Thursday, March 19, 2015

गीत के गरूड़ की उड़ान

समकालीन गीति-काव्य सर्जना के स्वर्णिम हस्ताक्षर कविवर चन्द्रसेन विराट के अभिनव गीत संकलन की संज्ञा है  'ओ गीत के गरुड़। इस कृति के समर्पण की पंक्तियाँ रचनाकार की गीतव्रती लेखनी के अन्तव्र्यक्तित्व को प्रकट करती हैं-मूलत: छंद में ही लिखने वाली उन सभी सृजनाधमा, सामवेदी सामगान के संस्कार ग्रहण कर चुकी गीत-लेखनियों को जो मात्रिक एवं वर्णिक छंदों में, भाषा की परिनिष्ठता, शुद्ध लय एवं सांगितिकता को साधते हुए, रसदशा में रमते हुए, अधुनातन मनुष्य के मन के लालित्य एवं राग का रक्षण करते हुए, आज भी रचनारत हैं। ...हमारी पौराणिक मान्यता है कि भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के उड़ते समय उसके पंखों से सामवेद के मंत्रों की रागमयी ध्वनि हुआ करती थी। विविध रूपकों में शब्द को गरुड़ माना गया है जो सुपर्ण अर्थात सुन्दर पंखों वाला है, जिसमें अप्रतिम सामथ्र्य है और जो माँ के स्वाभिमान की रक्षा के लिए अमरावती से अमृत-कलश लाने की शक्ति से सम्पन्न है।   कविवर विराट ने गीत को गरुड़ के रूप में देखा है-
            यह गरुड़-सा उड़ा है
            हृदयों तरफ मुड़ा है
            अर्थों का सतपुड़ा है
            संस्कारों से जुड़ा है
            रवि भी जहाँ न जाता, मैं नित्य जा रहा हूँ
            ब्रह्मण्ड बिना वाहन सबको घुमा रहा हूँ
                                    मैं गीत गा रहा हूँ
                        कवि की दृष्टि में शिव सत्य से स्फुरित गीत ही साहित्य का वास्तविक चरित है और वह गढ़ा नहीं जाता, अवतरित होता है। उसकी श्रद्धान्वित साधना, अव्याहत उपासना रचनाकार को सहस्त्रार तक पहुँचाकर वह भाव-समाधि प्रदान कर देती है जो अष्टांग-योग के साधकों के लिए भी स्पृहणीय है-
            अध्यात्म का रसायन
            खोले तृतीय लोचन
            स्थिति हो तुरीय पावन
            हो सप्त-चक्र दर्शन
            है सुप्त कुण्डली जो उसको जगा रहा हूँ
            मैं सहस्त्रार तक की यात्रा करा रहा हूँ
            गीत के प्रति, गीतकार के प्रति और गीतात्मकता के प्रति विराट जी की अविचल आस्था है। अपारे कविरेव प्रजापति: की सनातन मान्यता को जीते हुए, कविर्मनीषीपरिभूसवयंभू की उपनिसद् सूक्ति की प्रामाणिकता के प्रति श्रद्धान्वित वह निभ्रन्ति स्वर में घोषणा कर पाते हैं-
            कवि ब्रह्म शब्दों का रहा उसकी सामान्तर सृष्टि है,
            जो पार देखे ठोस के ऐसी रचयिता दृष्टि है
            ऋषि वाक्य है संतोष कर यह कवि वचन है आप्त है
            रे मन न कर परिवाद तू जो कुछ मिला पर्याप्त है।
            वैयक्तिकता, सघनता जैसी विशेषताओं के साथ विराट जी के गीतों में सामाजिक संवेदना भी पर्याप्त मुखर है। इस संकलन के बहुत से गीत व्यंग्य प्रधान हैं, कुछ सीधे-सीधे राष्ट्रभाषादेवनागरी, वन्देमातरम् के जय-घोष से जुड़े हैं तो कुछ में समय के टेढ़े तेवरों और राजनीति के दंशों को जी रहे जनसामान्य की व्यथा-कथा है। कुछ पंक्ति याँ प्रस्तुत हैं-
            विक्षुब्ध है दुखी है, हर कष्ट चौमुखी है
            परिवाद होठों पर है, पर आँख में नमी है-
                        वह आम आदमी है।
            एक ओर बानगी-
            युद्ध अवश्य किसी के द्वारा
            जीता या हारा जाएगा
            मैं ही हूँ वह आदमी
                        जो इसमें मारा जाएगा
            कवि अपने अवसादों से ऊपर उठकर गीत के गरुड़ की यात्रा को अविराम रखे, प्रभु से यही प्रार्थना है।

-डॉ.शिव ओम अम्बर, फर्रुखाबाद

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