँओर।।
मौज मने चहुँओर, विदेशी रंग जमा है।
एक दिवस का प्रेम, लीजिए जली शमा है।
लाइसेन्स है खुला, मारिये जम कर लाइन।
शीश सफाचट मुफ्त, धन्य यह वैलेन्टाइन।।

खोया प्यारा गाँव है, खोये सब आधार।
नहीं रही संवेदना, नहीं रहा वह प्यार।।
नहीं रहा वह प्यार, शहर ने सब कुछ निगला।
विषय वासना रूप, वमन कर विष ही उगला।
पनघट पीपल प्यार, पुराना खोजें गोया।
ठगे गए हम लोगदेख अपनापन खोया।।

अपनायें कवि छंद ही, हैं यह मन्त्र समान।
नित्य करें अभ्यास यदि, छंद बनें आसान।।
छंद बनें आसान, बने मन्त्रों की माला।
शक्ति राम की पूज, सिद्ध हो गये निराला।
मुक्त बहा रसधार, बाद में, जग में छाये।
बने निराला वही, छंद को जो अपनाये।।

नदिया तीरे झूलता, थामे डाली हाथ।
निश्छल निर्भय बालमन, बाल-वृन्द के साथ।।
बाल-वृन्द के साथ, जोश की बहती धारा।
है कदम्ब की छाँव, सुशीतल नदी किनारा।
अल्हड़ है जल धार, मगन कान्हा की रधिया।
ले बचपन का रूप, साथ मुस्काए नदिया।।
-इं.अम्बरीष श्रीवास्तव, सीतापुर



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