संस्कृत तथा हिंदी साहित्य में सप्तशती लेखन
की परम्परा बेहद प्राचीन है। इस लेखन यात्रा में हरियाणवी के रचनाकारों ने भी
अनूठा योगदान दिया है। समीक्ष्य कृति 'मसाल’ वरिष्ठ रचनाकार हरिकृष्ण द्विवेदी की तीसरी हरियाणवी सतसई है। इस कृति में भी
उन्होंने बहुआयामी जीवन पक्षों पर दोहों के माध्यम से छाप छोड़ी है।
श्री द्विवेदी ने 712 दोहों में जीवन के हर रंगरूप को लोक अनुभव की तराजू पर तोलकर जीवंतता के साथ
प्रस्तुत किया है। जीवन-मरण, खेत-खलिहान, घर-बाहर, रिश्ते-नाते, माँ-बहनें, अपनापन-भाईचारा, कथनी-करनी, गांव-नगर, प्रकृति-प्रदूषण, संस्कृति-विकृति, रीति-रिवाज, खान-पान, रहन-सहन, ज्ञान-विज्ञान, किसान-मजदूर, दिखावा-छिपावा, पाप-पुन, लोक-लालच, जाति-धर्म, एकता-अखण्डता जैसे बहुआयामी विषयों पर बहुरंगे चित्र मिलकर 'मसाल’ के रूप में खड़े हैं।
इस कृति की भूमिका में डॉ. बाबूराम ने ठीक
ही लिखा है कि कवि का लोक भाषा पर जबरदस्त अधिकार है तथा 'मसाल’ सतसई परम्परा लेखन के लिए प्रकाश पुंज
सिद्ध होगी। रचनाकार ने दोहाछंद के महत्व को रेखांकित करते हुए स्वयं लिखा है-
दोह्यां म्हं आक्खर नहीं, साच्चे मोती जाण।
तुलसी वृन्द कबीर जी,
ल्याए सागर छाण।।
योगेश्वर श्रीकृष्ण के निष्काम कर्मयोग को
रचनाकार ने सरल भाषा में अभिव्यक्त करते हुए मोक्षप्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया
है-
करमयोग का अरथ सै, काम करो निसकाम।
पाप पुन्न लाग्गै नहीं,
मिल ज्या मुकती धाम।।
सतसईकार श्री द्विवेदी के अनेक दोहों में ऐतिहासिक प्रसंगों को रोचकता से
शामिल किया गया है-दो बानगी देखिए-
भुन्ने तित्तर भी उडैं,
जिसका रुस्सै राम।
खुंटी निगल़ै हार नै,
गांडिव करै न काम।।
फुक्कै अगनी पाप की, मिटैं बंस के बंस।
त्रेता म्हं राण गया,
अर द्वापर म्हं कंस।।
रचनाकार के अनेक दोहों में व्यंग्य बाण भी खूब जमे हैं-
प्यार भरी गोदी गई, अमरत बरगा दूध।
माँ ने ब्यूटी मार ग्यी, ना बालक़ की सूध।।
अपने लोक अनुभव के आधार पर रचनाकार ने मानव प्रकृति का निष्कर्ष कुछ यूँ बयां
किया है-
मरूं मरूं दुख म्हं करै, सुख म्हं करै मरोड़।
इस माणस की जात का, काढ्या मनै नचोड़।।
अच्छी हरियाणवी कैसे लिखी जाए- यह हरियाणवी मर्मज्ञ हरिकृष्ण द्विवेदी को पढक़र
बखूबी सीखा जा सकता है। रचनाकार ने गूढ़ हरियाणवी शब्दों का हिंदी में अर्थ देकर
कृति को व्यापकता प्रदान की है। संग्रह की भाषा सरल व सहज है। एक सौ उन्नीस पृृष्ठ
वाली इस पुस्तक की कीमत डेढ़ सौ रूपये उचित है। प्रासंगिक कलात्मक आवरण प्रभाव
छोड़ता है। कुल मिलाकर यह कृति विलुप्त होती दुर्लभ हरियाणवी शब्दावली, लोक कहावतों तथा लोक परम्पराओं के संरक्षण एवं संवद्र्धन में मील का पत्थर साबित
होगी, हरियाणवी दोहा सतसई लेखन के क्षेत्र में मसाल बनकर मिसाल कायम करेगी तथा दोहा
छंद के लिए हरियाणवी कबीर वाणी सिद्ध होगी- ऐसी आशा है।
-सत्यवीर नाहडिय़ा, रेवाड़ी
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