देश को आजाद करवाने के लिए लाखों वीरों और वीरांगनाओं ने अपना सर्वोच्य बलिदान दिया। कुछ वीर तो अल्पायु में ही ब्रिटिश सरकार द्वारा फाँसी चढ़ा दिए गए। ऐसे ही एक वीर थे खुदीराम बोस जो मात्र 19 वर्ष की आयु में शहीद हो गए थे-
खुदीराम की चाह थी, भारत हो आजाद।
फाँसी दे इस लाल को, रोया था जल्लाद।।
राष्ट्र की सुरक्षा के लिए आज भी हमारे वीर सैनिक सीमा पर मुस्तैद रहते हैं। सैनिक परिवार की मनोदशा का वर्णन देखिए-
दादी अम्मा रात-दिन, करती तुमको याद।
फिर आओगे लौटकर, कितने दिन के बाद।।
सत्ता में बैठे लोगों की संवेदनहीनता और अवाम की दुर्दशा का शब्द चित्र इस दोहे में देखा जा सकता है-
जियें मरें कैसे रहें, इस बस्ती के लोग।
चला सिलसिला जाँच का, बैठेगा आयोग।।
जनता जनार्दन की इस देश में चूजे जैसी हालत हो गई है-
गिद्ध चौकसी कर रहे, साँप हुए सरताज।
चीलें पहरे पर खड़ी, चूजे हैं मुहताज।।
देरी से मिला न्याय भी अन्याय के समान होता है, मगर हमारे यहाँ तो न्याय मिलता ही नहीं है-
चश्मदीद गायब हुए, दीमक लगे सबूत।
बड़ अदब छोड़ा गया, उनका दागी पूत।।
रंगे हाथ पकड़ा गया, मुखिया जी का यार।
सजा मिली कुतवाल को, भोगें चौकीदार।।
नारी को सदा से ही भोज्या समझा जाता रहा है। आज भी हालात जस के तस हैं-
खून खराबा लूट हो, दंगा युद्ध फसाद।
गई लूट के माल में, महिला की मरजाद।।
डॉ.अभय ने अपने दोहों में जहाँ परिष्कृत शब्दावली का प्रयोग किया है, वहीं देशज शब्द भी उनके दोहों में नजर आते हैं। दोहों को प्रभावी बनाने के लिए कवि ने अन्य भाषाओं के शब्दों का भी उदारतापूर्वक प्रयोग किया है। दोहाकार ने साँप, गिद्ध, चील, चूजे, धनिया, होरी, कोयल, काग आदि प्रतीकों और नये-नये बिंबों के माध्यम से अपने दोहों को धारदार बनाया है। कथ्य और शिल्प की दृष्टि से अधिकांश दोहे प्रभाव छोडऩे में सफल हैं। किन्तु कुछ दोहे मानकों के अनुसार नहीं हैं। मानक दोहा में 13-11 के क्रम में कुल 48 मात्राएँ होती हैं। दोहा न एक अधिक मात्रा सह सकता है और न एक कम। मगर डॉ.अभय के संग्रह में 50 मात्राओं वाले दोहे भी शामिल हैं, जिन्हें मानक दोहे नहीं कहा जा सकता। संग्रह की भूमिका में दोहाकार स्वयं लिखते हैं-''काव्यविधा के लिए अड़तालीस या पचास मात्राओं के दोहे को चुना है।” इससे स्पष्ट जाहिर है कि रचनाकार ने जानबूझकर ऐसे दोहे लिखे हैं।
कुल मिलाकर सौ बातों की एक बात यह है कि यह दोहा संग्रह मौजूदा दौर का काव्यात्मक इतिहास है, जिसे सत्ता के प्रतिष्ठानों को खुश करने लिए नहीं, बल्कि आम आदमी की बात कहने के लिए लिखा गया है। साधुवाद।
-रघुविन्द्र यादव
कृति-सौ बातों की बातदोहाकार-डॉ.मनोहर अभय
प्रकाशक-राजश्री प्रतिभा प्रकाशन
6/473, सदर, मथुरा
पृष्ठ-109 मूल्य-250रु.
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