जब उर में
घनीभूत पीड़ा आ जाती है तो कभी गीत, कभी गज़ल तो कभी दोहों की रचना
करवाती है। यह पीड़ा वैक्तिक हो अथवा सामाजिक। बहुमुखी प्रतिभा के धनी शिवानंद
सिंह 'सहयोगी’ कृत 'मेरे गीतों का पाथेय’ भी इसी पीड़ा की परिणति है। संग्रह में 93 गीतों का समावेश है।
इन गीतों में कवि की पीड़ा साफ-साफ झलकती है, फिर भी चह निराश नहीं
है होता। प्रिय से मिलन न होने पर भी उसमें उम्मीद की किरणें उजागर रहती हैं। थकन
के माथे पर भी कवि गीतों की बिंदी लगाता हुआ चलता है। प्रश्रों के हल खोजना उसकी
प्रकृति है। समय के साथ छोड़ देने पर भी उसकी नियति शिकयत करना नहीं है। सपनो का टूट
जाना उसे कदापि निराश नहीं करता है। वह तो अपनों को अपनाने पर बल देता हुआ चलता है, भले ही वे उसे न अपनाएँ। काँटों को अपना साथी मानने वाला प्रिय को ही गीत
समर्पित करने में सुख का अनुभव करता है। वह पुकार उठता है-
मेरे गीत अधूरे रहते,
जो तेरा संगीत न होता।
मुस्कानों का सुचित सलोना, गुंजन का नवगीत न होता।।
आज गाँव की हरियाली भी तार-तार है। यह कवि की पीड़ा का एक अनन्य रूप है।
देखिए-
पगडंडी पर तड़प रही है,
गाँवों की हरियाली।
सडक़ों पर है खाक छानती,
शहरी सुबह निराली।।
कवि का प्रकृति के साथ भी गहन नाता है। उसका अनूठा रूप उसे अपनी ओर खींचता है।
तभी तो उसका व्याकुल मन यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं करता-
नव बसंत ने आँखें खोलीं, फसलें खेल रही हैं होली।
सरसों पहने पीली चूनर,
गेहूँ भरता हँस-हँस कोली।।
आज चारों ओर प्रदूषण ही प्रदूषण है। मिलावट का बोलबाला है। कड़ुवाहट का
साम्राज्य है। लोकतंत्र का रूप कुरूप हो चला है। ऐसे में रामराज्य कैसे आएगा? कवि तरह-तरह से सोच को नये आयाम देता हुआ गीतों की रचना करता है। बागनी देखिए-
कोलाहल से भरे शहर में,
जीवन कहाँ रहा।
तंगी से वीरान शहर में,
भोजन कहाँ रहा?
इस प्रकार संग्रह में संयोग-वियोग, प्रकृति-चित्रण, सामाजिकता, आशा-निराशा, प्रेम-विश्वास, श्रंगार-सादगी, कुँवारी पीड़ा, सहज जीवन, आगत-अतीत, स्मृतियों के शिलालेख,
हँसी-खुशी, विकृत सत्ता, मानवीय संवेदनाओं, समय का सच आदि रंगों व भावों के सहज दर्शन होते हैं। सरल, सहज एवं सुबोध भाषा-शैली में लिखे गये इन गीतों में चुंबकीय आकर्षण है, जो पाठकों को रससिक्त कर देता है। प्रतीक, बिंब,उपमा आदि गीतों के प्राण हैं।
संग्रह का मुद्रण साफ-सुथरा एवं त्रुटिहीन है। आकर्षक मुखपृष्ठ कृति की शोभा
दूनी करता है। कुल मिलाकर मेरे यह एक ऐसी कृति है जिसका हिन्दी साहित्य में स्वागत
होगा।
-घमंडीलाल अग्रवाल
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