भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में क्रांति समर्थक युवाओं का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इनमें रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिहँ, चन्द्रशेखर आजाद, अशफाकुल्ला खॉन, राजेन्द्र सिंह लाहड़ी, रोशन सिंह, राजगुरू, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, खुदीराम बोस, मदनलाल ढींगरा, उधम सिंह और करतार सिंह सराभा जैसे असंख्य नामवर और गुमनाम राष्ट्रभक्त शामिल थे। किंतु आजादी के बाद देश की बागडोर गांधीवादी कांग्रेसियों के हाथों में आ जाने के परिणामस्वरूप क्रांतिवीरों को सरकारी उपेक्षा का शिकार होना पड़ा जिसके चलते आज तक उन अमर शहीदों के व्यक्तित्व और कृतित्व का सही मूल्यांकन नहीं हो सका है। किसी को काकोरी कांड का शहीद और किसी को असेम्बली बम कांड के शहीद नाम देकर दरकिनार कर दिया गया। जबकि वास्तविकता यह है कि ये शहीद न केवल आजादी के सर्वोच्य आदर्श के लिए अपना सर्वोच्य बलिदान देने वाले थे बल्कि वे उच्च कोटी के चिन्तक और साहित्यकार भी थे।
काकोरी कांड के नायक पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल एक उच्च कोटी के कवि और शायर थे, मगर देश को आजाद हुए छह दशक बीत जाने के बाद भी उन्हें शायर के रूप में पहचान नहीं मिली है।
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुएँ कातिल में है।
रामप्रसाद बिस्मिल की यह रचना आजादी के आंदोलन में क्रांतिवीरों का राष्ट्रीय तराना होती थी और आज भी देशभक्ति के कार्यक्रमों और आंदोलनों में इसे शान से गाया जाता है। बिस्मिल जी की एक और गज़ल जो उन्होंने जेल में रहते हुए लिखी थी और अवध अखबार में प्रकाशित हुई थी, उनके उत्कृष्ट शायर होने का पुख़्ता प्रमाण है-
मिट गया जब मिटने वाला, फिर सलाम आया तो क्या?
दिल की बर्बादी के बाद, उनका पयाम आया तो क्या?
मिट गई ज़ुमला उम्मीदें, जाता रहा सारा ख्य़ाल,
उस घड़ी फिर नामवर, लेकर पयाम आया तो क्या?
पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल आर्य समाज से बेहद प्रभावित थे और ईश्वर की सर्वोच्य सत्ता को ही वे अनन्त मानते थे। उनकी यह रचना काबिले गौर है-
मालिक तेरी रज़ा रहे और तू ही तू रहे,
बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे।
जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे,
तेरा ही जि़क्र या, तेरी ज़ुस्तजू रहे।
ब्रिटिश सरकार जब अन्यायपूर्ण तरीके से काकोरी कांड के वीरों को सजा-ए-मौत देने पर आमादा हुई तो सरकार को चेताते हुए बिस्मिल ने लिखा था-
मरते बिस्मिल रोशन लहरी अशफाक अत्याचार से।
होंगे पैदा सैंकड़ों इनके रुधिर की धार से।
बिस्मिल और उनके साथी अपने लक्ष्य के लिए पूरी तरह समर्पित थे और अपने उस लक्ष्य के लिए कोई भी बलिदान देने को तत्पर थे। जैसा कि उनकी यह रचना बयाँ करती है-
यदि देश हित मरना पड़े, मुझको सहस्त्रों बार भी,
तो भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान में लाऊँ कभी।
मात्र 27 वर्ष की आयु में शहीद हो जाने वाले रामप्रसाद बिस्मिल बेहद परिपक्व चिंतक थे और वे किसी दुर्घटना के कारण क्रांतिकारी नहीं बने थे बल्कि पूरी तरह सोच-समझकर आजादी के आंदोलन में कूदे थे। उन्होंने लिखा था-
हम भी आराम उठा सकत थे घर पर रहकर,
हमको भी माँ-बाप ने पाला था दुख सहकर।
अपने ही दोस्तों द्वारा दगा दे दिए जाने और गवाही से मुकर जाने पर भी बिस्मिल ने उन्हें कोसा नहीं। उनके कोमल कवि हृदय से यही निकला-
वह फूल चढ़ाते हैं, तुर्बत भी दबी जाती है,
माशूक के थोड़े से भी एहसान बहुत हैं।
उन्होंने अपने अन्य साथियों को भी दोस्तों की बेवफाई पर दुखी न होने का संदेश देते हुए लिखा-
सताये तझको जो कोई बेवफा बिस्मिल,
तो मुहं से कुछ न कहना, आह कर लेना।
बिस्मिल जंगे आजादी के कूदने से पूर्व ही अपने अंजाम से वाकिफ थे। इसलिए उन्होंने लिखा था-
हम शहीदाने वफा का दीनों ईमाँ और है,
सिजदे करते हैं हमेशा पाँव पर जल्लाद के।
इतने परिपक्व और उम्दा शायर रामप्रसाद बिस्मिल को आज महज काकोरी कांड के नायक के रूप में ही जाना जाता है, जो उनके शायर रूप के साथ बेहद नाइन्साफी है। आवश्यकता है उनकी रचनाओं को एक साथ संकलित करने और उन पर शोधात्मक कार्य करवाने की।
-रघुविन्द्र यादव
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ReplyDeleteनमन इन्हे शत बार , बिस्मिल की लिखी एक एक पंक्ति क्रांति की ज्वाला की तरह तेज होते हुए भीतर से शांत, एकाग्र है
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