Sunday, April 12, 2015

अशोक अंजुम के दोहे

महँगाई ने थामकर, हाथों में बंदूक।
दुखिया से खुलवा लिया, पुरखों का संदूक।।

होरी किडनी बेचता, धनिया बेचे लाज।
बाज़ारों की रागिनी, महँगाई का साज।।

आमदनी तो बढ़ रही, फिर भी रहे उदास।
सब चिंतित कैसे बुझे, महँगाई की प्यास।।


थके-थके उत्सव लगें, बुझे-बुझे त्यौहार।
ज़रूरतों के कहकहे, महँगाई की मार।।

घायल सब आदर्श हैं, सच है मरणासन्न।
भरा-भरा याचक लगे, दाता हुआ विपन्न।।

अपनी संस्कृति को लगा, अपसंस्कृति का ज़ंग।
ठेके पर जाने लगे, पिता-पुत्र अब संग।।

यह दुनिया बाज़ार है, तोल-मोल कर बोल।
वह उतना ही है बड़ा, जितना जिसका मोल।।

वे विराट होते गए, जो थे कल संक्षिप्त।
पहले सच के साथ थे, अब मिथ्या में लिप्त।।

क्या उसका व्यक्तित्व है, क्या उसकी औकात।
पानी पूछे प्यास से, पहले बतला ज़ात।।

राजा जी चिंतित हुए, बचे किस तरह लाज।
नखरे जब दिखला रही, दो कौड़ी की प्याज।।

अरी व्यवस्था, क्या कहें, तेरा नहीं जवाब।
जिनको पानी चाहिए, उनको मिले शराब।।

मम्मी हैं मद से भरी, पापा हैं अभिभूत।
भरी अटैची माल से, लौटे लिए सपूत।।

मेरी हर उम्मीद पर, डाले समय नकेल।
मेरा चहरा पहनकर, कौन खेलता खेल।।

मैं तुमको दूँगा भुला, तुम भी जाना भूल।
मैंने कहा, 'कबूल है?' उसने कहा, 'कबूल'।।

ना मस्जि़द की चाह है, ना मंदिर से काम।
जहाँ झुकूँ अल्लाह हैं, जहाँ झुकूँ हैं राम।।

मन के मन्दिर ध्वस्त हैं, किसको है परवाह।
बची रहें हर हाल में, किन्तु इबादत$गाह।।

नस-नस में है बेकली, रोम-रोम है तप्त।
जाएँ बचकर हम कहाँ, समय हुआ अभिशप्त।।

अरे वक्त, इस बात का, क्या कुछ है अहसास।
पानी वाले देश में, भटक रही है प्यास।।

लोकतंत्र की सिसकियाँ, भ्रष्टतंत्र के खेल।
न्याय तरसता न्याय को, डालें चोर नकेल।।

धीरे-धीरे पी गया, सूरज सारा नीर।
हम नदिया के तट खड़े, कोस रहे तकदीर।।

-अशोक 'अंजुम'
संपादक, अभिनव प्रयास, अलीगढ़

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