Thursday, March 19, 2015

कुण्डलिया छंद को समृद्ध करता संकलन

कुण्डलिया भारतीय कविता का लोकप्रिय छंद रहा है। छह चरणों में लिखे जाने वाले इस छंद के प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं होती हैं। यह वास्तव में दोहा और रोला दो छंदों के संयोग से बना है। इसके प्रथम दो चरण दोहा तथा शेष चार चरण रोला से बने हैं। दोहा के विषम चरणों में 13-13 तथा सम चरणों में 11-11 मात्राएँ होती हैं। रोला में भी कुल मात्राएँ तो 24 ही होती हैं, मगर दोहे के विपरीत इसका प्रथम चरण 11 और द्वितीय चरण 13 मात्राओं का होता है। इसी कारण कुण्डलिया छंद में दूसरे चरण का उत्तरार्ध तीसरे चरण का पूर्वाध बनता है।
            कुण्डलिया छंद की विशेष बात यह है कि इसका प्रारम्भ जिस शब्द या शब्द समूह से होता है, अंत भी उसी शब्द या शब्द समूह से होता है। जिस तरह दोहे के अंत में गुरु लघु होना आवश्यक है, उसी प्रकार रोला के अंत में चार लघु या दो गुरु या एक गुरु दो लघु अथवा दो लघु एक गुरु आना अनिवार्य है।
            जिस प्रकार कबीर, रहीम, बिहारी, जायसी आदि दोहे के सिरमौर माने जाते हैं, उसी प्रकार कवि गिरधर को कुण्डलिया का पर्याय माना जाता है। उनके छंद आज भी मानक बने हुए हैं।
            मगर अकविता अथवा गद्य कविता आंदोलन के चलते अन्य भारतीय सनातनी छंदों की तरह कुण्डलिया भी प्रभावित हुआ। हालात यह हो गये कि इसे कुण्डलिया की जगह लोगों ने कुंडली कहना शुरू कर दिया। किन्तु तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद छंद को समर्पित लोगों ने इसे जीवित रखा। कुछ एकल संग्रह भी सामने आये।
            भारतीय रेलवे में कार्यरत युवा अभियंता त्रिलोक सिंह ठकुरेला ने कुण्डलिया छंद के सात हस्ताक्षर शीर्षक से देश के सात लब्धप्रतिष्ठ रचनाकारों के कुण्डलिया छंदों का संकलन प्रस्तुत कर इस छंद की समृद्धि का पथ प्रशस्त करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।
            सद्य: प्रकाशित संकलन में डॉ.कपिल कुमार, गाफिल स्वामी, डॉ.जे.पी.बघेल, डॉ.रामसनेहीलाल शर्मा यायावर, श्री शिवकुमार दीपक, श्री सुभाष मित्तल सत्यम तथा त्रिलोक सिंह ठकुरेला के 22-22 कुण्डलिया, संक्षिप्त जीवन परिचय और छाया चित्र सहित प्रकाशित हुए हैं। संकलन की लगभग सभी रचनाएँ भाव, भाषा, लय और छंद की कसौटी पर खरी हैं और सम्पादक का श्रम सफल रहा है। इन कुण्डलियों में जीवन और जगत के विभिन्न रंग देखने को मिलते हैं। पर्यावरण, मँहगाई, नारी, धन-दौलत, स्वार्थ, गाँव की दुर्दशा, शहरीकरण आदि जहाँ छंदों के कथ्य बने हैं वहीं नीतिपरक कुण्डलिया भी काफी संख्या में हैं। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-
            डॉ.रामसनेहीलाल शर्मा यायावर जी का ये छंद गाँव की मौजूदा तस्वीर प्रस्तुत करने में पूरी तरह सफल रहा है-
            आये मेरे गाँव में, ये कैसे भूचाल।
            खुरपी वाले हाथ ने, ली बन्दूक संभाल।।
            ली बन्दूक संभाल, अदावत हँसती गाती,
            रोज सुहानी भोर, अदालत चलकर जाती,
            लड़ें मेड़ से खेत, लड़ रहे माँ के जाये।
            कैसे-कैसे हाय, नये परिवर्तन आये।।
            माया का महत्व इस भौतिकता के युग में कुछ ज्य़ादा ही बढ़ गया है। श्री ठकुरेला कहते हैं-
            माया को ठगनी कहे, सारा ही संसार।
            लेकिन भौतिक जगत में, माया ही है सार।।
            माया ही है सार, काम सारे बन जाते,
            माया के अनुसार, बिगड़ते बनते नाते,
            ठकुरेला कविराय, सुखी हो जाती काया।
            बने सहायक लाख, अगर घर अपने माया।।
            यह संकलन कुण्डलिया छंद को पुन: स्थापित करने में अहम भूमिका निभायेगा, वहीं नये रचनाकारों का भी पथ प्रशस्त करेगा, ऐसी आशा की जाती है। पुस्तक की छपाई सुन्दर, कागज स्तरीय और आवरण आकर्षक है। राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर द्वारा प्रकाशित इस 96 पृष्ठ वाली कृति का 150 रुपये मूल्य भी वाजिब है। इस सराहनीय और लीक से हटकर किये गये इस ऐतिहासिक प्रयास के लिए श्री ठकुरेला बधाई पात्र हैं।  

-रघुविन्द्र यादव

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