अर्से के बाद
कभी कोई ऐसी पुस्तक पढऩे को मिलती है जिसे
एक बार पढऩा शुरू करें तो अंत तक लगातार पढ़ते जाना ज़रूरी हो जाता है। हरिभजन
सिंह रेणु जी की पंजाबी कविताओं का हिन्दी अनुवाद ''तुम कबीर न बननाÓÓ उस श्रेणी में शामिल की जा सकती है। जिस का अनुवाद गीतांजलि जी ने बहुत ही
उत्तम किया है, रेणु जी की कवितायें न
केवल सोचने को विवश करती हैं बल्कि पाठक को आंदोलित कर भीतर तक झकझोर देती हैं। इस
पुस्तक को पढ़ कर अनुभूति हुई है कि जो व्यक्ति देखने पर शान्त समंदर सा नजऱ आता
था उसके भीतर कितने ही तूफ ान छिपे हुए थे, हम उन्हें जानने वाले भी उनकी
गहराई को कहाँ भाँप सके थे कभी। मेरे साथ चलो, पहली ही कविता स्पष्ट कर देती है
कि कवि अकेला अपनी राह चलने वाला है मगर उन सब के साथ चलने को तैयार है जिन्हें
अंधेरे को चीर कर जाना हो। एवम् जिनको जाना ही अंधेरे की ओर हो उनका कवि से भला
क्या तालमेल हो सकता है। डाकघर कोई नहीं, कविता एक कटु सत्य को उजागर करती है जो आये दिन दो देशों को
शत्रुता छोड़ दोस्ती करने के नाम पर होने वाले झूठे दिखावे को निरर्थक बता कर सही
दिशा की बात करते हुए अंत में कहती है ''फि र लाहौर दिल्ली जब इक दूजे को, लिखें चि_ी, तो पता लिखें, दिल खास, दिल खास, गांव आम, डाकघर कोई नहीं, थाने बंद, राहें तमाम। जड़ता कविता में हमारे समाज की जड़ता देख व्याकुल कवि को लगता है
जैसे किसी दानव के कहर से हमारी सभ्यता पथरा गई है। और पूछती है कि कब तक हम ऐसे
ही बने रहेंगे श्रापित और बेजान एक थमे हुए समय की कैद में। कवि रेणु कभी रंगकर्मी
गुरशरण सिंह से बातें करता है, भगत सिंह, सफदर हाशमी और पाश के
बारे में और बताता है कि कौन चलता है ऐसे लोगों के साथ। मगर कलम का कर्तव्य है
अपने रक्त से प्राण लेकर हालात से जूझते रहना। कहा था न, कविता में रेणु बताता है अंजाम कबीर जैसा बनने का प्रयास करने का तो सुकरात से
मिलने जाना है कविता में हक सच की बात करने वाले का सामना कैसे अपने ही सत्य से
होता है, कैसे सवाल जवाब होते हैं की बात कहने के बाद कवि छोड़ जाता है एक प्रश्न कि
कैसे मिटेगा अज्ञानता का अंधकार। मैं बौना नहीं कविता बहुत ही कम शब्दों में सभी
कुछ कह देती है। कवि रेणु स्वीकार करता है कि भले मैं छोटा लगता हूँ, मगर मेरे अंदर बहुत गहरा समंदर है। मुझे न तो ठंडी छाँव भाती है न ही सर्द
मौसम। मुझे तो ज़रूरत है धरती की गोद जैसी गरमाहट या फि र तुम्हारे अत्याचार की
धूप। मैं बौना नहीं। अत्याचार से टकराने को व्याकुल है कवि रेणु और वास्तव में
जीवन भर टकराता ही रहा है। विरले ही होते हैं जिनका लेखन भी वैसा ही हो जैसा उनका
जीवन रहा हो। यहां पर मुझे श्री गुरू ग्रन्थ साहिब में गुरू नानक जी के कहे शब्द
अनायास याद आते हैं-''सचहु ओरे सभु कोई, ऊपर सच आचार।“ अथार्त सत्य महान् है किन्तु सत्याचरण महान्तर है। कवि रेणु का साक्षात्कार
अपने ही दूसरे पक्ष से भी होता है जब 'लडक़ी गाती रहेगी’ कविता में स्वीकार करता है कि मेरे अंदर की जमी बर्फ को मेरे ही शब्द पिघला नहीं सके। लडक़ी आज भी गा
रही है...पर मैं और तुम कोई कायर नहीं। तुम कबीर न बनना कविता जैसे कबीर की जीवनी
प्रस्तुत कर बताती है कि आसान नहीं है कबीर बनना। जैसे दुष्यंत कुमार कहते हैं कि
तुमने मुझे मसीहा बना दिया है अब मैं शिकायत भी नहीं कर सकता। रेणु भी बताते हैं
कि जब लोग उनसे कबीर बनने की बात कह रहे थे तब उनके भीतर बैठा कबीर उन्हें चेता
रहा था कि तुम मत बनना मुझ जैसा वर्ना जानते ही हो क्या हाल हुआ था मेरा। और अंत
में उनके भीतर से उनका मन जवाब देता है कि कबीर को भी किसी ने कहा नहीं था कबीर
बनने को, मगर उन्हें बनना था सो बन गये कबीर। इनके अलावा भी पुस्तक की अन्य कविताएँ
अपने आप में जाने क्या क्या समाये, छुपाये हंै। शायद, शहीद बनाम हम, रूबरू, दावानल, लोग, प्रतिकर्म, अनकहे शब्दों की हूक,
मिलने के बाद, इंतज़ार मेरे पूर्वज, जब नींद नहीं आती, आओ कि हम, तमाम कवितायें एक यत्न करना चाहती हैं। एक नया युग रचने का प्रयास करती प्रतीत
होती है।
-डा.लोक सेतिया, फतेहाबाद
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