अनन्त जी ने बदलती जीवन-शैली, महानगरों की त्रासदी, नैतिक मूल्यों का पतन, सिद्धान्तहीन राजनीति, स्वार्थलोलुपता, पर्यावरण ह्रास, अंधविश्वास और पाखंड आदि को दोहों का कथ्य बनाया है-
अब बरगद के पेड़ भी, नहीं दे रहे छाँव।
हवा शहर की लग गई, बदला मेरा गाँव।।
आज हर चीज के मूल्य बढ़ रहे हैं, मगर मानवीय मूल्य गिर रहे हैं। अनन्त जी जब यह स्थिति देखते हैं तो वे जिन्दगी से सवाल कर उठते हैं-
यहाँ आदमी का नहीं, दो कौड़ी भी मोल।
ले आयी मुझको कहाँ? बोल जिन्दगी बोल।।
उनके दोहों में भविष्य के प्रति आशा और उत्साह भी है। संग्रह का शीर्षक दोहा देखिए-
अरे वाह! इसको मिली, जिजीविषा क्या खूब?
पत्थर का भी फाड़ उर, उग आई फिर दूब।।
अनन्त जी जब अपने देश को 'भारत और इंडिया’ में विभाजित होते देखते हैं तो कवि का संवेदनशील हृदय कह उठता है-
उधर नगर सुख-भोग हैं, नभचुम्बी धन-धाम।
इधर झोपड़ी-भुखमरी, नग्र अभागा ग्राम।।
आपाधापी और वैश्वीकरण के इस दौर में मनुष्य को धन के अलावा कुछ नजर नहीं आता। कवि ने आज के यर्थाथ को वाणी दी है-
कस्तूरी मृग की तरह, दौड़ रहे दिन रात।
आप कभी तो कीजिए, खुद से भी कुछ बात।।
अनन्त जी के दोहे कथ्य, शिल्प, भाव और भाषा सभी कसौटियों पर पूरी तरह से खरे हैं। वरिष्ठ दोहाकार और संग्रह की भूमिका लेखक श्री देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्रÓ ने सही लिखा है-भाषा और विषयानुरूप शैली पर उनका असामान्य अधिकार है। अलंकार और सूक्तियाँ उनकी लेखनी पर आकर जैसा नृत्य कौशल प्रदर्शित करते हैं वह देखते ही बनता है।
हृदयस्पर्शी दोहों वाले इस संग्रह का आवरण कलात्मक और प्रस्तुतिकरण प्रभावशाली है, मगर डॉ.अनन्त जैसे प्रकाण्ड विद्वान के संग्रह में प्रूफ की कुछ अशुद्धियाँ अखरती हैं। भले ही ये अपवाद स्वरूप हैं। कुल मिलाकर यह संग्रह दोहा के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा ऐसा मेरा विश्वास है।
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