वरिष्ठ
साहित्यकार श्री यतीन्द्रनाथ राही बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार हैं। अब तक इनकी
लगभग एक दर्जन पुस्तकें विभिन्न विधाओं की प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें
पुष्पांजलि, बांसुरी, तितली बादल मोर कबूतर (बाल-गीत), दर्द पिछड़ी जि़न्दगी का, रेशमी अनुबंध, बाँहों भर आकाश, महाप्राण (खण्ड काव्य),
अंजुरी भर हरसिंगार आदि प्रमुख हैं। 'घरौंदे रेत के’ उनके 39 शीर्षकों में बंटे 751 दोहों का सद्य प्रकाशित मनभावन संग्रह है।
उनके संग्रह में प्रकृति, नारी, पर्यावरण, रिश्ते-नाते, जीवन यथार्थ, मूल्यहीनता, धन लिप्सा, भ्रष्टाचार, गाँव की बदलती हालत, रिश्तों में फैलती स्वार्थपरता, संबंधों की मृदुता, प्रेम, आस्था आदि अनेक विषयों पर प्रभावी दोहे हैं। इन दोहों में मिथकों का नवीनीकरण करते
हुए यथार्थ को वाणी दी गई है और सरल प्रतीकों से जीवन के सत्य को व्यक्त किया गया
है। कवि का संवेदना-संसार व्यापक है। वे व्यक्ति से लेकर प्रकृति तक को अपना कथ्य
बनाते हैं। गीतकार राही जी का भाषा पर अधिकार है और समन्वय का परिपालन करते हुए
उन्होंने परिमार्जित शब्दावली से लेकर आँचलिक शब्दों का खुलकर प्रयोग किया है। कवि
प्रकृति से अगाध प्रेम करता है इसलिए कंकरीट के जंगल उसे नहीं सुहाते-
सुरसा-सी
विकराल मुख, प्रतिपल बढ़ती चाह।
पत्थर वन में
आदमी, खोज रहा है राह।।
विकास की दौड़ में गाँवों के पिछड़ जाने के कारण लोग सपने लिए शहरों की ओर
प्रस्थान कर रहे हैं। मगर वहाँ भी बेकारी झेल रहे हैं। जिससे कवि मन आहत है-
आँगन सूना
छोडक़र, चौखट छोड़ अनाथ।
गाँव शहर में जा बसा,
कुछ सपनों के साथ।।
काव्य के मंचों पर बढ़ती फूहड़ता को निशाना बनाते हुए कवि सार्थक लिखने का
आहवान करता है-
गीत लिखो, दोहा लिखो, लिखो गज़ल नवगीत।
पर कुछ तो ऐसा
लिखो, हो जो शब्दातीत।।
समाज में बढ़ रही कुरीतियों को भी कवि ने अपने कथ्य का विषय बनाया है। दहेज पर
उनका यह दोहा कितना सटीक है-
जलें बेटियाँ
आग में, बेटे बिकें बज़ार।
ऐसे मूढ़ समाज
का, कब होगा उद्दार।।
रिश्तों में आज स्वार्थ आ गया है। जीते जी तो पुत्र अपने माता-पिता के साथ
उपेक्षापूर्ण व्यवहार करते हैं और मरने पर लोक दिखावा करते हैं। राही जी ने बहुत
धारदार दोहे कहे हैं-
जीते जी पानी
नहीं, नहीं मान सम्मान।
धन्य पिताजी हो
गए, पाकर तर्पण दान।।
राही जी श्रृगांर रस के कवि हैं। इसकी झलक उनके दोहों में भी दिखाई देती है-
आँखों ने सब
कुछ कहे, अंतर के संदेश।
पर अधरों की
प्यास तो, अब तक रही अशेष।।
राही जी के दोहे बड़े धारदार है। इनमें कथ्य, शिल्प, लय और छंद का बखूबी निर्वाह हुआ है। इनमें मिथकों का प्रयोग अत्यंत शानदार है।
धृतराष्ट्र, शकुनी, कंस, कान्हा, राधा, मीरा, कबीर आदि का प्रयोग करके कवि ने अभिव्यक्ति को दमदार बनाया है। चौरासी वर्ष का
जीवन अनुभव इन दोहों में स्पष्ट झलकता है। राही जी के ये 'घरौंदे रेत के’ उनकी अन्य कृतियों की तरह साहित्य जगत
में अपना मुकाम बनाने में सफल रहेंगे ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।
-रघुविन्द्र यादव
0 comments:
Post a Comment