Thursday, March 19, 2015

प्रकृति और संस्कृति से जोड़ती कविताएँ

साहित्य की विधा चाहे कोई भी हो, उसे तब तक दोहराते रहना चाहिए जब तक नई पीढ़ी यह न जान-समझ ले कि साहित्य केवल मनोरंजन या बौद्धिक कसरत नहीं है बल्कि साहित्य वह साधन है जो संवेदना को शब्द देता है, आलोचना को जागरूक करता है और हमारे अंदर के सर्वोत्तम को संजोये रखता है। यह साहित्य ही है जो हमें विकृति से दूर ले जाकर प्रकृति व संस्कृति से जोड़ता है।
            प्रकृति व संस्कृति से जोडऩे वाला ऐसा ही काव्य संग्रह दुनिया भर की गिलहरियाँ प्रख्यात शिक्षाविद व साहित्यकार डॉ.रूप देवगुण की लेखनी से निसृत हुआ है। अकादमी के अनुदान से प्रकाशित इस संग्रह में 46 कविताएँ समाहित हैं।
            इन कविताओं में कवि की कल्पना और अनुभव सामाजिक रास्तों से होकर गुजरे हैं। इसलिए काव्य प्रभावी बन पड़ा है। रचनाएँ अतुकांत हैं पर समर्थ हैं क्योंकि इनमें काव्यत्व है। गिलहरियाँ प्रतीक हैं प्यारी-प्यारी बच्चियों की जो घर आँगन की शान हैं, जिनके मासूमियत भरे क्रियाकलाप आनंद का संचार करते हैं। कवि ने घर-परिवार का जीवन्त चित्रण किया है, जिसमें पिता की गर्जन का भय है तो माँ की ममता व संवेदनशीलता का सुकूँ भरा वातावरण भी है। उस पर वसंत अब में पेड़ त्यागी व्यक्ति का प्रतीक है इसलिए उसे संतोष है कि बहार फिर आयेगी, जबकि पेड़ के नीचे बैठा व्यक्ति उस जन का प्रतीक है जिसने कभी किसी को कुछ नहीं दिया होगा, इसलिए अंदेशा है कि उस पर वसंत कभी नहीं आयेगी।
            प्रकृति के अंग-संग, रची-बसी कविताओं में बादल, बिजली, बारिश, बहते झरने, चीड़ के वन, बदलता मौसम, पक्षी आदि वाह के नगमें गाते हैं। वहीं घर में बड़ों की गर्जन-तर्जन से बच्चे अकुलाते हैं। घोसलों से पक्षी-शावकों का उडक़र दूर जाना, तिनकों का बिखरना और केवल दो पक्षियों का रह जाना प्रतीक है-टूटते-उजड़ते परिवारों का, बुजुर्गों की उपेक्षा का और वृद्धावस्था की टीस का।
    इन कविताओं में भाषा की सरलता, प्रतीकात्मकता, बिम्बात्मकता व शब्दों की सरलता समाई है। आत्मकथात्मक शैली में लिखी ये रचनाएँ कोरी कल्पना की उड़ान नहीं भरती। उपमा, रूपक, अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश आदि अलंकारों का आवश्यकतानुसार प्रयोग है। कागज स्तरीय, त्रुटिहीन छपाई और मुँह बोलता-सा आवरण है। संग्रह में कहीं-कहीं मूल कथ्य की पुनरावृति है, इससे बचा जा सकता था। पृष्ठ 45 पर खुशबू के विशेषण के रूप में भयावह शब्द असंगत है। कविताओं में अंतिम वाक्य के अतिरिक्त कहीं भी विराम चिह्नों का न होना अखरता है।

    कुल मिलाकर भाषा, भाव-विचार का दमखम रखने वाली इस कृति का साहित्य जगत में स्वगत होगा, ऐसी उम्मीद है।
-कृष्णलता यादव

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