किसको दिखते हैं यहाँ, अपने अन्दर दोष|
कमी ढूंढकर गैर में, पाते सब संतोष||
पाते सब संतोष, मनुज की फितरत ऐसी |
अपनी जैसी सोच, सभी की दिखती वैसी|
कह यादव कविराय, बुरे सब दिखते
जिसको|
उसकी घटिया सोच, भला वह कहता
किसको?
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किसे सुनाएँ द्रौपदी, अपने
मन की पीर|
अब कौरव दरबार में, 'केशव' खींचें चीर||
'केशव' खींचें चीर, गई मर्यादा सारी|
करते हैं अपराध, आज तो भगवाधारी|
कह यादव कविराय, मनुज को सभ्य
बनाएं|
यहाँ सभी विद्वान, बात हम किसे
सुनाएँ||
-रघुविन्द्र यादव
दोनों कुंडलियाँ छंद अति सुंदर और साथक | हार्दिक बधाई श्री रघुविन्द्र यादव जी
ReplyDeleteशुक्रिया जनाब
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