Thursday, April 30, 2015

कुण्डलिया छंद


किसको दिखते हैं यहाँ, अपने अन्दर दोष|
कमी ढूंढकर गैर में, पाते सब संतोष||
पाते सब संतोष, मनुज की फितरत ऐसी |
अपनी जैसी सोच, सभी की दिखती वैसी|
कह यादव कविराय, बुरे सब दिखते जिसको|
उसकी घटिया सोच, भला वह कहता किसको?
                      2
किसे सुनाएँ द्रौपदी, अपने मन की पीर|
अब कौरव दरबार में, 'केशव' खींचें चीर||
'केशव' खींचें चीर, गई मर्यादा सारी|
करते हैं अपराध, आज तो भगवाधारी|
कह यादव कविराय, मनुज को सभ्य बनाएं|
यहाँ सभी विद्वान, बात हम किसे सुनाएँ||
-रघुविन्द्र यादव

2 comments:

  1. दोनों कुंडलियाँ छंद अति सुंदर और साथक | हार्दिक बधाई श्री रघुविन्द्र यादव जी

    ReplyDelete
  2. शुक्रिया जनाब

    ReplyDelete