Thursday, March 19, 2015

नये तेवर की कविताएं हैं 'उगती प्यास दिवंगत पानी’

आज बहुआयामी रचनाधर्मिता के दौर में लेखन व प्रकाशन के क्षेत्र में भी नित नये प्रयोग हो रहे हैं। समीक्ष्य कृति इसी पहलू का एक संजीदा उदाहरण है, जिसमें साठ वर्षीय रचनाकार प्रबोध कुमार गोविल की 27 कविताओं के साथ बीस वर्षीय नवोदित कवि मंटू कुमार की 23 कविताएं मर्मस्पर्शी शीर्षक 'उगती प्यास दिवंगत पानी के अंतर्गत छपी हैं। गोविल जी ने इन दो पक्षों की रचनाधर्मिता को रेखांकित करते हुए ठीक की कहा है- 'जैसे आधी सदी के दो छोर एक साथ हुक्का पी रहे हों....।
    राही सहयोग संस्थान, निवाई (राजस्थान) की साहित्य श्रृंखला शब्द पराग भाग-7 के रूप में प्रकाशित इन पचास कविताओं में सूक्ष्म मानवीय संवेदनाओं के बहुमुखी चित्र मुखरित हुए हैं- जिनमें कहीं जोशीला साहस है तो कहीं व्यंग्यभरी चुटकियां हैं। गोविल जी एक रचना देखिए-
इस पानी में दर्द घुले हैं, इन पानी में प्यास घुली है।
इससे वाबस्ता हैं रिश्ते, इस पानी में आस घुली है।।
    मौलिकता से लबरेज शिल्प सौष्ठव एवं भाषायी प्रवाह के चलते संग्रह में छंद की कमी महसूस नहीं होती। नवोदित कवि मंटू कुमार की रचनाएं भी प्रभाव छोड़ती हैं-
आम लोगों में बात खास उगी।
संगमरमर के बीच घास उगी।।
    सजातीय गौत्र की इस रचनाधर्मिता में कथ्य, शिल्प, प्रस्तुति तथा भाषाशैली में $गज़ब की समानता है तथा संग्रह में सामाजिक सरोकारों की सपाट बयानी की बजाये उनके पीछे छिपे मूलतत्व को प्रमुखता से मुखरित किया गया है। कृति के शीर्षक व आवरण में अनूठेपन का अहसास होता है। साठ पृष्ठों वाले इस संग्रह में अनेक पृष्ठों पर खाली स्थान अखरते हैं। रचनाकारों का परिचय भी कृति के साथ होता तो बेहतर होता। मानसपटल पर छाप छोड़ते हुए सीधे दिलों में उतरने की क्षमता रखने वाली इन कविताओं के नये तेवर इनकी विशेषता है जिसके चलते इनकी खनक व दमक दूर तक जाएगी- ऐसी आशा है।         
-सत्यवीर  नाहडिय़ा


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