बाल-साहित्यकार के रूप में ख्याति प्राप्त साहित्यकार घमंडीलाल अग्रवाल की अब तक कुल 46 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें बाल-साहित्य, विज्ञान एवं गीत, $गज़ल, दोहा संग्रह शामिल हैं। चुप्पी की पाज़ेब श्री अग्रवाल का प्रथम दोहा संग्रह है जिसमें 714 दोहे शामिल हैं।
कवि इन दोहों में समाज व राष्ट्र के भीतरी व बाहरी समस्याओं से जूझता नज़र आता है। पूरे देश में जो विरोधी स्थितियाँ, पारिवारिक, सामाजिक, सांप्रदायिक दुष्चक्र, कुंठा, आतंक, भ्रष्टाचार, गाँव की पीड़ा, महानगर की त्रासदी, स्वार्थपरता की भावना संवेदनशून्य समाज, देश की बिगड़ती हालत, सत्ता का विकृत रूप, दूषित पर्यावरण, स्वार्थों से लिपटी शासन व्यवस्था, घटता हुआ आपसी प्यार, गंूगी-बहरी न्याय व्यवस्था, संबंधों में खटास, बहरूपिये आदमी, जनसंख्या वृद्धि, बेटियों की करुण गाथा, दहेज की समस्या, पिता की चिन्ता, माँ का ममत्व, अमीर-गरीब में भेदभाव, पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण, देश की संस्कृति व सभ्यता का ह्रस आदि विषयों व समय की नब्ज़ पर हाथ रखते ये दोहे कड़वी सच्चाइयों को व्यक्त करने में पूर्णत: सक्षम हैं।कवि कहता है कि मनुष्य में अर्थ की लालसा उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है , इससे आर्थिक संतुलन बिगड़ गया है। अमीर और अधिक अमीर हो रहे हैं, गरीब और अधिक गरीब-
ये रोटी को खोजता, वो सोने की खान।
अपने प्यारे देश में, दो-दो हिन्दुस्तान।।
भूख एक विकराल समस्या बनकर उभरी है। नेता और पूँजीपति रोटी के चंद टुकड़े फेंककर आम जनता को लड़वाते रहते हैं, जिसे सीधी-सादी जनता नहीं जान पाती। किसी गरीब को लूटना बहुत आसान है, किन्तु उसकी सहायता करना उतना ही मुश्किल। स्थिति बहुत लज्जा जनक है-
रोटी लेनी दीन की, है बेहद आसान।
रोटी देनी दीन को, कठिन बड़ा श्रीमान।।
हमारा जो सांस्कृतिक आदर्श था वह शैन: शैन: धराशायी होता जा रहा है। अंग्रेज तो भारत से चले गए किन्तु अपनी अंग्रेजियत हमें सौंप गये-
जीवित है अंग्रेजियत, चले गए अंग्रेज।
देशवासियो देश की, संस्कृति रखो सहेज।।
क्षण-प्रतिक्षण मानव के बदलते रूप को कवि ने इस प्रकार व्यक्त किया है-
कई मुखौटे एक मुख, दुर्लभ है पहचान।
इंसानों के वेश में, घूम रहे शैतान।।
आज के यंत्रयुग में शहरों के साथ-साथ गाँवों के जीवन में भी बहुत परिवर्तन आ गया है। गाँव के स्थितिशील, मंदगतिशील समाज में जो आलोडऩ-विलोडऩ के लक्षण प्रकट हुए हैं, उनका प्रभाव भी दोहों में दिखाई पड़ता है-
गाँव-गाँव में आ गयी, ऐसी शहरी पौन।
बेटों के सम्मुख हुआ, बाप एकदम मौन।।
कवि व्यापक करुणा का प्रसार कर, वैचारिक सरोकारों को व्यवहारिक धरातल पर क्रियान्वित करना चाहता है। वह कहीं सीधे-सपाट शब्दों में तो कहीं-कहीं आक्रामक तेवर और बेनकाब कर देने वाले बेलाग स्वरों में अपनी बात को रखता है। संग्रह में समय संदर्भ से जुड़े, समाज में व्याप्त अर्थ विषमताओं, मूल्य विघटन एवं सांस्कृतिक ह्रस का मर्मस्वर्शी वर्णन किया गया है। इसमें सामाजिक यथार्थ की त्रासदी के चित्र विरल बन गए हैं। वास्तव में, ये दोहे यथार्थतता का ऐसा चित्रण करते हैं कि पाठक स्वयं को वर्तमान समय में व्याप्त समस्याओं के अहसास से घिरा हुआ पाता है। यह एक ऐसा समय है जब आदमी, सर्वहारा वर्ग, निम्रवर्ग, मध्यवर्ग, नौकरीपेशा वर्ग सभी बेकारी, भूख, महँगाई, अन्याय और तनाव के बीच जीवन व्यतीत कर रहा है, जिसका सजीव चित्रण इन दोहों में हुआ है।
-डॉ.सविता उपाध्याय,
सलवान पब्लिक स्कूल, गुडग़ाँव
कृति-चुप्पी की पाज़ेबरचनाकार-घमंडीलाल अग्रवाल
प्रकाशक-सूर्य प्रभा प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य-150 पृष्ठ-112
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