Thursday, March 19, 2015

भावमय क्षणों की रसात्मक अभिव्यक्ति

कुहरीले झरोंखों से, वयोवृद्ध साहित्यकार यतीन्द्रनाथ राही का भावात्मकता से भरपूर काव्य संग्रह है। कविताएं अनूठी हैं। उनमें संदेशात्मकता है सृष्टा का हर सृजन सुन्दर है, उसे प्यार दो। कवि का मानना है कि मन धोए बिना इबादत बेमानी है। कर्म निष्ठा व इन्सानियत का पक्ष लेती इन विविधवर्णी कविताओं में गांव-देहात, वन-जंगल का जीवंत चित्रण है जिसमें हिरण, खरगोश, गोरैया सब समाहित हैं।
            जीवन का दर्शन, सत्य की महिमा, सत्ता की अहमन्यता तथा उम्र के हर पड़ाव का सुन्दर अंकन इन कविताओं में है। यद्यपि कविताएं छन्दमुक्त हैं तथापि यति, गति का सुमेल स्थापित किया है। शृंगार के दोनों पक्षों का भावपूर्ण चित्रण है हर आहट में पायल की झनक, हर दस्तक में चूड़ी की खनक। संसार की असारता, बीते पलों की यादें-कभी रुलाती हैं, कभी गुदगुदाती हैं तो कभी चुपके-चुपके बहुत कुछ कह जाती हैं। अलनूरा एक सुदीर्घ रचना है जिसमें कवि का आशावादी स्वर उभरा है कि जिन्दगी लम्बे सफर की कविता है जिसमें तलाश है कबीर की चादर, मीरा की चूनर, राधा के चीर व कन्हैया के अंगरखे की। कवि कामना करता है कि काश! हम वहां पहुंच सकें जहां आत्माएं नूर में धुलकर पवित्र होती हैं।
            कहानी, उपन्यास, खंडकाव्य आदि के रूप में जीवन की परिकल्पना एक नवीन सार्थक प्रयोग है। ईंट-पत्थर की भव्यता की अपेक्षा कवि प्यार व समर्पण का प्रतीक घोंसला प्राप्त करना चाहता है। कविताओं में कवि की पीड़ा उजागर हुई है कि आज आदमी मशीन बनता जा रहा है। इसलिए जिन्दगी की सुहानी $गज़ल फूहड़ व्यंग्य बन जाती है। वर्तमान सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था पर करारा तमाचा है ऊँची रोटियाँ, बौने हाथ। जीवन की जीवन्त तसवीर पेश की गई है घोंसला धर्म में। घोंसलों के बनने, भरने, गूँजने व रितने में खपती चली जाती है जीवन की लम्बाई। फिर शुरू होती है अस्तित्व की नई तलाश।
            अस्मिता की चिंता से चिंतातुर कवि पूछता है कि सभ्यता-संस्कृति की विकास-सरिता में आदमी की अस्मिता क्या यूँ ही डूबती रहेगी? चीजें छोटी हों या बड़ी सबका अपना यथार्थ है, महत्व है। जैसे दीपक भले ही सूरज नहीं होता मगर उसके मन में अंधेरे से लडऩे का अनवरत संघर्ष ज़रूर है यह छोटी बात नहीं। ज़रूरत है यथार्थ से रूबरू होने की। कवि की मान्यता है कि जीवन कला है लेकिन तभी तक जब तक उसमें सत्यं, शिवं, सुन्दरं का समावेश है। इनके अभाव में संवाद मात्र प्रलाप होंगे और अभिनय भोंडा प्रदर्शन होगा। सवाल के हर कटे माथे पर/ सवालों का खेत उगेगा नवीन प्रयोगधर्मिता दर्शाता है।
            कवि ने माकूल उत्तर की चाह में शासन-प्रशासन, गाँव-नगर, भूख-प्यास, घर-घाट और हत्या-बलात्कार से संबंधित अनेक प्रश्न उठाए हैं। शहर के आदमी की परिभाषा देते हुए कवि कहता है कि उसके पास लम्बे कान, तेज आँखें, ऊँची नाक, मोटी खाल, मिश्री-सी जुबान, पाँव में पहिए और मुठ्ठियों में सपनों के रूप में बहुत कुछ है। परन्तु अफसोस कि उसके सम्वेदन पथरीले हैं। वह आधा तीतर आधा बटेर बनकर जी रहा है।
            बहुत हास्यास्पद लगती है देशी गधे की विलायती रेंक के माध्यम से कवि ने निज भाषा-संस्कृति से जुड़े रहने की अलख जगाई है। एक कामगार किशोरी के जीवन के सशक्त, सुहावने रूप का सजीव चित्रण मन को लुभाता है। साथ ही मन में कुशंका का कुहासा फैलता है। इस कुहासे का निवारण करती हैं ये पंक्तियाँ इसकी जिन्दगी से ईष्र्या न कर बैठें शिकार की आँख, पिंजड़े की पाँख। नारी की सबलता का रूप धरकर कवि-हृदय से अवतरित हुई हैं चुनौती भरी ये पंक्तियाँ शक्ति जब भी विद्रोहिणी हुई है, शिवत्व ही पददलित हुआ है। संग्रह में अलंकारों की छटा देखते ही बनती है कुछ यादें घटाओं-सी घुमड़ती हैं। तन भीगता है, मन भीगता है, हम डूबकर जीते हैं। इस संग्रह की भाषा सरल व छपाई त्रुटिरहित है।

 -कृष्णलता यादव

0 comments:

Post a Comment